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🚩यदि संक्रमण से जंग में हुई कोताही, तो हर तरफ़ होगी तबाही ही तबाही🚩@ ✒GBG⚔

1.  आज की सब से बड़ी खबर यह है कि पंजाब के  माननीय मुख्यमंत्री, कैप्टन अमरिंदर सिंह ने एक टेली प्रेस कॉन्फ्रेंस की, जिस में उन्हों ने दो दिल दहला देने वाले तथ्य लोगों के सन्मुख रखे। याद रहे की मुख्य मंत्री या प्रधानमन्त्री, जब कोई बात कहते हैं, उस बात के पीछे सैकड़ों वैज्ञानिकों, हैल्थ एक्सपर्ट्स और विशेषज्ञों का  ज्ञान हुआ करता है, सलाह  हुआ करती है, यदी इस औहधे के लोग, सलाह लें तो। अब यदि किम जोंग जैसे लोगों की बात करें, तो वह तो सनकी और खब्ती इंसान है।  भारत के नेताओं से किम जोंग जैसे ग्धेपन की उम्मीद नहीं की जा सकती।

2.  पंजाब के मुख्य मंत्री ने क्या कहा ? एक तो यह कि करोना अभी लंबा चले गा।  कयास लगाया जा रहा था, कि करोना 15 अप्रैल तक पीक करे गा, और मई तक थमना शुरू हो जाए गा, मेरा भी यही अंदाज़ा था,   लेकिन अब जो स्थिति बनती नजर आ रही है, वह यह है कि,  करोना जुलाई अगस्त में पीक करे गा, और अक्टूबर तक ही शायद काबू में अा सके, वह भी तब, अगर " हर्ड इम्यूनिटी " का सिद्धांत काम कर गया तो।  दूसरा जो मुख्य मंत्री ने कहा, वह यह की पंजाब की 87% आबादी के इस वायरस द्वारा प्रभावित होने का खतरा है। खबरों की मानें तो माननीय प्रधानमंत्री ने भी देश की 58 % आबादी के संक्रमित हो जाने की चिंता जताई है।

3.  इस खबर को यदि एनालाइज किया जाए तो कुछ चौंकाने वाले परिणाम सह्मने आते हैं। याद रहे की पिछली जनगणना के हिसाब से पंजाब की जनसंख्या 2 करोड़ 80 लाख के करीब है,   जिसे आज मोटे तौर पे गणित लगाने के लिए 3 करोड़ माना जा सकता है। भारत की जनसंख्या 130 करोड़ है।

4. अब करोना ने विदेश में कैसे नुकसान किया, इस के विश्लेषण के लिए,  इटली और चीन का रुख करें,  तो इटली में करोना संक्रमित लोगों की  मृत्यु दर 7% और चीन में यह 3% रही है। अमरीका में जब 3 लाख लोग  संक्रमित गिने गए, तो उन में से तकरीबन 10,000 मृत हुए, यानी हर 20 में से एक व्यक्ति, हर 100 में से 5 व्यक्ति, यानी 5% मृत्यु दर।

5.  मैंने अपने पिछले  लेख में भी लिखा था, कि हमारे देश, यानी भारत की जनसंख्या डेंसिटी अमरीका से 11 गुणा ज्यादा है। अमरीका भारत से 3 गुणा ज्यादा इलाका रखता है, जब की इस के विपरीत,  भारत के पास अमरीका से 4 गुणा ज्यादा आबादी है।   लेकिन हम संक्रमण और मृत्यु दर को 11 गुना नहीं, केवल 2 गुणा ही अमरीका से ज्यादा लेे कर चलेंगे। तो  मान कर चलें कि  भारत में, विपरीत परिस्थितियों के चलते यह दर 10% तक भी हो सकती है।

6.   लेकिन  आशावादी होते हुए हम इस दर को 5% पे फ्रीज़ करते हैं।   यानी 100 संक्रमित लोगों में से 5 रोगियों की मौत।  तो इस हिसाब से 3 करोड़ की आबादी वाले पंजाब में, जहां कप्तान अमरिंदर सिंह जी ने 87% लोगों के जुलाई अगस्त तक संक्रमित होने का अनुमान दिया है, वहां  3 करोड़ में से 87%, यानी 2 करोड़ 61 लाख लोगों के संक्रमित होने का अंदेशा है।   और 5% की मृत्यु दर लगाते हुए,  केवल करोना से तकरीबन 13 लाख लोगों की मृत्यु संभव है। बताता चलूं कि मृत्यु के बाकी कारण अपनी जगह, जस के तस बने रहेंगे।

7.  भारत में  नेशनल लेवल पे 58%  संक्रमण का ख़दसा प्रधान मंत्री जी ने जताया है, मेरा अंदाजा है, यह 60% होगा।  130 करोड़ का 60% बनता है  78 करोड़ लोगों के  संक्रमित होने की संभावना। अब 5 % की मृत्यु दर के चलते मरने वालों की संख्या, 3.9 करोड़, या मोटे तौर पे 4 करोड़ तक जा सकती है ।

8.  यह अनुमान मैंने, देश के बड़े नेताओं के बयानों पे आधारित  आशावाद के सहारे लगाए हैं। यदि प्रैक्टिकल हो कर संक्रमण से ग्रसित लोगों में से 10%  की मृत्यु की संभावना लगाएं, तो पंजाब में  26 लाख और भारत में 8 करोड़ लोगों को अक्टूबर तक, करोना अपना ग्रास बना सकता है। 

9. अब करते हैं बात पते की, यानी इस लेख के उद्देश्य की । मित्रो,  याद रहे, करोना अमीर गरीब, हिन्दू , मुसलमान, सिक्ख ईसाई, यानी धर्म के नाम पर, या जात पात के नाम पर, या इलाके के नाम पर कोई भेद भाव नहीं करता। करोना की  इस निष्पक्षता के चलते,   सभी एहतियात और सावधानियां, सभी के लिए एक सी हैं।

10.  इस के इलावा कुछ  अनिवार्य सत्य भी देश और कौम के समक्ष खड़े हैं। कनक कि लाखों एकड़ में खड़ी पकी हुई फसल, कटने के लिए तैयार खड़ी है।  कारखानों की मशीनें, कारीगरों के दर्शनों को तरस रही हैं, प्रोजेक्ट मजदूरों के पवित्र हाथों द्वारा की जा सकने वाली मेहनत को तरस रहे हैं, यानी देश के असली  रोजगार देने वाले मजदूरों के मन्दिर मस्जिद, पुनः अपने भक्तों, और पुजारियों यानी मजदूरों के पांव की आहट को तरस रहे हैं।  दुकानें ग्राहकों को तरस रही हैं, व्यपार व्यपारियों को तरस रहा है, और सूनी सूनी सड़कें, और रेलवे लाइन, लरियों और रेलों के आवागमन को तरस रही हैं। हमें सभी को मिलजुल कर अपने देश की अर्थ व्यवस्था को वापिस  पटरी पर भी लेजाना है। इस के चलते एक सैनिक की तरह सीना तान के इस युद्ध में उतरना होगा।  जिए तो जिए, मरे तो मरे।  किसी डाक्टर या नर्स का करोना से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त होना, किसी सैनिक की शहादत से कम नहीं। सभी को दिल से सलाम।

11.   यह भी सच है, कि देश विदेश के राष्ट्रध्यक्ष,  प्रधानमन्त्री, प्रदेशों के मुख्य मंत्री, सेना अध्यक्ष, प्रदेशों के डीजीपी,  जिलों के डीसी और पुलिस चीफ, डाक्टर, वैज्ञानिक, बुद्धिजीवी, सभी इस प्लेग से बचने का एक ही मंत्र बता रहे हैं, और वह है समाजिक दूरी बनाए रखना। कृपया इसे अवश्य मानिए, जब तक की कहीं भी आना जाना अनिवार्य ना हो।   साबुन से बार बार हाथ धोते रहना, मास्क और दस्ताने डाल कर विचरण करना,  तथा बाकी सब एहतियात की बातों से तो आप आलरेडी वाक़िफ हैं।  तो कुल मिला कर निष्कर्ष यह निकला, कि बचाव ही में बचाव है। सावधानी में ही समझदारी है। बाकी मौत से कया डरना। जब भी सरकार इजाज़त देती है, तब सर पे बांधो कफ़न और  काम पे निकलो। मेरे देश के मजदूरों, सैनिकों, पुलिस कर्मियों  और किसानों को गुरु गुरुने का शत्त शत्त प्रणाम।
🚩सत्य ही अमृत है🚩
🔱सत्य सुनें, सत्य सुनाएं, सत्य ही का प्रसारण करें।🔱
@✒गुरु बलवंत गुरूने⚔

🚩Ringing Bells and Clapping was a Rude Display of Lack of Empathy for Victims of Epidemic.🚩

1.   Supporting the 'Janta Curfew' was alright. A country wide lock down was a medical emergency and thus a necessity.   I heartily supported it, and will willingly support it again, as and when our government shall require us to do so,    'but' clapping of hands and ringing of bells  was nothing more than a cheap publicity stunt. It all looked like a vulgar display of  insensitivity and  looked  hollow and cheap.

2.  Many people came out and did it, partly because it is such an easy thing to do. Just  stand there and applaud and then walk back into our houses feeling self content, as if we have actually achieved something,  and partly many folks  did it just  because everyone else is doing it @ 'Fear Of Missing Out'. If the true intent to appreciate the health and sanitation workers existed,  the government would have focused on providing them with health care kits, rather than just ringing bells. The health workers  don't have enough personal protective equipment (Full body plastic suits we've seen frontline workers wearing in China and Italy).  They don't have enough testing kits. There have been cases where doctors and nurses working with COVID-19 haven't been tested yet,  as there aren't enough kits. The pitiable number of ventilators and  ICUs are nothing to applaud about.

3.   What's wrong with such symbolism is, that for Chamchas, it's just a chance to display their cheap support to a politician's call, bent upon believing that he is irreplaceable for India.  The common man imagines that, healthcare and other frontline workers are taken care of, by  just ringing a bell or clapping hands for them.  I'm afraid it doesn't work like that. The doctors and frontline workers are too busy to ask questions, they want us to see what's not going proper for them. They want us,  the people of India to  ask questions from our government on their behalf. We must ask the  government everyday, what it is actually doing for these frontline health workers on ground.

4.  Ironically, by ringing  bells and clapping our hands, we were simply hurting the sentiments of those suffering the consequences of epidemic.  Are we celebrating the suffering and death of thousands of lives taken by Covid-19,  or are  some of us even superstitiously HOPING, that like this the virus will disappear ?  Some fools were even dancing and making loud noises while clapping there hands.  How foolish and heartless it all seemed.  If it's all about showing support for health workers, well then,  rather than ringing bells, why don't  the clappers offer themselves as volunteer health assistants.

5.   I am sorry, but the truth must be upheld.  Personally, I appreciate the 'Janta Curfew',  as well as the lockdown, but this bell and clap drill sounded rather sick, when in Italy coffins are awaiting burials  for lack of space, and in India, people are not only dying, but  don't even know what is about to hit them.  Instead of ringing a bell or beating my daphali, I rather said a silent prayer for the departed souls, and those continuing to suffer unsaid pain @ Covid-19.

6.  केवल शोरशराबे के माध्यम से और इस तरह की ड्रामेबाजी  से काम नहीं चले गा आदरणीय, प्रधान प्रचारक साहिब । अभी तो बीमारी और जोर पकड़ेगी ।  कुछ निर्णायक कीजिये।  हर स्वास्थ्य सेवा करने वाले को full body masks मुहैया करवाना सरकार का फ़र्ज़ है। टेस्टिंग किट्ट भी भारी मात्रा में कम हैं।   केवल ताली या घंटियां बजाने से  COVID-19 पर विजय नहीं पाई जा सकती।
🔱🚩 सत्य ही शिव है🚩🔱
✒GBG⚔

🚩उलझ गया विपक्ष, उलझ गई जनता, गलत खेल गए दोनों ही, CAB की गुगली गेंद.🚩✒GBG⚔

1.  हर समाज, देश या प्रजा में सब कुछ हमेशा ठीक नहीं रहता। हालां कि सभी को हमेशा खुश रखना तो किसी भी सरकार के लिए संभव नहीं, पर फ़िर भी कुछ एसे हालात भी बनते हैं जब ज्यादा तर प्रजा राजा से नाराज़ हो जाती है, इस हद तक कि जिस के हक़ में जनादेश दिया हो, उसी के ख़िलाफ़ जनाक्रोश पैदा हो जाता है।

2.   बहुत बार राज्य के बहुत से फैसले और पॉलिसियां गलत होती हैं, और  जनता सरकार से बुरी तरह खफा हो जाती है। जब आक्रोश हद से बढ़ जाए, तो उस आक्रोश को मैनेज करना आवश्यक हो जाता है।

3.   आक्रोश मैनेज करने के दो तरीके हैं।   पहला आक्रोश के कारण मिटा दिए जाएं। ज्यादातर यह सम्भव नहीं होता, क्यों कि यदि इतनी बड़ी डिससेटीसफेकष्न को यदी सरकार मिटा सकती, तो पैदा ही क्यों होने देती।

4.   दूसरा आक्रोश की दिशा परिवर्तित की जाए, यानी किसी नए मेनेजेबल  आक्रोश  से पुराने अनमेनेजेब्ल आक्रोश को विस्थापित कर दिया जाए। 

5.  असल में क्या हो रहा है, असली मुद्दे क्या हैं, जनता  जियादा कुछ नहीं समझ सकती। वह भावनाओं द्वारा ड्रिवन होती है, लॉजिक या रीज़न  द्वारा नहीं।

6.  तभी तो आज तक इंसानी समाज में धर्म की राजनीति का इतना बोलबाला है। यदी इंसान इमोशन्स का ग़ुलाम ना होता तो खुद ही सोचिए, कि क्या चांद पे पहुंच चुका इंसान मन्दिर मस्जिद में, या जात पात में उलझा होता।

7  इंसान की कलेक्टिव भावनाएं  बांध में रुके पानी के समान होती हैं, जो टूट कर निकलना चाहती हैं,  और अंततः बांध ही को तोड़ देती हैं, लेकिन यदि कोई किसी निकासी की सुरंग को खोल दे, तो सारा पानी का प्रेशर, उस सुरंग द्वारा डीप्रेशराईज किया जा सकता है।

8.  देश में ऐसा ही कुछ हुआ है। जनता में नोट बन्दी, GST, बेरोज़गारी, कारखानों पे लगते ताले, और ज़बरदस्त मंदी के ख़िलाफ़ गुस्सा था और है।   हालां की यह परिस्थितियां सरकार की गलतियों द्वारा ही पैदा हुई, लेकिन इन  सब विपदाओं का कोई हल सरकार के पास नहीं था।

9.   मरता क्या न करता।   देश के सत्ता पक्ष ने CAB नामक सुरंग खोदी, और जनाक्रोश का सारा प्रेशर, उस सुरंग में से निकाल दिया।

10.   विपक्ष भी CAB कैब चिलाने में उलझ गया। इस बेमानी से विषय में देश के सारे ज्वलंत  मुद्दे खो कर रह गए। विपक्ष का और जनता का ऐसा बेवकूफ़ बनता मैंने पहले कभी नहीं देखा था। वाह रे भानजे तो कहना होगा। क्या विद्यार्थी, क्या बाकी सब लोग, सब CAB की कैब में सवार हो कर निकल पड़े प्रदर्शन नगर की सैर पे।

11.  इस सारी कवायद से विपक्ष और जनता के कुछ बड़े नुकसान, और सत्ता पक्ष के कुछ खास फायदे हुए। ज्यादा डिटेल में  न जाते हुए, बिलकुल संक्षेप में इशारा करता हूं, क्यों के समझदार को इशारा ही काफी है।

12.  सब से पहले तो याद रखिए कि विपक्ष ने असली मुद्दों से पैदा हुए प्रदर्शन और विरोध के असली मौकों को गुमा दिया।

13.  सत्ताधारियों द्वारा फील्ड में दसियों  मुद्दे "गलत गेंद पे गलत शॉट खेल कर" पहले ही उठाए  जा चुके थे। यह मुद्दे इतने गंभीर और कैच इतने आसान थे कि स्ताधारी बैटिंग साइड को 5 साल के शाषण के बाद ही कैच आउट किया जा सकता था,  लेकिन विपक्ष और जनता, दोनों ही सुस्त रहे।

14.  अब जब स्त्ताधरियों ने अपनी ही एक जान बूझ कर उछाली गई फर्जी सी प्रेक्टिस बाल पे हेलीकॉप्टर शॉट जड़ दिया, तो सभी लोग, क्या विपक्ष और क्या आमजन, उस को पकड़ने दौड़ पड़े, और बाकी सभी कैच मिस कर दिए हैं।

15.  यह भी याद रहे, कि नारे लगाना,  प्रदर्शन करना सबके बस की बात नहीं होती। यह हिम्मत किसी किसी में होती है। सभी मुद्दों पे खिलाफत की जुर्रत करने वाले, ज्यादा तर सेम ही लोग होते हैं। यह लोग भी थक जाते हैं, या फ़िर थका दिए जाते हैं।  सरकार के पास 4 साल बाकी हैं, और अपने इरादों को पूरा करने की दबंगई इच्छा भी।

16.  अब एक तो कहानी फ़िर से हिन्दू बनाम मुस्लिम हो गई है, यह सरकार नहीं कह रही, बल्कि खुद प्रदर्शनकारी बकते फिरते हैं।  बाकी  जो लोग आवाज़ उठाने की हिम्मत रखते हैं, वह भी रजिस्टर कर लिए गए हैं, तो हो गया एक किस्म का नागरिक रजिस्टर भी।

17.   बाकी कुछ कहना बेमानी हो गा, क्यों कि मैं तीर निशाने पे मार चुका हूं, सो चिंगम चबाने की कोई बाकी वजह ही नहीं।

18.   यह भी समझने की बात है, कि यदि  मान लीजिए उपनिवेश के सभी हिन्दू, सिक्ख, ईसाई, पारसी, बुद्ध और जैन मिनियोरीटीज़ को भारत में शरण दे भी दी जाए, तो क्या बकाया बचे गैर कानूनी बांग्लादेशियों को  सरकार चांद पर छोड़ आएगी। ज़रा सोचो।

19   भाई यह सब राजनीति है, और गधे हैं वह सभी लोग जो इस ट्रैप में उलझ गए हैं।   है ना मज़े की बात।

20. फ़िलहाल विपक्ष के सारे शोरशराबे का रिजल्ट बस इतना है, की खर्चा रुपया, फायदा चार आने भी नहीं।  देखना यह है, कि क्या जनता इस  CAB में ही घूमती रहेगी, या इस के सहारे बाकी असली मुद्दों को पकड़ लेगी ?

21.  यहां यह भी बताता चलूं कि जो राज्यों के कुछ  मुख्यमंत्री यह कहते सुने जा रहे हैं, कि वह CAB को अपने राज्य में लागू ही नहीं करें गए, दरअसल जनता को छलने के इलावा कुछ भी नहीं कर रहे हैं । 

22.  CAB एक सिटिज़न अम्मेंडमेंट एक्ट है, जिसे भारतीय पार्लियामेंट के दोनों हाउस पास कर चुके हैं, और माननीय राष्ट्रपति भी एप्रूव कर चुके हैं। अब यह एक पक्का कानूनी प्रावधान है।  आप के लिए यह जानना आवश्यक है कि नागरिकता पूरी तरह से यूनियन का विषय है। नागरिकता के लेने देने में, या इस के मानक तय करने में राज्यों का कोई भी हस्तक्षेप संभव ही नहीं है।   सो अमित शाह, कम से कम कानूनी तौर पे तो ठीक ही कहता है, जब वो कहता है कि कैब तो लागू होगा, क्यों कि इस में कोई कानूनी अड़चन नहीं है।

23.  मेरा मानना है कि, ममता हो या कोई और, सभी नेता, इस कानूनी संशोधन का विरोध कर के, जनता की राजनीतिक विरोध की ऊर्जा और जनता के समय और धन की बरबादी करने के इलावा, और कुछ भी नहीं कर रहे, क्यों कि विरोध के लिए CAB से कहीं ज्यादा बड़े मुद्दे आलरेडी हाजिर हैं।   अगर हिन्दू मुस्लिम पे ही जोर देते रहे तो बाकी मुद्दे, जैसे बेरोज़गारी, मंदी,  राजनीति में किए गए झूठे वादे, महंगाई इत्यादि, इन सब के ख़िलाफ़ प्रदर्शन कब और कौन करे गा।

24.  कुल मिला कर भारतीय राजनीति का स्तर अब पहले से ज्यादा गिरा हुआ दिखने लगा है। सार्थक डवेलपमेंट यह अवश्य हुई है कि जनता अब पहले से ज्यादा  ठगी हुई, प्रताड़ित, गुस्सैल  लेकिन  मुद्दों पे रोष प्रदर्शन के लिए, ज्यादा उत्साहित और तैयार  नजर आ रही है।
 🚩 सत्य ही शिव है।🚩
✒गुरु बलवंत गुरूने ⚔

🚩क्यों लाज़िमी था धारा 370 का अंत करना❓@✒GBG⚔



1. केवल धारा 370 के चलते एक ऐसा माहौल बनता था,  कि स्कूलों में पढ़ रहे विद्यार्थी, पाकिस्तान और लोकल गद्दारों की श्य पे, किताबें छोड़  पत्थर या बंदूक उठाते, देश के निशान और संविधान, दोनों की तौहीन करते, और खुद को जेहादी समझते। मुल्क की ही थाली में खाते भी और  थूकते भी, और खा कर थूकने के लिए मूर्ख गंवारो या फ़िर शातिर राजनीतिक सियारों द्वारा सराहे भी जाते।

2.  इस कुचक्र के चलते 5000 से ज्यादा फौजी, केवल कश्मीर में अपने कर्त्तव्य के निर्वाहन के चलते शहीद,  हो गए।  यह लोग भारत के विभिन्न हिस्सों से आते थे, जिन्हों ने  कश्मीर, जम्मू और लद्दाख को भारत में बनाए रखने के लिए अपनी जान की बाज़ी लगाई।

3.  370 एक ऐसी गलत फहमी का नाम था, जिस के चलते, कोई बेटा अपनी मां को मां न कह कर, पड़ोसन को अम्मा समझता रहे, और इस धारा का पड़ोसन ने, और आस्तीन के स्रपों ने भरपूर फ़ायदा उठाया। लड़के को गद्दार बनाने की राह पे लगा कर।

4.  पड़ोसन के आज़ादी नामक झूठे वादों के रसगुल्ले खा कर, कश्मीरी युवा बहका रहा। वह समझता था, पड़ोसन आंटी उसे अपना बेटा बनाए गी, यह ना समझते हुए, कि जिस से अपनी बलूच औलाद नहीं संभलती, वह भला तुम्हारा क्या भला करे  गी।

5. ख़ैर कुल मिला कर कश्मीरी खुदकुशी के रास्ते पर चलते रहे। 370 नामक छुरी को देश के गले पर चलाते रहे, यह सोच कर कि वह भारत को हलाल कर रहे हैं। देश मजबूर सा हुआ सब बर्दाश्त करता रहा, फौजी इस भट्ठी का ईंधन बनते रहे, तथा भ्रष्ट नेता इस जलती भट्ठी में अपनी राजनीतिक मुर्गियां भूनते रहे।

6.  इस ही  समय देश में आम जनता में से एक ऐसा नेता उभर रहा था, जिस ने राजनीति बिल्कुल ग्रासरूट से शुरू की,  जिस ने कश्मीर और  हिमाचल, और तमाम देश की परिस्थितियों को बारीकी से समझा, आंदोलनों में हिस्सा लिया, जहां मौका मिला, बेबाक बात कही। उस  नेता का नाम था नरेंद्र मोदी।

7.  15 साल गुजरात का मुख्य मंत्री रहने के बाद, इस नेता के पास राजनीति और व्यवस्था प्रबंधन  की असीम प्रैक्टिकल  नॉलेज और स्किल्स थी। ऐसे में परिवारवाद के चलते,  भारत की लीडर शिप में एक खला उत्पन हुई, और समय रहते उस ख़ला को, विधि के विधान द्वारा, मोदी नामक इस नेता द्वारा भर दिया गया।

8.  मोदी 370 धारा और तमाम बाकी प्रिपेक्षों के चलते, कशमीर में चल रहे तमाम ज़ुल्मो जबर के सभी मूल कारणों को समझते हैं, अतः मोदी ने ठान लिया कि इस नासूर का पक्का इलाज करना होगा।

9.  मोदी ने इस काम के लिए अमित शाह और दोवाल को अपने खास  सिपसालारों के रूप में चुना। बाकी भी सभी ने इस में  अपना अपना योगदान दिया।

10.   लेकिन  इस ऑपरेशन के लिए मोदी ने इस्लामिक हलाल के बदले मूल भारतीय योद्धाओं की विधि, यानी राजपूतों, सिक्खों , गुरखों और मराठों की  विधि,  झटके को चुना। यानी ज्यादा हो हल्ला नहीं, बस एक ही बार में काम तमाम।

11.  मैं आदरणीय मोदी जी और शाह जी को, इस असीम कामयाबी के लिए हार्दिक मुबारकबाद देता हूं। तमाम मुश्किलों के  बावजूद आप  ने जो कर दिखाया, वह अद्वितीय है।
🚩वन्दे मातरम🚩
🚩तत्त्व सत्व श्री अकाल🚩
✒गुरु बलवंत गूरूने⚔

🚩 बनारस के चुनाव का लेखा जोखा। 🚩@✒GBG⚔

बनारस  का गणित कुछ  इस तरहं से है।

 बनारस में तकरीबन 1.50,000 वोट यादवों के हैं, जो तेजबहादुर के नामांकन रद्द के बाद, अब  बंटने की जगह, सब के सब सपा के साथ हैं।  3.25 लाख बनिया बिरादरी की वोट है, जो पहले भाजपा के साथ थी, लेकिन अब कांग्रेस के नजदीक दिखती है। बनिया उपर से मोदी मोदी कहते हुए भी GST और नोट बन्दी  के चलते मोदी से ख्फा है।

इस लोकसभा क्षेत्र में लगभग 3 लाख मुस्लिम भाइयों के वोट हैं और तकरीबन 1 लाख दलित भी हैं। 2.50 लाख ब्राह्मण भाइयों का वोट हैं, जो कांग्रेस का मूल वोटर रहा है, और जिस  ने मोदी लहर के चलते, 2014 में मोदी  का साथ दिया था।   इस बार ब्रह्मण देवता, विश्वनाथ कोरिडोर बनाने के चलते उन के पुराने मकानो/मन्दिरों/इमारतों के टूटने से नाराज़  है,  और मोदी को स्वाहा करने के मूड में है।

  तकरीबन 50,000 निषाद/नाविक/मल्लाह, भाईचारे के वोट भी हैं, जो  क्रूज़ वरूज के चलते, अपनी रोज़ी रोटी पे खतरा देखते हैं। 3 लाख मुस्लिम और 1लाख  दलित तो पहले ही खफ़ा हैं।

 तो कुल मिला कर इस  बार समस्त समीकरण मोदी के ख़िलाफ़ बैठा दिखता है। बाकी, जिस शहर का कोतवाल खुद महाकाल हो, वहां वह कब किस को अर्श से फर्श पे कर दे, केवल खुद स्वयंभू शिव ही जानें।
🚩 सत्य ही शिव है🚩
✒गुरु बलवंत गुरूने।⚔

🚩 फ़िर इक बार, मोदी सरकार। ठोको ताली।🚩@ ✒GBG ⚔

1.  मैं जब भी सरकार की आर्थिक नीतियों की आलोचना करता,  तो मेरे बहुत से भक्त मित्र कहते, गुरूजी आप भी, आप तो सैनिक भी  हैं, आध्यात्मिक अध्यापन में भी संलग्न हैं,  देशभक्त भी हैं, तो आप मोदी सरकार के खिलाफ क्यों कुछ बोलते हैं,  जैसे कि मोदी सरकार के खिलाफ कुछ कहना भारत वर्ष  के खिलाफ कुछ कहना हो।  मैं अक्सर यही कहता कि मित्रो, सरकार के काम की  प्रशंसा मात्र ही देशप्रेम नहीं होता, और आलोचना देश द्रोह नहीं होता। ऐसे लोगों को मेरा एक हल्का फुल्का  जवाब यही  होता, कि भानजे सच तो बोलना पड़े गा, और सच वह नहीं होता जो आप या  मैं देखना चाहें,  बल्कि सच  केवल वह होता है, जो प्रत्यक्ष दिखता है। 

2.   इलेक्शन एनाउंस हुए, गठबंधन गठबंधन का शोर मचा, लेकिन गठबन्धन तो खुद भी किसी सुनुयोजित गठबन्धन में नहीं बन्ध पाया। कन्हैया जैसा युवा नेता भी अगर गठबन्धन  कोंस्सेंस का संयुक्त केंडिडेट नहीं  बन पाया, तो लानत भेजिए ऐसे गठबन्धन पे।

 3.  खैर छोड़िए यह सब, आज तक से आगे आज कल की बात करते हैं।  आजकल आर्थिक मामलों की विफलताओं  का घड़ा फोड़ने के लिए अरुण जेटली काका के सर का  इस्तेमाल किए जाने की प्रक्रिया जारी है,  दुनिया भर की और मुसीबतों से निजात पाने के लिए पाकिस्तान नामक जादू की पुड़िया तो  है ही, भ्रष्टाचारियों को, धार्मिक अत्ती वादियों को,  नौटंकी फिल्म अभिनेता व अभिनेत्रियों को, चुनाव से ठीक पहले राजनैतिक दलों में शामिल कर चुनाव में उतारने की प्रक्रिया जस की तस चालू है,  यानी वही सब तमाशा अभी भी चालू है, और  गूंगे बहरे तमाशबीन, बस तमाशा देख रहे हैं।

4. गठबन्धन हो या सरकारी पार्टी,  सब वही पुरानी शराब, नई पुरानी बोतलों में डाल कर परोसने में व्यस्त हैं। सभी का अंतर-ध्येय , केवल और केवल जनता का फूतिया बना कर  सत्ता हासिल करने का है।  वही पुराने घिसेपिटे भ्रष्ट और जुमलेबाज़ लोग ही तो चुनाव लड़ रहे हैं।

5.   अब ऐसी विकल्प हीन  स्थिति में यदि मैं  कहता हूं कि मोदी को ही दोबारा ले आओ, तो सब की बोलती बन्द हो जाती है, और सभी कड़ाही में भुंन रहे पॉपकॉर्न की जैसी आवाज़ निकालने लगते हैं। आज वही भक्त कहते हैं, गुरु जी आप सठिया गए हैं क्या ? अगर असल में ही मोदी दोबारा आ गया तो !?!? यानी कुल मिला कर सब की बोलती बन्द है, और साधू है की इस विचित्र तमाशे को देख कर मन ही  मन मुस्कुरा उठता है।

6.  मित्रो, मत भूलिए कि, 'People get the government they deserve'.  अभी आप का नोट बन्दी, GST, तथा जुमले वाला मामू फिर आने वाला है।  त्य्यार हो जाओ, और ठीक से अपने अपने तकिए यथा संभव स्थानों पर बांध लो, क्यों कि इस बार भाई खास अंदाज से डंडा फेरने के मूड में है।  मैं तो कहता हूं, भाई जी, आप का सुस्वागतम। इस बार कुछ ऐसा करो, और कुछ इस अंदाज़ में चाबी घुमाओ,  कि सोई हुई जनता की  अक्ल ठिकाने आ जाए।
🚩 सत्यम शिवम सुंदरम🚩
©🎙✒ गुरु बलवंत गुरने।📚⚔

🚩भारत की राजनीति का अटल सत्य दर्शन🚩@🎙GBG✒

1.  भारत के राजनेता लगातार भारतवासियों को, दशकों से राजनैतिक धोखा देते चले आ रहे  हैं। यहां  खुद के खिदमतगार  नेता, खुदा,  धरम, जात, इलाका या किसी व्यक्ति के नाम पे वोट प्राप्त कर  के,  सत्ता के मज़े लूट रहे हैं, और देश का,  व्यवस्था और जनता का शोषण कर रहे हैं, लगातार पिछले 70 साल से।

2.   भारत एक पार्लियामेंट्री डेमोक्रेसी है, यानी यहां लोगों को चाहिए कि वह  केवल लोकल मुद्दों  को ध्यान में रखते  हुए,  अपने लिए  लोकसभा या विधानसभा  में भेजने के लिए एक काबिल लोकल नेता को  चुनें।  फ़िर इन  चुने हुए नुमाइंदों को अपना नेता चुनने दो, जो देश का प्रधान मंत्री या प्रदेश का मुख्य मंत्री  बने।

3  लेकिन देश का दुखांत यह रहा, कि मंगल पांडे, राजगुरु,  आज़ाद, बिस्मिल, और भगत सिंह जैसे  बगावती  शहीदों की कुर्बानियों पर बना यह  देश,  केवल हरामी चमचों का मुल्क बन कर रह गया।

4.  यानी नेहरू  इंदिरा  के दौर  में शुरू हुआ व्यक्ति वाद का खेल, पहले पर्टिवाद पे भारी पड़ा। यहां तक कि नेहरू इंदिरा के रसोइए, नाई, धोबी बटलर, सब नेता बन गए।  यानी एक ऐसा दौर शुरू हुआ कि जिस में किसी व्यक्ति का राजनैतिक कद्द, काब्लियत से नहीं, बल्कि चापलूसी से नापा जाने लगा। यानी आप परिवार के चमचे कितने बड़े है, वह आप के राजनैतिक भविष्य का मानक बन गया।

5.  इस विध्वंसक और वीभत्स व्यूहरचना से निकलने के लिए, वाजपई ने गाय रक्षा का सहारा लिया, आडवाणी ने मन्दिर मस्जिद का, जब की वह असली मुद्दों, जैसे भ्रष्टाचार  कुव्यवस्था की बात कर के भी चुनाव जीत सकते थे, लेकिन  फिर भी, वाजपई ने गाय रक्षा का सहारा लिया, और आडवाणी ने मन्दिर मस्जिद का, और वहां से शुरू हुआ राजनीति का अत्यन्त दूषित कुचक्र।

6.  मोदी इस विकार युक्त सोच और नीति से उपजा हुआ नेता है, तो मोदी को अपराधी क्यों माना जाए। मोदी की देश के  प्रति  सर्वोत्तम  सेवा यही है, कि मोदी ने  नेहरू, इंदिरा और वाजपई आडवाणी की विरासत को एक साथ वक़्त के कूड़े दान में डाल दिया। देश प्रेमी शुक्र गुज़ार हैं।

7.    लेकिन इस का  मतलब यह नहीं कि मोदी को राजनाथ इत्यादि अपनी चाटुकारिता   का  शिकार बना डालें, और यहां  तक कह  डालें की यदी इंदिरा ने 1971 के नाम पर इलेक्शन जीती, तो पुलवामा के नाम पे वोट मांगना मोदी के लिए क्यों गलत है। भाई राजनाथ सिंह, आप ने  सीआरपीएफ में 2 दिन भी नौकरी नहीं की, आप के परिवार का कोई व्यक्ति शहीद  नहीं हुआ।

8.  तो  आप को, ना मोदी को, न  किसी और को,  पुलवामा के शहीदों की शहादत की मार्केटिंग करने का   रती भर भी अधिकार नहीं है। आप को सत्ता चाहिए, शौक से लीजिए, लेकिन शहीदों के शवों पे राजनीति की, तो परिणाम अत्यन्त दुखद ही हों गे

9.  कारण मैं बताता हूं भ्राता। कारण स्पष्ट है, चिताओं पर राजनीति करने वाले सदा कुत्ते की मौत मरे हैं, इंदिरा हो, सदाम हो, गद्दाफी हो या  कोई और।

10.  इस लिए मोदी के नाम की चाय पी कर , मोदी की छाया के पकौड़े खा कर बना कोई  मंत्री हो या संतरी हो, इतना अवश्य जान ले,  कि आप मोदी को उस हद्द तक ना इस्तेमाल करें, कि मोदी ही विखंडित हो जाए।

11.  वैसे भी भारत वर्ष इतना चूतिया नहीं, जितना आप समझ रहे हैं, और जिस दिन जनता ने पलट वार किया, वह आप के लिए असहनीय  होगा।
🚩 सत्य ही ईश्वर है🚩
🎙✒गुरु बलवंत गुरूने📚⚔

🚩अब शुरू होने वाली है लोकतंत्र की सब से बड़ी जंग🔥🚩हल्ला बोल, हल्ला बोल🚩✒GBG⚔

1.  हर शहर में छोटे छोटे राजनितिक प्रोपेगण्डा के गेंदबाज और बल्ले बाज़, यानी छोटे छोटे गेबल्ज़ की 'कोर टीमें' बनाई जा चुकी हैं, जिन का काम है, मौजूदा सरकार और मौजूदा नेता के हक़्क़ में दबा कर झूठ बोलना, और किसी भी प्रकार की विपरीत ध्वनि को दबाना।

2.   विपक्ष भी अब कमर कसने में लगा है। यानि मीडिया और सोशल मीडिया पे आरोपों प्रतिरोपों का संघर्ष सा छिड़ने वाला है।

3.  आप कुछ भी कहिये या शेयर कीजिये, आप को रोका जाये गा,  दबाया जाये गा, धमकाया भी जाये गा।

4.  तो मित्रो याद रहे, यदी आप देश से प्रेम करते हैं, तो पार्टी कोई भी हो, आप का मत्त कोई भी हो, जो सही न लगे, उस के खिलाफ आवाज़ अवश्य उठाइये, लेखनी अवश्य  चलाइये। यही आप के होने की निशानी है।

5.   ताक़तवर को सलाम करने की, चढ़ते सूरज को सलाम करने की अपनी ग़ुलाम मानसिकता को त्याग दी जीये। अब समय आ गया है, पगड़ी सम्भालने का, अतः आप अपनी अभिव्यक्ति की आज़ादी का सम्मान कीजिए।

6.  नेता आते जाते रहें गे, आप को वादों से लुभाते, और जुमलोँ के जंगलों में घुमाते फिराते, और यहां तक की धमकाते भी रहें गे।

7.  नेता किसी भी दल का हो, वादे करे गा, ऐसे वादे जो निभाये नहीं जाएँ गे।  जुमलोँ के तीर भी छोड़े जाएँ गे, कई किस्म के छोटे मोटे लालच और भय इत्यादि भी दिखलाये जाएँ गे। कोई चिंता न करें। अपनी अभिव्यक्ति को मरने मत दी जिए, ज़िंदा रखिये।

8.  अभिव्यक्ति की आज़ादी ही असली आज़ादी है। कानून की बंदिशे तो मुग़लों के समय भी थी, अंग्रेजों के समय भी और आज़ादी के बाद भी हैं, मौजूदा सरकार से पहले भी थी, और इस सरकार के उपरांत भी रहे गी,  लेकिन अभिव्यक्ति की आज़ादी सर्वोपरि है, कुछ कहिये, कुछ लिखिए, और सच्च का साथ दीजिये।

9.   अनिवार्य नहीं की सब का सच्च एक हो।  आप का और मेरा सच्च भिन्न हो सकते हैं। हमारी राजनितिक सोच अलग हो सकती है, लेकिन शोध चिंतन और चर्चा के बाद, जो भी आप को ठीक लगे, उस का साथ दीजिये।

10.  यदी आप किसी लोभ-वश या भय-वश किसी का साथ देते हैं,  तो समझ लीजिये कि मूलतः आप, असत्य के साथ खड़े हैं, और यदी आप केवल अपनी अंतहकरन की आवाज़ के साथ हैं, तो आप सत्य के योद्धा हैं।

11.   युद्ध मज़ेदार होने वाला है, मंगलमय चित के साथ इस युद्ध में उतरिये। सभी को शुभआशीष। सर्व का मंगल हो।
🚩तत्त सत्त अकाल🚩
©✒गुरु बलवन्त गुरुने⚔

🚩क्यों पिट गया ब्रांड मोदी❓🚩@ ✒⚔

1.  मैं दरअसल मोदी जी की बहुत इज़्ज़त करता  था, न जाने क्यों एक विश्वास सा था , कि यह बन्दा व्यवस्था में सार्थक बदलाव लाये गा, क्यों की यह जिस विशवास और जज़्बे से बोलता हैे, अवश्य कुछ कर दिखाए गा, लेकिन हुआ सब उस  का उल्टा।

2.  पहली ख़ुशी तो तब हुई जब पार्लियामेंट में जाते हुए सीढ़ियाँ चूमी, लेकिन अगले ही पल जिस प्रकार बन्दे ने अडवाणी जी को बेआबरू किया, तो मैं समझ गया, राष्ट्र ने बहुत ही गलत  घोड़े पे दाव खेल दिया है,  बहुत टेढी मेढ़ी चाल चलने वाला है।

3.   फिर नोट बन्दी, बैंको में हड़कंप, और न जाने क्या क्या। अरे भाई नोट का रंग बदलने से विकास होता हे क्या।  इक ऐसा खब्ती पहले भी दिल्ली में गद्दी नशीन हुआ था, जिस ने चमड़े के सिक्के चलाये थे, और एक अपने झोले वाले बाबा हैं।  इस सब से आम आदमी का क्या संवरा? कोई बताये, और यदी खुद समझा हो तभी समझाये , वरना कमेंट डिलिट कर दूँ गा।  बेवजह की जुमलेबाज़ी नहीं चाहिए।

4.   फ़िर टेक्स का चक्कर चला, एक टैक्स बोला तो न सिर्फ अनेक टैक्स का दौर आया, लेकिन यह भी हुआ की देश की कर व्यवस्था, खुद ही कितनी देर समझ न पायी की क्या करना है।  अभी फिर बदलाव हुआ है,  यानी और कंफ्यूज़न।

5.  चाहता था एक समय जब मैं मोदी जी को  तो सराहता था, लेकिन अब केवल एक हैरान परेशान व्यक्ति की तरहं देखता हूँ,  जो यह देख कर हैरान है की इतनी सीनियर पोजीशन पे जा के भी कोई व्यक्ति किस असानी के साथ देश के साथ और इतिहास के साथ, बस बातों की राजनीती कर रहा है, केवल जुमलेबाज़ी कर रहा है।

6.  अब तो इस बात पे और भी हैरान हूँ कि उन्हीं ने भारतीय राजनीती को झूठ के बेधड़क तुष्टि-करण का एक न्या कारख़ाना बना दिया है।  विपक्ष की सरकारें तो पहले भी बनी हैं लेकिन नमो जैसी दावेदारी किसी के पास न थी लेकिन फ़िर भी नमों ने  बस जुमलोँ की राजनीती जारी रक्खी,  और देश की किस्मत बदलने का मौका खो दिया।

 7.   नौ किलीमीटर की सड़क का उद्घाटन प्रधान मंत्री करने जाते हैं और केवल 9 दिन में, आधी सड़क लापता, या फिर ध्वस्त। देश की बैंक व्यवस्था ध्वस्त। राफेल डील में जो जहाज़ तकरीबन 500 करोड़ का मिल रहा था, उसे ही 1400 करोड़ में खरीदा, और जहाज  128 से घटा कर 37 कर दिए गये,  और सरकारी कारख़ाने  'HAL' से भारत में रैफल के निर्माण की डील को,  जुमा जुमा बनी अम्बानी की कम्पनी को दे दिया गया।  पुरानी रेल लाईनों और गाड़ियों का हाल खस्ता है, बुलेट ट्रेन चलाने के करार किये गये, भाई मुम्बई में पुल गिर रहे हैं, बरसात में मुम्बई को ठीक रखने की व्यवस्था ही कर दो,  कांग्रेस का निर्मल भारत प्रोग्राम चल रहा था, लेकिन उसी का नाम बदला, स्वच्छ भारत बोल कर,   कर दिया उद्घाटन।

9.   जो करने बाले काम थे एक नही किया।  यूनिफाइड सिविल कोड लाये क्या ?   नहीं।.   पीडीपी के साथ मिल कर 4 साल कश्मीर में सत्ता सुख भोगा, सेंकडो जवान शहीद करवा दिए, सैंकड़ों कश्मीरी मरवा दिए, अंधे कर दिया, और 4 साल मज़े से कुर्सी पकड़े  रहे, आख़िरी साल महबूबा ओ महबूबा तू है बेवफा,  गाते हुए निकल लिए झोला उठा के, सारा गन्दगी का घड़ा महबूबा के सर पे फोड़ दिया।  इसे निति या राजनीती नहीं , आचार्य चाणक्य ऐसे चलन को कुनीति कहते हैं। चाणक्य के अनुसार किसी कार्य को शुरू करने से पहले कुछ सवाल खुद से जरूर पूछें,
१. मैं यह क्यूँ कर रहा हूँ❓
२. इसके क्या परिणाम होंगे ❓
३. क्या यह सफल होगा❓
४. इस से देश या समाज का क्या फायदा हो गा❓
 ५ कहीं मैं केवल निजी स्वार्थ के लिए यह सब तो नही कर रहा❓

10.  खुद को सिद्ध करने के लिए आधी दुनिया घूम आये साहिब, कुल मिला के अंतर्राष्ट्रीय रिजल्ट जीरो। भूटान चीन के साथ आँख मिचोली खेल रहा है। नेपाल चीन की गोदी में बैठा है, पाकिस्तान तो रक्षा सम्बन्धों के चलते चीन का हिस्सा ही बन चूका है,  इरान से सम्बन्ध कब तक और कितने रुक  पाएं गे, चिंतनीय है, मालद्वीप चीन को बाप मान चुका है, और श्रीलंका तो चीन ही का दत्तक पुत्र बना हुआ है और, म्यानमार  हो या बंग्लादेदश, सिवाये शरणार्थी और उन शरणार्थियों में छिपे हुए आतंकियों के, इन के पास है ही क्या भारत को देने के लिए ?   तो भाई जी, किस की ताली बटोर कर लाये हो उन वेदेश यात्राओ से, क्या मिला 1400 करोड़ खर्च कर के,  बाबा जी का ठुल्लू।

11.   किसी ने पूछा कि भाई गद्दी खली पड़ी है, लाला जी कहाँ हैं ?  उत्तर मिला  के  लाला जी को बाजार घूमने का शौक लग गया है।
अच्छी बात, तो कोई मैनेजर बिठा दें दुकान पर ! नहीं जी, वह किसी और पे विशवास नहीं करते, बस खुद ही पे विशवास है।
  इस तरहं तो दुकान नुकसान में चली जाये गी,---कोई बात नहीं जी, लाला जी तो फ़क़ीर हैं, झोला उठा कर किसी और दुकान पे जा बैठें गे।

 12.   केवल जुमलोँ से देश नहीं चलता। कुछ काम जो केवल 2 साल के अंदर किये जाने चाहिए थे, वह अब तक नहीं किये गये।  अगर कुछ पत्ते फेंकने में देरी कर दी जाये, तो आप चाहते हुए भी विजयी नहीं बन सकते।   समय पे काम किया होता तो आज गुणगान करने वाले ज्यादा होते, काम तो कोई किया नहीं, बाते बांटी हैं बस थोक के भाव।

13.   तो क्या इस  बार सब के सब वादेे दोहराये जाएँ गे ?
या यह कहा जाये गा के 5 साल में क्या होता है, 5 साल और दो, या फिर कुछ नये जुमले घड़े जाएँ गे , और पांच साल मांगने के लिए।
 जबाब हैे, नहीं मिलें गे। आज नमो झूठे और मक्कारों की फेहरिस्त में सब से ऊपर खड़े हैं, और हमारा काम है झूठे का साथ कभी नहीं  देना।

14.   हमें कुछ सत्य मानने पड़ते हैं,  मैं चाहता हूँ की नमो व्ह बदलाव लाने के क़ाबिल बनें, जिन की हम सभी को चाहत है, लेकिन फ़िलहाल यह सम्भव नहीं दिखता।  जीत भी गये तो अलोकप्रियता और भी बढ़े गी, क्यों की व्यवस्था परिवर्तन की जगह केवल वाक्य प्रबलता का युद्ध ही लड़ा गया है, और इस बार यह देश के लिये विध्वंसक साबित हो गा।

15.  अभी भी समय है, यूनिफाइड कोड बिल ला कर,  कुछ तो ऐसा करना चाहिए, जो भारत के अभिनन्दन का पात्र भी हो और द्योतक भी हो, वरना सब व्यर्थ अनर्थ का विवाद है।
🚩तत्त सत्त अकाल🚩
✒गुरु बलवन्त गुरुने🚩

🚩क्या है कर्नाटक की जन्ता का जनादेश⁉🚩@✒GBG⚔

1.  कर्नाटक ने एक बहुत बढ़िया जनादेश दिया, और सही किया। जन्ता ने किसी एक दल को बहुमत नहीं दिया, और किसी की भी दाल गलने नहीं दी, यानि सत्ता की बोटी भूखे कूकर दल में कुछ इस तरह फेंकी, की कूकर दौड़ अभी भी जारी है। 

2.   बीजेपी को 104 सीट दी तो जदस और कांग्रेस को अलग अलग  37 और 78, यानि 115 सीट दी। 224 सीटों की विधान सभा में सरकार बनाने के लिए कम से कम 113 सीट चाहिए, यानी भाजपा को 9 विधायकों की दरकार है।

3.  आइये अब जनमत का इक दूसरा, लेकिन बेहद संजीदा और आवश्यक पहलू भी देखें, यानी देखें की किस दल को कितनी % जन्ता ने वोट दिया। आइये  देखें और परखें की शुद्ध जनादेश क्या कहता है।

4.  परसेंटेज ऑफ़ वोटस में कांग्रेस सब से आगे है। जन्ता ने कांग्रेस को 38 % वोट, भाजपा को 36.2% वोट और देवे-गौड़ा की जन्ता दल सेकुयलर को 18.3% वोट दिए। कुल मिला कर कांग्रेस और जदस को  38% +18.3 % वोट , यानी 56.3% वोट मिले।  इस हिसाब से जदस+कांग्रेस को जन्ता ने  भाजपा से 20.1%  वोट ज्यादा  दिए।

5.  नतीजा साफ है, जन्ता ने भाजपा को 36.2% वोट, और भाजपा के खिलाफ लड़ रही पार्टियों को 56.3% वोट दे कर, भाजपा के खिलाफ़ जन-आदेश दिया है। यानी जनादेश भाजपा और कांग्रेस, दोनों के खिलाफ है, लेकिन इस सब में ही छिपी है, जन्ता के जनादेश की असली पहेली।

6.   राजयपाल ने यदुरप्पा को 104 सीटों की बिनाह पर सरकार बनाने का निमन्त्रण और बहुमत सिद्ध करने के लिए 15 दिन का वक्त दिया, लेकिन साथ ही शीर्ष अदालत ने आज शाम 4.30 बजे तक फ्लोर टेस्ट का आदेश भी दे दिया, और यद्दूरप्पा द्वारा आनन फ़ानन में किये गए बड़े पुलिस तबादले, और बाकी तुग़लकी फैसलों पर भी रोक लगा दी। आखिर क्यों ⁉  यह विचारणीय है। जाहिर है की राज्यपाल के फैसले से शीर्ष अदालत सहमत नहीं, और इस के चलते संविधान के प्रावधानों का संज्ञान लेते हुए, शीर्ष अदालत ने अपना फैसला सुनाया।

7.   स्पष्ट है की कोर्ट ने न सिर्फ जदस+कांग्रेस संयुक्त के 115 सीटों का संज्ञान लिया हो गा, बल्कि इन दोनों दलों के जॉइंट वोट शेयर (56.3% वोट बैंक) का भी संज्ञान लिया हो गा। कोर्ट ने यह भी अवश्य देखा हो गा की किसी दल, जिसे अभी सिर्फ अंतरिम सरकार बनाने का मौका मिला है,  उस का नेता, बिना मुख्यमंत्री की शपथ लिए ही मुख्यमंत्री बन बैठा है। काहे भैया, क्या यह तुग़लक़ का ज़माना है, या संविधान का राज्य। कभी मत भूलिये गा की भारत व्यक्ति साशित राज्य नहीं, बल्कि एक सविंधान द्वारा शाषित लोकतान्त्रिक  प्रजातन्त्र है।

8.    एक बात अवशय उभर कर आई है, की जन्ता ने मेरे  द्वारा प्रसारित 'बदली कर,  बदली कर', के पैराडाइम को लागु किया, यानी कोंग्रेस को सब से ज्यादा वोट दे कर भी कम सीटें दे कर अकेले सरकार बनाने के क़ाबिल नहीं छोड़ा, लेकिन जनादेश भाजपा को सरकार बनाने का भी नहीं दिया गया है, इतना तो आंकड़ो से स्पष्ट है ।

9.  जनादेश का एक अत्यंत विशेस पहलू यह है, कि 'जन्ता-दल-सेकुयलर' और कॉंग्रेस के पास संयुक्त 115 सीटे हैं, और 56.3%  वोटर। तो इस के चलते सरकार इन्ही की होनी चाहिए, मुख्यमंत्री और ज्यादा मंत्री जदस के होने चाहिए। कहता चलूँ कि कर्नाटक की मिनिस्ट्री में तकरीबन 75 मिनिस्टर हुआ करते हैं, और अगर जदस संयुक्त/एकजुट रहती है, तो जदस का हर विधायक, देर सवेर मंत्री बन सकता है, और अपने चुनाव क्षेत्र के लिए कुछ खास कर सकता है।

10.  जन्ता का फैसला साफ़ है, किसी एक दल को सम्पूर्ण बहुमत नही दे कर, जन्ता ने मिलीजुली सरकार का जनादेश दिया है।  आगे क्या होता है, जो हो गा, ठीक हो गा, या गलत, इस का फैसला मैं जन्ता पे ही  छोड़ता हूँ,  नमो और अमित 8 से 9 विधायक जुटा लें गे या यद्दूरप्पा  को मैदान छोड़ कर भागना हो गा।

11.  यह भी कहता चलूँ कि यदी भाजपा सरकार बनाती है तो इसे अपनी बड़ी जीत के तौर पे,  और यदी सरकार बनाने में नाकामयाब रही तो उसे अपनी कुर्बानी के रूप में पेश करे गी। 

12.  याद रहे कि कर्नाटक की केवल 72.13% जन्ता ने ही एलक्शन में हिस्सा लिया। यानी बाकी तकरीबन 27% लोगों को या तो परवाह ही नहीं की कौन उन का सञ्चालन करे, या उन्हें अपने अधिकार की ज़िम्मेवारी निभाने का आभास ही नहीं है।

13.   अब गुरु गुरुने का मास्टर स्ट्रोक।  याद रहे की बहुमत का जुगाड़ न होने पर यदि यदुरप्पा और भाजपा पतली गली से निकले भी, फिर भी उन की कोशिश यही हो गी, की 2019 से पहले पहले, वह जदस के  दो तिहाई विधायकों को साम, दाम, दण्ड भेद का इस्तेमाल कर के तोड़ते हुए, कर्नाटक की जदस+कांग्रेस सरकार को गिरा सके। ऐसा कर के वह खुद को हीरो बनाने, और नमो की छवी चमकाने की एक बड़ी क़वायद में जुड़ सकते हैं।

14.  यह भी याद रहे की कम से कम अब तक भाजपा, जदस के किसी विधायक को तोड़ नहीं सकी, जिस के कारण स्पष्ट हैं। पहला सुप्रीम कोर्ट का खुला चयन, यानि ओपन वोटिंग द्वारा फ्लोर टेस्ट में उतरने का आदेश, दूसरा एंटी डेफेक्शनन कानून, और तीसरा व्हिप का लागू होना। जदस की सब से बड़ी विजय यही हो गी, की वह कम से कम 2 वर्ष तक, और हो सके तो 5 वर्ष तक अपनी एकता को भंग न होने दे।

🚩तत्तसत्तश्रीअकाल🚩
©@✒ गुरु बलवन्त गुरुने⚔