1. भारत के राजनेता लगातार भारतवासियों को, दशकों से राजनैतिक धोखा देते चले आ रहे हैं। यहां खुद के खिदमतगार नेता, खुदा, धरम, जात, इलाका या किसी व्यक्ति के नाम पे वोट प्राप्त कर के, सत्ता के मज़े लूट रहे हैं, और देश का, व्यवस्था और जनता का शोषण कर रहे हैं, लगातार पिछले 70 साल से।
2. भारत एक पार्लियामेंट्री डेमोक्रेसी है, यानी यहां लोगों को चाहिए कि वह केवल लोकल मुद्दों को ध्यान में रखते हुए, अपने लिए लोकसभा या विधानसभा में भेजने के लिए एक काबिल लोकल नेता को चुनें। फ़िर इन चुने हुए नुमाइंदों को अपना नेता चुनने दो, जो देश का प्रधान मंत्री या प्रदेश का मुख्य मंत्री बने।
3 लेकिन देश का दुखांत यह रहा, कि मंगल पांडे, राजगुरु, आज़ाद, बिस्मिल, और भगत सिंह जैसे बगावती शहीदों की कुर्बानियों पर बना यह देश, केवल हरामी चमचों का मुल्क बन कर रह गया।
4. यानी नेहरू इंदिरा के दौर में शुरू हुआ व्यक्ति वाद का खेल, पहले पर्टिवाद पे भारी पड़ा। यहां तक कि नेहरू इंदिरा के रसोइए, नाई, धोबी बटलर, सब नेता बन गए। यानी एक ऐसा दौर शुरू हुआ कि जिस में किसी व्यक्ति का राजनैतिक कद्द, काब्लियत से नहीं, बल्कि चापलूसी से नापा जाने लगा। यानी आप परिवार के चमचे कितने बड़े है, वह आप के राजनैतिक भविष्य का मानक बन गया।
5. इस विध्वंसक और वीभत्स व्यूहरचना से निकलने के लिए, वाजपई ने गाय रक्षा का सहारा लिया, आडवाणी ने मन्दिर मस्जिद का, जब की वह असली मुद्दों, जैसे भ्रष्टाचार कुव्यवस्था की बात कर के भी चुनाव जीत सकते थे, लेकिन फिर भी, वाजपई ने गाय रक्षा का सहारा लिया, और आडवाणी ने मन्दिर मस्जिद का, और वहां से शुरू हुआ राजनीति का अत्यन्त दूषित कुचक्र।
6. मोदी इस विकार युक्त सोच और नीति से उपजा हुआ नेता है, तो मोदी को अपराधी क्यों माना जाए। मोदी की देश के प्रति सर्वोत्तम सेवा यही है, कि मोदी ने नेहरू, इंदिरा और वाजपई आडवाणी की विरासत को एक साथ वक़्त के कूड़े दान में डाल दिया। देश प्रेमी शुक्र गुज़ार हैं।
7. लेकिन इस का मतलब यह नहीं कि मोदी को राजनाथ इत्यादि अपनी चाटुकारिता का शिकार बना डालें, और यहां तक कह डालें की यदी इंदिरा ने 1971 के नाम पर इलेक्शन जीती, तो पुलवामा के नाम पे वोट मांगना मोदी के लिए क्यों गलत है। भाई राजनाथ सिंह, आप ने सीआरपीएफ में 2 दिन भी नौकरी नहीं की, आप के परिवार का कोई व्यक्ति शहीद नहीं हुआ।
8. तो आप को, ना मोदी को, न किसी और को, पुलवामा के शहीदों की शहादत की मार्केटिंग करने का रती भर भी अधिकार नहीं है। आप को सत्ता चाहिए, शौक से लीजिए, लेकिन शहीदों के शवों पे राजनीति की, तो परिणाम अत्यन्त दुखद ही हों गे
9. कारण मैं बताता हूं भ्राता। कारण स्पष्ट है, चिताओं पर राजनीति करने वाले सदा कुत्ते की मौत मरे हैं, इंदिरा हो, सदाम हो, गद्दाफी हो या कोई और।
10. इस लिए मोदी के नाम की चाय पी कर , मोदी की छाया के पकौड़े खा कर बना कोई मंत्री हो या संतरी हो, इतना अवश्य जान ले, कि आप मोदी को उस हद्द तक ना इस्तेमाल करें, कि मोदी ही विखंडित हो जाए।
11. वैसे भी भारत वर्ष इतना चूतिया नहीं, जितना आप समझ रहे हैं, और जिस दिन जनता ने पलट वार किया, वह आप के लिए असहनीय होगा।
🚩 सत्य ही ईश्वर है🚩
🎙✒गुरु बलवंत गुरूने📚⚔
2. भारत एक पार्लियामेंट्री डेमोक्रेसी है, यानी यहां लोगों को चाहिए कि वह केवल लोकल मुद्दों को ध्यान में रखते हुए, अपने लिए लोकसभा या विधानसभा में भेजने के लिए एक काबिल लोकल नेता को चुनें। फ़िर इन चुने हुए नुमाइंदों को अपना नेता चुनने दो, जो देश का प्रधान मंत्री या प्रदेश का मुख्य मंत्री बने।
3 लेकिन देश का दुखांत यह रहा, कि मंगल पांडे, राजगुरु, आज़ाद, बिस्मिल, और भगत सिंह जैसे बगावती शहीदों की कुर्बानियों पर बना यह देश, केवल हरामी चमचों का मुल्क बन कर रह गया।
4. यानी नेहरू इंदिरा के दौर में शुरू हुआ व्यक्ति वाद का खेल, पहले पर्टिवाद पे भारी पड़ा। यहां तक कि नेहरू इंदिरा के रसोइए, नाई, धोबी बटलर, सब नेता बन गए। यानी एक ऐसा दौर शुरू हुआ कि जिस में किसी व्यक्ति का राजनैतिक कद्द, काब्लियत से नहीं, बल्कि चापलूसी से नापा जाने लगा। यानी आप परिवार के चमचे कितने बड़े है, वह आप के राजनैतिक भविष्य का मानक बन गया।
5. इस विध्वंसक और वीभत्स व्यूहरचना से निकलने के लिए, वाजपई ने गाय रक्षा का सहारा लिया, आडवाणी ने मन्दिर मस्जिद का, जब की वह असली मुद्दों, जैसे भ्रष्टाचार कुव्यवस्था की बात कर के भी चुनाव जीत सकते थे, लेकिन फिर भी, वाजपई ने गाय रक्षा का सहारा लिया, और आडवाणी ने मन्दिर मस्जिद का, और वहां से शुरू हुआ राजनीति का अत्यन्त दूषित कुचक्र।
6. मोदी इस विकार युक्त सोच और नीति से उपजा हुआ नेता है, तो मोदी को अपराधी क्यों माना जाए। मोदी की देश के प्रति सर्वोत्तम सेवा यही है, कि मोदी ने नेहरू, इंदिरा और वाजपई आडवाणी की विरासत को एक साथ वक़्त के कूड़े दान में डाल दिया। देश प्रेमी शुक्र गुज़ार हैं।
7. लेकिन इस का मतलब यह नहीं कि मोदी को राजनाथ इत्यादि अपनी चाटुकारिता का शिकार बना डालें, और यहां तक कह डालें की यदी इंदिरा ने 1971 के नाम पर इलेक्शन जीती, तो पुलवामा के नाम पे वोट मांगना मोदी के लिए क्यों गलत है। भाई राजनाथ सिंह, आप ने सीआरपीएफ में 2 दिन भी नौकरी नहीं की, आप के परिवार का कोई व्यक्ति शहीद नहीं हुआ।
8. तो आप को, ना मोदी को, न किसी और को, पुलवामा के शहीदों की शहादत की मार्केटिंग करने का रती भर भी अधिकार नहीं है। आप को सत्ता चाहिए, शौक से लीजिए, लेकिन शहीदों के शवों पे राजनीति की, तो परिणाम अत्यन्त दुखद ही हों गे
9. कारण मैं बताता हूं भ्राता। कारण स्पष्ट है, चिताओं पर राजनीति करने वाले सदा कुत्ते की मौत मरे हैं, इंदिरा हो, सदाम हो, गद्दाफी हो या कोई और।
10. इस लिए मोदी के नाम की चाय पी कर , मोदी की छाया के पकौड़े खा कर बना कोई मंत्री हो या संतरी हो, इतना अवश्य जान ले, कि आप मोदी को उस हद्द तक ना इस्तेमाल करें, कि मोदी ही विखंडित हो जाए।
11. वैसे भी भारत वर्ष इतना चूतिया नहीं, जितना आप समझ रहे हैं, और जिस दिन जनता ने पलट वार किया, वह आप के लिए असहनीय होगा।
🚩 सत्य ही ईश्वर है🚩
🎙✒गुरु बलवंत गुरूने📚⚔