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🚩उलझ गया विपक्ष, उलझ गई जनता, गलत खेल गए दोनों ही, CAB की गुगली गेंद.🚩✒GBG⚔

1.  हर समाज, देश या प्रजा में सब कुछ हमेशा ठीक नहीं रहता। हालां कि सभी को हमेशा खुश रखना तो किसी भी सरकार के लिए संभव नहीं, पर फ़िर भी कुछ एसे हालात भी बनते हैं जब ज्यादा तर प्रजा राजा से नाराज़ हो जाती है, इस हद तक कि जिस के हक़ में जनादेश दिया हो, उसी के ख़िलाफ़ जनाक्रोश पैदा हो जाता है।

2.   बहुत बार राज्य के बहुत से फैसले और पॉलिसियां गलत होती हैं, और  जनता सरकार से बुरी तरह खफा हो जाती है। जब आक्रोश हद से बढ़ जाए, तो उस आक्रोश को मैनेज करना आवश्यक हो जाता है।

3.   आक्रोश मैनेज करने के दो तरीके हैं।   पहला आक्रोश के कारण मिटा दिए जाएं। ज्यादातर यह सम्भव नहीं होता, क्यों कि यदि इतनी बड़ी डिससेटीसफेकष्न को यदी सरकार मिटा सकती, तो पैदा ही क्यों होने देती।

4.   दूसरा आक्रोश की दिशा परिवर्तित की जाए, यानी किसी नए मेनेजेबल  आक्रोश  से पुराने अनमेनेजेब्ल आक्रोश को विस्थापित कर दिया जाए। 

5.  असल में क्या हो रहा है, असली मुद्दे क्या हैं, जनता  जियादा कुछ नहीं समझ सकती। वह भावनाओं द्वारा ड्रिवन होती है, लॉजिक या रीज़न  द्वारा नहीं।

6.  तभी तो आज तक इंसानी समाज में धर्म की राजनीति का इतना बोलबाला है। यदी इंसान इमोशन्स का ग़ुलाम ना होता तो खुद ही सोचिए, कि क्या चांद पे पहुंच चुका इंसान मन्दिर मस्जिद में, या जात पात में उलझा होता।

7  इंसान की कलेक्टिव भावनाएं  बांध में रुके पानी के समान होती हैं, जो टूट कर निकलना चाहती हैं,  और अंततः बांध ही को तोड़ देती हैं, लेकिन यदि कोई किसी निकासी की सुरंग को खोल दे, तो सारा पानी का प्रेशर, उस सुरंग द्वारा डीप्रेशराईज किया जा सकता है।

8.  देश में ऐसा ही कुछ हुआ है। जनता में नोट बन्दी, GST, बेरोज़गारी, कारखानों पे लगते ताले, और ज़बरदस्त मंदी के ख़िलाफ़ गुस्सा था और है।   हालां की यह परिस्थितियां सरकार की गलतियों द्वारा ही पैदा हुई, लेकिन इन  सब विपदाओं का कोई हल सरकार के पास नहीं था।

9.   मरता क्या न करता।   देश के सत्ता पक्ष ने CAB नामक सुरंग खोदी, और जनाक्रोश का सारा प्रेशर, उस सुरंग में से निकाल दिया।

10.   विपक्ष भी CAB कैब चिलाने में उलझ गया। इस बेमानी से विषय में देश के सारे ज्वलंत  मुद्दे खो कर रह गए। विपक्ष का और जनता का ऐसा बेवकूफ़ बनता मैंने पहले कभी नहीं देखा था। वाह रे भानजे तो कहना होगा। क्या विद्यार्थी, क्या बाकी सब लोग, सब CAB की कैब में सवार हो कर निकल पड़े प्रदर्शन नगर की सैर पे।

11.  इस सारी कवायद से विपक्ष और जनता के कुछ बड़े नुकसान, और सत्ता पक्ष के कुछ खास फायदे हुए। ज्यादा डिटेल में  न जाते हुए, बिलकुल संक्षेप में इशारा करता हूं, क्यों के समझदार को इशारा ही काफी है।

12.  सब से पहले तो याद रखिए कि विपक्ष ने असली मुद्दों से पैदा हुए प्रदर्शन और विरोध के असली मौकों को गुमा दिया।

13.  सत्ताधारियों द्वारा फील्ड में दसियों  मुद्दे "गलत गेंद पे गलत शॉट खेल कर" पहले ही उठाए  जा चुके थे। यह मुद्दे इतने गंभीर और कैच इतने आसान थे कि स्ताधारी बैटिंग साइड को 5 साल के शाषण के बाद ही कैच आउट किया जा सकता था,  लेकिन विपक्ष और जनता, दोनों ही सुस्त रहे।

14.  अब जब स्त्ताधरियों ने अपनी ही एक जान बूझ कर उछाली गई फर्जी सी प्रेक्टिस बाल पे हेलीकॉप्टर शॉट जड़ दिया, तो सभी लोग, क्या विपक्ष और क्या आमजन, उस को पकड़ने दौड़ पड़े, और बाकी सभी कैच मिस कर दिए हैं।

15.  यह भी याद रहे, कि नारे लगाना,  प्रदर्शन करना सबके बस की बात नहीं होती। यह हिम्मत किसी किसी में होती है। सभी मुद्दों पे खिलाफत की जुर्रत करने वाले, ज्यादा तर सेम ही लोग होते हैं। यह लोग भी थक जाते हैं, या फ़िर थका दिए जाते हैं।  सरकार के पास 4 साल बाकी हैं, और अपने इरादों को पूरा करने की दबंगई इच्छा भी।

16.  अब एक तो कहानी फ़िर से हिन्दू बनाम मुस्लिम हो गई है, यह सरकार नहीं कह रही, बल्कि खुद प्रदर्शनकारी बकते फिरते हैं।  बाकी  जो लोग आवाज़ उठाने की हिम्मत रखते हैं, वह भी रजिस्टर कर लिए गए हैं, तो हो गया एक किस्म का नागरिक रजिस्टर भी।

17.   बाकी कुछ कहना बेमानी हो गा, क्यों कि मैं तीर निशाने पे मार चुका हूं, सो चिंगम चबाने की कोई बाकी वजह ही नहीं।

18.   यह भी समझने की बात है, कि यदि  मान लीजिए उपनिवेश के सभी हिन्दू, सिक्ख, ईसाई, पारसी, बुद्ध और जैन मिनियोरीटीज़ को भारत में शरण दे भी दी जाए, तो क्या बकाया बचे गैर कानूनी बांग्लादेशियों को  सरकार चांद पर छोड़ आएगी। ज़रा सोचो।

19   भाई यह सब राजनीति है, और गधे हैं वह सभी लोग जो इस ट्रैप में उलझ गए हैं।   है ना मज़े की बात।

20. फ़िलहाल विपक्ष के सारे शोरशराबे का रिजल्ट बस इतना है, की खर्चा रुपया, फायदा चार आने भी नहीं।  देखना यह है, कि क्या जनता इस  CAB में ही घूमती रहेगी, या इस के सहारे बाकी असली मुद्दों को पकड़ लेगी ?

21.  यहां यह भी बताता चलूं कि जो राज्यों के कुछ  मुख्यमंत्री यह कहते सुने जा रहे हैं, कि वह CAB को अपने राज्य में लागू ही नहीं करें गए, दरअसल जनता को छलने के इलावा कुछ भी नहीं कर रहे हैं । 

22.  CAB एक सिटिज़न अम्मेंडमेंट एक्ट है, जिसे भारतीय पार्लियामेंट के दोनों हाउस पास कर चुके हैं, और माननीय राष्ट्रपति भी एप्रूव कर चुके हैं। अब यह एक पक्का कानूनी प्रावधान है।  आप के लिए यह जानना आवश्यक है कि नागरिकता पूरी तरह से यूनियन का विषय है। नागरिकता के लेने देने में, या इस के मानक तय करने में राज्यों का कोई भी हस्तक्षेप संभव ही नहीं है।   सो अमित शाह, कम से कम कानूनी तौर पे तो ठीक ही कहता है, जब वो कहता है कि कैब तो लागू होगा, क्यों कि इस में कोई कानूनी अड़चन नहीं है।

23.  मेरा मानना है कि, ममता हो या कोई और, सभी नेता, इस कानूनी संशोधन का विरोध कर के, जनता की राजनीतिक विरोध की ऊर्जा और जनता के समय और धन की बरबादी करने के इलावा, और कुछ भी नहीं कर रहे, क्यों कि विरोध के लिए CAB से कहीं ज्यादा बड़े मुद्दे आलरेडी हाजिर हैं।   अगर हिन्दू मुस्लिम पे ही जोर देते रहे तो बाकी मुद्दे, जैसे बेरोज़गारी, मंदी,  राजनीति में किए गए झूठे वादे, महंगाई इत्यादि, इन सब के ख़िलाफ़ प्रदर्शन कब और कौन करे गा।

24.  कुल मिला कर भारतीय राजनीति का स्तर अब पहले से ज्यादा गिरा हुआ दिखने लगा है। सार्थक डवेलपमेंट यह अवश्य हुई है कि जनता अब पहले से ज्यादा  ठगी हुई, प्रताड़ित, गुस्सैल  लेकिन  मुद्दों पे रोष प्रदर्शन के लिए, ज्यादा उत्साहित और तैयार  नजर आ रही है।
 🚩 सत्य ही शिव है।🚩
✒गुरु बलवंत गुरूने ⚔

🚩क्यों लाज़िमी था धारा 370 का अंत करना❓@✒GBG⚔



1. केवल धारा 370 के चलते एक ऐसा माहौल बनता था,  कि स्कूलों में पढ़ रहे विद्यार्थी, पाकिस्तान और लोकल गद्दारों की श्य पे, किताबें छोड़  पत्थर या बंदूक उठाते, देश के निशान और संविधान, दोनों की तौहीन करते, और खुद को जेहादी समझते। मुल्क की ही थाली में खाते भी और  थूकते भी, और खा कर थूकने के लिए मूर्ख गंवारो या फ़िर शातिर राजनीतिक सियारों द्वारा सराहे भी जाते।

2.  इस कुचक्र के चलते 5000 से ज्यादा फौजी, केवल कश्मीर में अपने कर्त्तव्य के निर्वाहन के चलते शहीद,  हो गए।  यह लोग भारत के विभिन्न हिस्सों से आते थे, जिन्हों ने  कश्मीर, जम्मू और लद्दाख को भारत में बनाए रखने के लिए अपनी जान की बाज़ी लगाई।

3.  370 एक ऐसी गलत फहमी का नाम था, जिस के चलते, कोई बेटा अपनी मां को मां न कह कर, पड़ोसन को अम्मा समझता रहे, और इस धारा का पड़ोसन ने, और आस्तीन के स्रपों ने भरपूर फ़ायदा उठाया। लड़के को गद्दार बनाने की राह पे लगा कर।

4.  पड़ोसन के आज़ादी नामक झूठे वादों के रसगुल्ले खा कर, कश्मीरी युवा बहका रहा। वह समझता था, पड़ोसन आंटी उसे अपना बेटा बनाए गी, यह ना समझते हुए, कि जिस से अपनी बलूच औलाद नहीं संभलती, वह भला तुम्हारा क्या भला करे  गी।

5. ख़ैर कुल मिला कर कश्मीरी खुदकुशी के रास्ते पर चलते रहे। 370 नामक छुरी को देश के गले पर चलाते रहे, यह सोच कर कि वह भारत को हलाल कर रहे हैं। देश मजबूर सा हुआ सब बर्दाश्त करता रहा, फौजी इस भट्ठी का ईंधन बनते रहे, तथा भ्रष्ट नेता इस जलती भट्ठी में अपनी राजनीतिक मुर्गियां भूनते रहे।

6.  इस ही  समय देश में आम जनता में से एक ऐसा नेता उभर रहा था, जिस ने राजनीति बिल्कुल ग्रासरूट से शुरू की,  जिस ने कश्मीर और  हिमाचल, और तमाम देश की परिस्थितियों को बारीकी से समझा, आंदोलनों में हिस्सा लिया, जहां मौका मिला, बेबाक बात कही। उस  नेता का नाम था नरेंद्र मोदी।

7.  15 साल गुजरात का मुख्य मंत्री रहने के बाद, इस नेता के पास राजनीति और व्यवस्था प्रबंधन  की असीम प्रैक्टिकल  नॉलेज और स्किल्स थी। ऐसे में परिवारवाद के चलते,  भारत की लीडर शिप में एक खला उत्पन हुई, और समय रहते उस ख़ला को, विधि के विधान द्वारा, मोदी नामक इस नेता द्वारा भर दिया गया।

8.  मोदी 370 धारा और तमाम बाकी प्रिपेक्षों के चलते, कशमीर में चल रहे तमाम ज़ुल्मो जबर के सभी मूल कारणों को समझते हैं, अतः मोदी ने ठान लिया कि इस नासूर का पक्का इलाज करना होगा।

9.  मोदी ने इस काम के लिए अमित शाह और दोवाल को अपने खास  सिपसालारों के रूप में चुना। बाकी भी सभी ने इस में  अपना अपना योगदान दिया।

10.   लेकिन  इस ऑपरेशन के लिए मोदी ने इस्लामिक हलाल के बदले मूल भारतीय योद्धाओं की विधि, यानी राजपूतों, सिक्खों , गुरखों और मराठों की  विधि,  झटके को चुना। यानी ज्यादा हो हल्ला नहीं, बस एक ही बार में काम तमाम।

11.  मैं आदरणीय मोदी जी और शाह जी को, इस असीम कामयाबी के लिए हार्दिक मुबारकबाद देता हूं। तमाम मुश्किलों के  बावजूद आप  ने जो कर दिखाया, वह अद्वितीय है।
🚩वन्दे मातरम🚩
🚩तत्त्व सत्व श्री अकाल🚩
✒गुरु बलवंत गूरूने⚔