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🚩क्यों लाज़िमी था धारा 370 का अंत करना❓@✒GBG⚔



1. केवल धारा 370 के चलते एक ऐसा माहौल बनता था,  कि स्कूलों में पढ़ रहे विद्यार्थी, पाकिस्तान और लोकल गद्दारों की श्य पे, किताबें छोड़  पत्थर या बंदूक उठाते, देश के निशान और संविधान, दोनों की तौहीन करते, और खुद को जेहादी समझते। मुल्क की ही थाली में खाते भी और  थूकते भी, और खा कर थूकने के लिए मूर्ख गंवारो या फ़िर शातिर राजनीतिक सियारों द्वारा सराहे भी जाते।

2.  इस कुचक्र के चलते 5000 से ज्यादा फौजी, केवल कश्मीर में अपने कर्त्तव्य के निर्वाहन के चलते शहीद,  हो गए।  यह लोग भारत के विभिन्न हिस्सों से आते थे, जिन्हों ने  कश्मीर, जम्मू और लद्दाख को भारत में बनाए रखने के लिए अपनी जान की बाज़ी लगाई।

3.  370 एक ऐसी गलत फहमी का नाम था, जिस के चलते, कोई बेटा अपनी मां को मां न कह कर, पड़ोसन को अम्मा समझता रहे, और इस धारा का पड़ोसन ने, और आस्तीन के स्रपों ने भरपूर फ़ायदा उठाया। लड़के को गद्दार बनाने की राह पे लगा कर।

4.  पड़ोसन के आज़ादी नामक झूठे वादों के रसगुल्ले खा कर, कश्मीरी युवा बहका रहा। वह समझता था, पड़ोसन आंटी उसे अपना बेटा बनाए गी, यह ना समझते हुए, कि जिस से अपनी बलूच औलाद नहीं संभलती, वह भला तुम्हारा क्या भला करे  गी।

5. ख़ैर कुल मिला कर कश्मीरी खुदकुशी के रास्ते पर चलते रहे। 370 नामक छुरी को देश के गले पर चलाते रहे, यह सोच कर कि वह भारत को हलाल कर रहे हैं। देश मजबूर सा हुआ सब बर्दाश्त करता रहा, फौजी इस भट्ठी का ईंधन बनते रहे, तथा भ्रष्ट नेता इस जलती भट्ठी में अपनी राजनीतिक मुर्गियां भूनते रहे।

6.  इस ही  समय देश में आम जनता में से एक ऐसा नेता उभर रहा था, जिस ने राजनीति बिल्कुल ग्रासरूट से शुरू की,  जिस ने कश्मीर और  हिमाचल, और तमाम देश की परिस्थितियों को बारीकी से समझा, आंदोलनों में हिस्सा लिया, जहां मौका मिला, बेबाक बात कही। उस  नेता का नाम था नरेंद्र मोदी।

7.  15 साल गुजरात का मुख्य मंत्री रहने के बाद, इस नेता के पास राजनीति और व्यवस्था प्रबंधन  की असीम प्रैक्टिकल  नॉलेज और स्किल्स थी। ऐसे में परिवारवाद के चलते,  भारत की लीडर शिप में एक खला उत्पन हुई, और समय रहते उस ख़ला को, विधि के विधान द्वारा, मोदी नामक इस नेता द्वारा भर दिया गया।

8.  मोदी 370 धारा और तमाम बाकी प्रिपेक्षों के चलते, कशमीर में चल रहे तमाम ज़ुल्मो जबर के सभी मूल कारणों को समझते हैं, अतः मोदी ने ठान लिया कि इस नासूर का पक्का इलाज करना होगा।

9.  मोदी ने इस काम के लिए अमित शाह और दोवाल को अपने खास  सिपसालारों के रूप में चुना। बाकी भी सभी ने इस में  अपना अपना योगदान दिया।

10.   लेकिन  इस ऑपरेशन के लिए मोदी ने इस्लामिक हलाल के बदले मूल भारतीय योद्धाओं की विधि, यानी राजपूतों, सिक्खों , गुरखों और मराठों की  विधि,  झटके को चुना। यानी ज्यादा हो हल्ला नहीं, बस एक ही बार में काम तमाम।

11.  मैं आदरणीय मोदी जी और शाह जी को, इस असीम कामयाबी के लिए हार्दिक मुबारकबाद देता हूं। तमाम मुश्किलों के  बावजूद आप  ने जो कर दिखाया, वह अद्वितीय है।
🚩वन्दे मातरम🚩
🚩तत्त्व सत्व श्री अकाल🚩
✒गुरु बलवंत गूरूने⚔

© ये हो क्या रहा है, आइए समझें❓@✒GBG⚔

1.  भोपाल से साध्वी प्रज्ञा को भाजपा का उम्मीदवार बनाया गया, जिस ने अपने प्रचार के शुरुआती दौर में ही शहीद   हेमंत करकरे की पाकिस्तानी आतंकियों द्वारा निर्मम हत्या को, न केवल सही,  बताया, बल्कि अपने द्वारा दिए गए श्राप का ही फल  बताया, और फिर यह अती निंदनीय बयान  वापिस ले लिया, और इस तरह   देश वासियों का ध्यान एक बार फ़िर बड़े मुद्दों से हटा कर बेमतलब बयानबाज़ी में उलझा दिया। यह एक  पुराना पैंतरा है, मूर्ख वोटरों की वोट खींच कर  सत्ता पाने की करकट  राजनीति का हिस्सा है।

2.  भाजपा ने पहले तो बयान से किनारा किया,  और बाद में यह कह कर दामन झाड़ लिया, की प्रज्ञा  व्यक्तिगत तौर पे भारी मानसिक और शारीरिक दबाव में से निकली हैं, तो यह बयान प्रज्ञा का व्यक्तिगत मामला है। यानी शहीद करकरे की शहादत को गाली देने वाली साध्वी का जलेबी समर्थन।

3.  प्रधानमंत्री  ने टाइम्स के साथ हुई इंटरव्यू  में  इस विषय पर बोलते हुए प्रज्ञा के बयान को नजरंदाज कर के, 'बेल पे और लोग भी चुनाव लड़ रहे हैं,' इत्यादि इत्यादि की ओर ध्यान मोड़ दिया। प्रधान मंत्री की मजबूरी राजनीतिक है। दुबारा सत्ता पाने के लिए, भोपाल हो या चौपाल, प्रज्ञा हो या अवज्ञा, प्रधानमंत्री को ज्यादा से ज्यादा  जीते हुए सांसद चाहिए, जो पुनः भाई की ताजपोशी में सहायक हो सकें।

4.   यानी  पार्लियामेंट्री डेमोक्रेसी में राष्ट्रपति व्यवस्था की तरह   चुनाव लड़ा जा रहा है।  यानी  व्यवस्था के  गलत प्रचार और प्रचलन के चलते, देश की अब तक की सभी राजनीतिक पार्टियों की सरकारों ने देश की जनता को, ना गधा, ना घोड़ा, बल्कि भार उठाने वाली बांझ सी खच्चर बना के रख दिया है, जिस का काम है, अपनी मेहनत की कमाई  पर राजनैतिक सफ़ेद हाथियों की फौज के लिए टैक्स का राशन ढोना, और ढोते चले जाना, ढोते चले जाना, और ढोते ही चले जाना ।

5.   चर्चिल ने कहा था आज़ादी के 60 साल बाद  भारत पर thieves और thugs  rule करें गे।   वह दिख रहा है।  उस ने यह इस लिए कहा था, क्यों कि वह जानता था, जिस किस्म की पार्लियामेंट्री डेमोक्रेसी की व्यवस्था भारत की जनता को दी जा रही है, उस के लिए  अभी जनता शिक्षित और जागरूक ही नहीं  है।

6.  जहां लोगों को यह ही नहीं पता कि वह प्रधानमंत्री का चुनाव  या  मुख्यमंत्री का चुनाव कर के नहीं, बल्कि  अपने इलाके के लिए एक अच्छा सांसद या विधायक चुन कर,  देश की व्यवस्था और प्रशाषण के सुचारू संचालन में  बेहतर  योगदन कर सकते हैं, वह यह कैसे समझें गे कि, चोरों और ठगों की बारात का दूल्हा चाहे कोई भी है, फ़र्क नहीं पड़ता, क्यों कि चोरों का सरदार अलीबाबा, इन्हीं सब 272 चोरों  के कंधो पे बैठ कर  ही  तो सत्ता पाना चाहता है।

7.  मेरा सविनय निवेदन केवल इतना है, कि यदि मोदी राष्ट्रपति प्रणाली के चुनाव जैसे चुनाव जीत कर  पुनः सत्ता में आते हैं, तो  कम से कम,  इतनी  इमानदारी तो दिखाएं कि व्यवस्था को  राष्ट्रपति व्यवस्था ही में बदल दें।  अमेरिका जैसी हरामी व्यवस्था नहीं, बल्कि केवल शुद्ध रूप में, सभी प्रत्याशियों में से एक व्यक्ति का चुनाव, शीर्ष पद के लिए, और फिर 4 साल तक  सब कुछ उस पे छोड़ दिया जाए, वह जिसे चाहे, काबिलियत के हिसाब से, सरकारी महकमों का प्रमुख बनाए, और फ़िर दबा के डंडा चलाए, और खुद केवल गुड गवर्नेंस एश्योर करे, और इस तरह 543 एमपी और हजारों विधायकों का भार देश की व्यवस्था से उतार फेंके। कानून कौन बनाए गा, यह एक अहम सवाल है, लेकिन अब कौन बना रहा है, यह भी तो इक सवाल है। वक़्त के साथ यह सवाल आसानी से हल कर लिया जाए गा।
⏯ यही होने भी जा रहा है। ⏮
🚩सत्य ही ईश्वर है 🚩
🎙✒गुरू बलवंत गुरुने 📚⚔

🚩लीला पिपासु भारत वर्ष को अभी और कुछ लीलाएं देखनी है🚩©✒GBG⚔

1.  राम लीला या कृष्ण लीला का स्टेज पे मंचन,  इतिहास  मिथिहास, तथा  मानव कल्यान हेतु कहे गए दो  शिक्षा प्रद कथा सूत्रों का अभिनय द्वारा प्रसारण है।

2  राम और कृष्ण इन ग्रन्थों के महानायक हैं,  और उन के अभिनय करने वाले और अन्य पात्रों के द्वारा स्टेज पे कथा का प्रस्तुतिकरण,  इन विशेष ग्रन्थों की कथा को आम-जन के जहन में ज़िंदा रखने का,  और इन की शिक्षा प्रद कहानियों को ताज़ा रखने का साधन है।

3.  इस सब से फायदा और नुकसान दोनों हुए। फायदा तो यह हुआ, कि सुंदर,  शिक्षा सरलतम रूप से आम आदमी तक पहुंची, लेकिन नुकसान भी हुआ। नुकसान यह हुआ कि भारत के आम लोग केवल 'नायक भक्त' बन कर रह गए, और नायक का प्रतिबिंब, नायक से भी बड़ा बन गया, और इस तरह शिक्षा प्रधान बनने कि जगह भारत भक्ती प्रधान  समाज बन गया।

4.  इस भक्ती प्रधान मानसिकता का फायदा, हमारे राजनेताओं ने खूब उठाया। वह मर्यादा पुरूषोतम तो कभी थे ही नहीं, लेकिन लीला पुरूषोतम बनने में उन्हें ने कोई कसर कोर नहीं छोड़ी। यानी इमेज मैनेजमैंट और ड्रामेबाजी का कुचक्र चल निकला।

5.  इस के चलते सभी नेताओं ने अपनी अपनी पब्लिसिटी टीम्स को काम पे लगा दिया। नेहरू लीला में, नेहरू जी देश के भाग्य विधाता और बालजगत के चाचा के रूप में अवतरित हुए । कभी बच्चों के साथ, कभी विश्व विख्यात लीडर, कभी भारत निर्माता के रूप में जवाहर लीला बहुत चली। जहां जाना वहां की टोपी शोपी पहन कर, पगड़ी, हेलमेट, सींग, पंख,  टोकरी,  इत्यादि पहन कर  लीला प्रस्तुत करने का  सर्वप्रथम श्रेय इन्हीं महानुभाव को जाता है।

6. मृत्यु से पहले महात्मा और बापू का इमेज गांधी जी को ऐसा मिला,  कि उन  की मृत्यु के बाद भी गांधी जी की गांधी लीला को खूब भुनाया गया।  उन की चरखा लीला और गांधी टोपी, ऐनक, बकरी,  और भी बाकी बहुत कुछ इस लीला के हिस्से पुर्जे बने रहे।

7. फिर   इंदिरा लीला, का समय आया। लौह इस्त्री से दुर्गा तक, सभी संज्ञाओं से  मैडम को नवाजा  गया। जहां जाना,  वहां की टोपी शोपी पहन कर, पगड़ी, हेलमेट, सींग, पंख,  टोकरी,  इत्यादि पहन कर  लीला प्रस्तुत करने का  प्रचलन नेहरू के बाद सुश्री ने जारी रखा। इंदिरा जी से पहले  शास्त्री जी  आए, वह सरल पुरुष थे, कर्मठ थे, और उन्हें  बिंबो और प्रतिबिंबों के सहारे महानायक बनने का शौक बिल्कुल नहीं था, यानी वह खुद कर्मो के धनी थे।

7.  इंदिरा जी के बाद तो लीलाओं का मेला ही लग गया।  संजय गांधी लीला, इमरजेंसी लीला, सोनिआ लीला , देहली 84 लीला , गुजरात 2002 लीला, मनमोहन की मौन लीला, पप्पू लीला , गप्पू लीला, और लीला ही लीला। यहां तक कि धरना प्रदर्शन लीला भी बहुत चली। मुझे याद है,  हेमा मालिनी, सुषमा स्वराज, स्मृति ईरानी इत्यादि कभी रसोई गैस के सिलेंडर  ले कर, कभी बरतन ले कर, यहां तक  सब्ज़ियों के हार गले में डाल कर प्रदर्शन लीला करने  गलियों में उतरी थीं।

8.   धीरे धीरे नेताओं की लीलाएं मायावी होती गईं। 3-डी का ज़माना, और मोदी की वर्चुअल रैली इत्यादि इत्यादि का दौर आया। मोदी जी भी लीला पुरूषोतम तो पक्के हैं। नेहरू और इंदिरा की तरह विशेष वस्त्र धारी तो हैं ही, विशेष प्रायोजित कार्यक्रम चलाने के भी एक्सपर्ट हैं, जैसे कि मन की बात,  चाय पे चर्चा इत्यादि। फिर कर डाली अचानक ही 15 लाख धन वापसी लीला, नोट बन्दी लीला,  शौचालय लीला,  पकोड़ा लीला, पुलवामा का दुखांत,  फिर बालाकोट में टना टन  लीला,  कहीं शहीदों की तस्वीरों का प्रयोग, कहीं पाकिस्तान पे हवाई हमले की चर्चा ऐसे, कि जैसे अभिनन्दन नहीं, चचा खुद उड़ने वाले स्कूटर से गए, और पाकिस्तान में हथगोले फेंक कर इस्लामाबाद को ही ध्वस्त करके आए हों,  और फ़िर इन सब का पल्ला फैला कर वोटों की मांग। जिधर देखो , लीला ही लीला, यानी नेता करे तो नीतिलीला,  जनता करे तो करेक्टर ढीला।

9.  लीला प्रधान मुल्क है भारत। यानी नौटंकी का शौक़ीन। लेकिन एक लीला अभी बाकी है, ........ और वो है रूद्र लीला। जब रूद्र लीला शुरू हो गी और भारत की प्यासी महा रणचण्डिका काली रूप में  पुनः देशभक्तों से लहू का प्रसाद मांगे गी .... तब होगी  असली लीला, उस में न नए नए कपड़े पहन कर सेल्फी खींचने वाले दिखें  गे, न सब्जियां गले में डाल कर नाचने वाली, ना ट्रैक्टर पे फोटो खिंचवा कर चुनाव प्रचार आरंभने वाली कोई अभिनेत्री। केवल सैनिक दिखें गे,  किसी नेता के सैनिक नहीं, केवल देश के  सैनिक, असली गौरवमयी नवभारत निर्माण के सैनिक, जो खुशी खुशी देश के लिए जान दें गे भी, और जान लेंगे।भी। तब ही गतिमान होगी भारत भूमि,  स्थाई प्रगति और शान्ति की राह पर।
‼तब तक केवल नौटंकी लीला ‼
©✒ गुरु बलवंत गुरूने 📚⚔

🚩मैं भी चौकीदार का नारा छोड़ो, कहो मैं भी वोटर।🚩@GBG

1.  एक दिन देश के निर्वाचित माननीय प्रधानमंत्री ने, जो खुद को प्रधान सेवक कहते थे , खुद को प्रधान सेवक से बदल कर प्रधान  चौकीदार का टाइटल दे दिया। साहिब  पुनः निर्वाचन के युद्ध में कुछ ऐसे उतरे, की जैसे, सब स्कोर कार्ड पहले ही  से भर रखा हो। यानी Absolutely Confident of Victory.

2.    फ़िर क्या था,  विपक्ष  के लोग एक  फ्रांसीसी  जहाज़ के नाम का जाप करने लगे, और रफाल रफाल कहते हुए रफाल का  रायता हर जगह फैलाने लगे।

 3.   इस सब शोर-शराबे के बीच, किसी ने  एक पटाखा छोड़ा, और वह पटाखा था , 'चौकीदार ही चोर है'  का नारा। इस पटाखे का धमाका बड़ी दूर दूर तक सुनाई देने लगा।

4.  अब स्त्ता  धारी दल के सभी थिंक टैंक काउंटर  हमला करने में  जुट गए, और इस शोर का इलाज  ढूंडने में जुट गए।  फ़िर वही हुआ जो अली बाबा चालीस चोर की कहानी में हुआ था। डाकू तो बस अलीबाबा के घर पर निशानी लगा गए थे, लेकिन मरजीना डार्लिंग का कमाल देखिए, मुहल्ले के  सभी  दरवाजों पर वही निशान लगा आयी। डाकू आए तो सभी कोंफ्युज हो गए, के भाई अलीबाबा का घर,  आखिर कौन सा है।

5. बिल्कुल इस ही तर्ज पर, चौकीदार को चोर क्या कहा, एक पूरी की पूरी पलटन ही चौकीदारों कि खड़ी हो गई। क्या मंत्री, क्या संतरी,पलटन के सभी लोग ख़ुद  को  चौकीदार कहने लगे। 'चौकीदार ही चोर है'  की जगह हर ओर 'मैं भी चौकीदार' का शोर फैल गया, और रफाल का रायता, कहीं खो सा गया।

5.  इस बीच कुछ ऐसा भी हुआ कि  जिस की ओर किसी का ध्यान ही नहीं गया। अंबानी बन्धुओं में भरत मिलाप हो गया। लेकिन इस नाटकीय मिलाप में जो बड़ा राज़ छिपा था,  वह  'चौकीदार चोर है,  तथा 'मैं भी चौकीदार'   के शोर में  किसी को नज़र ही नहीं आया।

6.  दरअसल बात सोचने समझने की तो यह थी कि अनिल अंबानी जिसे मुकेश अंबानी ने 450 करोड़ रुपए दे कर गरिफ्तारी से बचाया, वह भला रफाल के 25000 करोड़ ₹ के कारखाने को लगाने का ठेका, और इस काम के लिए ऋण की गारंटी, किन आधारों पर ले गया। जो भी हो,  रफाल का  करोड़ों रुपए का प्रोजेक्ट अनिल को मिलना , अलीबाबा के, 'खुल जा सिम सिम' का खज़ाना हाथ लगने से कम नहीं  था।

7.  मरजीना अपना काम कर गई,  कई अलीबाबा भी लूट का माल ले कर चंपत हो गये, लेकिन डाकू साले अभी भी जिंदा हैं, और वह तेल के कुपों में नहीं  छिपे बैठे, बल्कि सियासी कुर्सियों पे बैठे मस्ती ले रहे हैं, और ज्यादा तर अपने अपने सरदार के नाम पर वोटों की  लूट के, एक महा डकैती पंचवर्षीय अभियान पे पुनः निकले हुए हैं।

8.  एक नहीं अनेक मरजीनाएँ खुद  भी अब अलीबाबा के साथ नहीं, किसी न किसी वोट लुटेरा गैंग में शामिल हो चुकी हैं, कुछ तो चुनाव भी लड़ रही हैं।  जनता बेचारी अलीबाबा के गधे की तरह और डाकुओं की  खच्चरों  की तरहां, जुमलों की घास खा कर,  कभी अलीबाबा की मेहनत  से काटी हुई   लकड़ी, यानी टैक्स ढोती है, तो कभी डाकुओं को ढोती है, या उन का लूटा हुआ खज़ाना, यानी नेताओं के भारी भरकम तनख्वाह, भत्ते और पेंशन,  तथा वोट का खर्चा ढोती है।

9.  अलीबाबाओं  , मरजीनाओं और डाकुओं के सरदार और 40 चोरों का कारोबार इस ही तरह बरसों से चलता चला आ रहा है। कभी इस गैंग का सरदार, तो कभी उस गैंग का सरदार  गांव का सरपरस्त बन बैठता है।  जंता नारे शारे लगा कर संतुष्ट हो जाती  है,  और चमचे अपना अपना उल्लू सीधा करने के चक्कर में अगले 5 साल बिता देते हैं। दशकों से जनतंत्र के नाम पर यही लूट तंत्र जारी है।
जय सिया राम तो बोलना पड़े गा भानजे।
🚩 सत्य ही अकाल है🚩
©🎙गुरु बलवंत गुरुने✒

🚩 भारत के पहले उच्चतम लोकपाल अध्यक्ष की नियुक्ति हुई🚩 @ 📚GBG⚔

1. उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति पिनाकी चन्द्र घोष  देश के पहले लोकपाल अध्यक्ष बने। न्यायमूर्ति घोष मई 2017 में उच्चतम न्यायलय के न्यायधीश बने, और उपरांत राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के सदस्य थे।  लोकपाल अध्यक्ष का वेतन और भत्ते भारत के प्रधान न्यायाधीश के बराबर होंगे। यह अपने आप में एक अतिमहत्वपूर्ण बात है, क्यों की सरकारी प्रोटोकोल में और ' किस का फ़ैसला किस पे भारी ' की तुलनात्मक विवेचना करते समय यह बात अहम रहे गी।

2.   लोकपाल की मदद के लिए, लोकपाल समिति का गठन किया गया है, जिस में  8 सदस्य नियुक्त किए गए हैं। इस समिती के सदस्यों के वेतन भत्ते उच्चतम न्यायलय के न्यायाधीश के बराबर हों गे। नियमों के अनुसार,  इनमें से चार न्यायिक सदस्य होने चाहिए और 4 अन्य सदस्य होने चाहिए। सदस्यों में से 50 प्रतिशत सदस्य अनुसूचित-जाति,  जनजाति, या किसी अन्य पिछड़े या अल्पसंख्यक वर्ग से होने चाहिए, और इन में कम से कम एक महिला भी होनी चाहिए। अध्यक्ष लोकपाल और सदस्य पांच साल के कार्यकाल तक,  या 70 साल की उम्र तक, अपने  पद पे बने रह सकते हैं।

3. न्यायिक सदस्यों के नाम हैं, न्यायमूर्ति दिलीप भोसले, न्यायमूर्ति प्रदीप मोहंती, न्यायमूर्ति अभिलाषा कुमारी तथा न्यायाधीश अजय त्रिपाठी । न्यायाधीश अजय त्रिपाठी  छतीसगढ़ के उच्च न्यायधीश हैं, जब की बाकी सभी विभिन्न उच्च न्यायलयों  से सेवानिर्वित मुख्य न्यायधीश हैं।  गैर न्यायिक सदस्य हैं,  i). सशस्त्र सीमा बल की पूर्व पहली महिला प्रमुख अर्चना रामसुंदरम,  ii). महाराष्ट्र के पूर्व मुख्य सचिव दिनेश जैन,  iii). पूर्व IRS अधिकारी महेंद्र सिंह,  और  iv). पूर्व IAS अधिकारी इंद्रजीत प्रसाद गौतम।

5.  सरकार ने जस्टिस पिनाकी को लोकपाल नियुक्त कर के उन्हें जस्टिस रंजन के समकक्ष कर दिया गया है। धरातल पे यह समिती कितनी सार्थक सिद्ध होती है, वक़्त ही दर्शाए गा।
📚 गुरु बलवंत गुरने⚔