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🚩किस्सा एक राजा, चाय और पकौड़े का 🚩हास्य व्यंग @ 📚GBG⚔

1.  एक था पुराना-नगर,  जिस में राजा 5 साल के लिए निर्वाचित किया जाता था।  इस बार एक ऐसा व्यक्ति निर्वाचित हो गया, जो पहले भी  इस ही नगर के एक उपनगर का15 साल से राजा चल रहा था। लेकिन 15 साल से राजपाठ भोग रहा यह राजा खुद को उपनगर का राजा न कह कर सिर्फ एक चाय पकौड़े वाला कहता था।  ऐसा इस लिए की इस में देश के आम लोगों को बेवकूफ बनाने और उन का समर्थन जुटाने की राजनितिक सुविधा थी। राजा सच ही चाय पकौड़े के नाम पे चुनाव जीत गया और अब के समस्त नगर का राजा बन गया।

2.   निर्वाचन के बाद पुराना-नगर  का नाम नव-नगर रख दिया गया, और  नवनिर्वाचित राजा  ने खुद को जनसेवक और  चौकीदार कहना शुरू कर दिया। इस में भी आम आदमी ही के समर्थन की राजनितिक सुविधा थी।  वैसे राजा, दिन में चार पांच बार, पौशाक बदलने का, बेहतरीन खुंब इत्यादि खाने का, और बेहतरीन चश्मे, पेन इत्यादि का बहुत शौकीन था। यानी राजा जताता था कि वह तो अत्यंत सरल मानव है, लेकिन था वह एक जबरदस्त खिलाड़ी।

3.  फिर कुछ ऐसा हुआ, कि  सेवक बन कर राजा और शहर के धन्ना सेठ में आपस में खूब मित्रता हो गई, और राजन धन्ना सेठ का खूब सहयोग करने लगा।  देखते ही देखते, धन्ना सेठ ने सारे बाजार पर कब्ज़ा कर लिया। देश में चमड़े के सिक्के चलाये गये, मनमर्ज़ी के कर लगाये गये,  और जब जन्ता ने खुद को लुटा लुटा सा महसूस किया, तो चौकीदार ही चोर है,  का शोर हर तरफ मचने लगा.

4.  राजा घबरा गया, क्यों की वः पुन्ह निर्वाचन का याचक था।  मरता क्या न करता। उस ने अपने फ़ौजी कमांडर को बुलाया, और उसे बड़े राजकीय सम्मान और, लाटसाहिब की कुर्सी, बंगले, ठाट-बाट का प्रलोभन दिया और पड़ोसी मुल्क पर एक छोटा सा हमला बोलने को कहा। हमले के बाद पड़ोसी मुल्क और नवनगर का माहौल गर्म हो गया। हर तरफ नव-नगर ज़िंदाबाद,  पड़ोसी मुल्क मुर्दाबाद के नारे लगने लगे।  अब जो कोई भी राजा या उस के चक्रम फैसलों के बारे कुछ कहता, उसे देशद्रोही, या राष्ट्र विरोधी कहा जाने लगा। नगर के टेलीविज़न और अख़बारों पर सारी बहस मुद्दों से हट कर राष्ट्रवाद और अराष्ट्रवाद में सिमट  गयी। राजा की मित्र मण्डली और उन सभी ने, जिन्हें राजा के राजा बनने से लाभ था, राजा को भगवान का दर्जा दे दिया।

5.  फ़िर चुनाव हुआ, राजा फ़िर निर्वाचित हुआ, और अब की बार वह डबल स्पीड पे धन्ना सेठ को सभी कारोबार का स्वामी बनाने  में जुट गया। इस बार देश में प्लास्टिक के सिक्के चलाये गये, रोज़गार के नाम पर हर मुहल्ले में सट्टेबाज़ी के केंद्र खोले गये,  दुश्मन देश ने नगर के उत्तरी और पश्चिमी इलाकों पे बार बार हल्ला बोलना शुरू किया। अब राजा शांति और अमन का अग्रदूत बन कर सामने आने लगा।

6.  शहर के सभी लोग पकौड़े की ही दुकान करते थे, लेकिन जब सभी पकौड़े बनाते थे, तो शाम को खुद ही खा लेते थे, बहुत से बचे हुए पकौड़े फेंके जाने लगे।  राजा ने पकौड़ों की दीवार बना कर दुश्मन देश से सुरक्षा का आवाहन किया, फिर क्या था, लोगों के सब्र का बाँध टूट गया, जन्ता ने राजा और उस के साथियों को पकौडों के ढेर में ही दबा दिया।
🚩तत्त सत्त अकाल🚩
@ 📚गुरु बलवन्त गुरुने⚔

🚩वारियर क्लास या मार्शल रेस, या स्वर्ण असवर्ण होने का वहम. 🚩@📚GBG⚔


1.  मैं अक्सर मार्शल रेस इत्यादि पे तक़रीरें,  और दलीलें अपने बचपन से सुनता आ रहा हूँ। पहले पंजाब से, और फिर फ़ौज इत्यादि से तालुकात रखने के कारण, ऐसे सैंकड़ों मौके मिले, जब, राष्ट्र, धर्म, समाज,  रेजिमेन्ट, कौम या बिरादरी के नाम पे बहुत कुछ ऐसा सुना, की मन में हंसी आई, लेकिन हंसी दबानी पड़ी, सिर्फ सभ्य होने के नाम पर, लेकिन जब सभ्य लोगों को असभ्यता की सभी हदों को लांघते देखा, तो सोचा की बोलना चाहिए, कहना चाहिए, लिखना चाहिए, कोई सुने न सुने, मैं खुद, मेरी आत्मा और उस मेँ बसता परमात्मा तो अवश्य सुन रहे हैँ, और यह बात अपने आप में मूल्यवान है। खुद से संवाद ही ख़ुदा से संवाद है।

2  नानक, ओशो, रहीम कबीर, रहीम, रविदास जैसे जागृत दिमागों की सोच को पढ़ने, सुनने और समझने का सौभाग्य भी मुझे मिला। कुल मिला कर, यही समझा, की धर्म, राष्ट्र, कौम, अल्लिअंस इत्यादि, किसी कबड्डी, क्रिकेट या वॉलीबाल की टीम से ज्यादा कुछ नहीं। बस गेम्स की फील्ड की पैमाइश और रूल्ज़,  बस टीशर्ट और निक्कर के रंग इत्यादि में ही फ़र्क होता है , और उसी रंग, रूप, और डिज़ाईन इत्यादि के फ़र्क की एवज़ ही,  एक टीम और  दूसरी टीम में फ़र्क पैदा किया जाता है, टीम स्पिरिट इत्यादि का भी निर्माण इन्हीं सभी सुपरफीशियल प्रतीकों द्वारा पैदा और मेंटेन किआ जाता है।  हैं तो सब खेल ही।

3.  कुल मिला के एक गेम का प्लेयर खुद को  केवल उस गेम का प्लेयर मात्र ही समझता  है, और एक बड़े स्तर पे सभी प्लेयर टीम स्पिरिट के साथ साथ स्पोर्ट्स मैन स्पिरिट से भी बाकायदा प्रेरित होते हैं, लेकिन होते तो सभी केवल  खिलाड़ी ही हैं। इस ही तरहं हमारे धर्म और राष्ट्र चाहे अलग हों, हैं तो हम सभी इंसान। किसी भी खेल की टीमों के फॉलोवर या तो आम धार्मिक अनुयाइयों जैसे भीड़ के भेड़ें होती हैं,  या फ़िर टीम में इन्वेस्ट करने वाले बिज़नेस इंवेस्टर्ज़, और या महज़ वह सटोरिये, जो किसी भी जीतने की सम्भावना रखने वाले घोड़े पर दाव लगाते हैं।

4.  जो लोग अपने टीम की टीशर्ट को 24 घण्टे डाल कर के रंग और प्रतीकों के इतने ग़ुलाम हो जाते हैं, की उन्हें उन रंगों और प्रतीकों से आगे कुछ नज़र ही न आये, वह लोग  उन खिलाडियों या फैंन्ज़ की तरहं होते हैं, जो अपनी गेम को ही दुनिया की पहली और आख़िरी गेम समझ बैठते हैं।

5.  खुद को ब्राह्मण, क्षत्रिय, या  वारियर  बैकग्राउंड का बताने वाले, या उच्च अथवा निम्न श्रेणी को बिलौंग करने का दावा करने वाले सभी अहमकों  से कोई यह पूछे कि क्या 1500 या 300 साल पहले निर्मित धर्मों की पैदाइश से पहले, या मनू की श्रेणी वर्गीकरण से पहले,  जंग नहीं होती थी ?  तब भी सिपाही थे, सैनिक थे, फ़र्क सिर्फ यह था कि निशान अलग रहे हों गे,  गेम का नाम और रूलज़ शायद अलग रहे हों गे, और टीशर्ट का रंग और डिज़ाइन शायद अलग रहा हो गा।

6.  मैं किसी धर्म के ख़िलाफ़ नहीं, लेकिन  इन्सान को धार्मिक होने से पहले इन्सान, और इन्सान होने से पहले, एक 'जानवर न बनना', ज्यादा आवश्यक है।  यानी मानव तो मानव से,  वानर-मानव, और फिर आदि-मानव के ज़माने से लड़ता भी आ रहा है, झगड़ता भी आ रहा है, व्यपार और समझोते भी करता आ रहा है, इस में नया क्या है, कुछ भी तो नहीं, सिवाय प्रतीकों के। और प्रतीकों की रक्षा के लिए तो कुत्ते भी लड़ते हैं।

7.  बस इतना जान लीजिये, कि आप की खोपड़ी का आर्केस्ट्रा कैसे बजता है ?  आप को समझाया जाता है कि यह आप के धर्म, कौम इत्यादि पर निर्भर करता है, लेकिन मैं आप को डंके की चोट पर कहता हूँ,   की आप इन्सान होने के साथ, इन्सान होने से भी ज्यादा, किस चीज़ को ज्यादा या कम तरजीह देते हो,  यह दरअसल आप की कन्डीशनिंग पे डिपेंड करता है, लेकिन सिर्फ तब तक जब तक आप प्रतीकों के ग़ुलाम हैं। बीफ़ खाना, सूअर खाना, वेजिटेरिअन होना इत्यादि, ब्राह्मण होना,   क्षत्रिय होना, स्वर्ण होना, असवर्ण होना, हिन्दू, मुसलमान सिक्ख ईसाई इत्यादि होना, इन  सब का गहरे अध्यात्म से कोई रिश्ता नहीं।  यह सब ऊपरी तह  की बाते हैं।आदमी व्ही है, जो सोच समझ के इन्सान बने, बैल,बन्दर, कुता, शेर इत्यादि होने से कुछ आगे बढ़े।
🚩तत्त सत्त अकाल🚩
©📚गुरु बलवन्त गुरुने⚔

🚩फ़िर वही चुनाव, फ़िर व्ही नौटँकी.🚩©✒GBG⚔

1. फ़िर शुरू होने जा रही है पप्पू और गप्पू, दीदी और पिद्दी के बीच दौड़, लालू और कालू में,  'माया बहन' और 'जुमला भाई'  में रेस।

2. हाँ इस युद्ध में लड़खड़ाती सी कुछ कलमें भी घूमती फिरती हैं,  साथ ही  भृष्ट कैमरे,  दो-मुंहिये  टेलीविजन एंकर और बिकाऊ पैेनलिस्ट  भी घिसी पिटी बातें कर के जन्ता को,  बेमुद्दा मुद्दों में उलझाये रखने की क़वायद में जुट गये हैं।

3.   यानि  लड़ाई  तो काहे की हो गी,  बस भोंपू प्रचारकों, जुमलेबाज़ों,  झूठों, और ठग्गों की मण्डी एक बार फ़िर से गर्म हो जाये गी ।

4.   चमचों की हाय-तौबा का हिसाब लगाना हो तो बस इतना ही जानना काफ़ी है, की इंदिरा की वानर सेना की तर्ज़ पे, प्रियंका की गुलाबी सेना भी बन चुकी है, और हद्द तो तब हुई, जब इस चमचों की सेना के सैनिकों ने गुलाबी नामकरण के पीछे का कारण, न तो LGBT से कोई सम्बन्ध बताया, न गुलाबी गैंग से कोई वास्ता, बस इतना ही कहा की प्रियंका पहचान सके कि उस के भग्त कौन हैं। वाह री चापलूसी,    यानी  पहले गांधी टोपी, फ़िर केजरीवाल की लिफाफा टोपी,  फ़िर मोदी मास्क, मोदी जैकेट  और अब प्रियंका की गुलाबी टी शर्ट। WTBH⁉

5.  युवा भी दो किस्म के हैं, एक तो वह जो सब कुछ छोड़ छाड़ के मुल्क में व्यवस्था परिवर्तन की दरकार रखते हैं, और दूसरे वह जो मौका परस्ती के कल्चर के चलते, कभी कोई टोपी, कभी कोई टीशर्ट, या फिर कोई मास्क चुनते हैं। यानी दलबदलू गैंग।

6.  दबा के चीखा चिल्ली हो रही है, और अभी और भी हो  गी। घिसियल बिकाऊ एंकर फिर किसी देसी विदेशी ओवैसी  या किसी पात्रा कुपात्रा की बेमात्रा बहस करवा कर लोगों को उलझायें गे।

7.   फ़िर हो गा इस भोंपू और उस भोंपू में युद्ध।  मायावी जुमलोँ और वादों के पहलवान एक बार फिर झूठ के राजनितिक अखाड़े में भिड़वाये जायें गे।   देखते हैं कौन जीतता है❓  जन्ता को तो हम ने सदा हारते ही देखा है ❕❗

8.   क़लम वाले खुद को क़लम का सिपाही कहते हैं।उन का मानना है कि आज नहीं तो कल, क़लम ही सुरखरुह हो गी। क़लम का नेवला सभी सर्पों और बिछुओं का वध करे गा, लेकिन सच्च यह है की आज लिखे हुए को पढ़ने वालों की बनिस्बत कहने सुनने वाले जयदा मकबूल हैं।  यानी कुत्ते तक भी लेखकों से बाज़ी मार गये हैं।  क़लम से लिखे कागजों पर तो पकौड़े मूंगफली ही बिक रहे हैं।

9.   आलम यह है, कि पप्पू हो या गप्पू, कोई साला बस की छत पे सवार है, कोई ट्रक का रथ बनाये बैठा है, कोई दीदी, कोई बहन जी, कोई भैया जी, कोई बाप जी, वही सब  कई बार चल चुके कारतूस, सब साले पुराने घिसे पिटे नौटंकी बाज़,  अपने काले धन के जोर पर खुद को रिफ्रेश कर के निकल पड़े हैं वोटरों के जंगल में, वोटर नामक मुर्गों का शिकार करने।

10.  यानी कुल मिला कर कुछ भी नया नहीं है। राजा भी कई आये और कई गये, कोई खुद को देश का चचा कहता था, कोई बापू, तो आज कल चौकीदार या प्रधान सेवक कहना फैशन में हैं।

11.  आज कल वाले  चाचा  और बापू को ठरकी सिद्ध करने में लगे हैं।  कोई तो उन की तस्वीर के पीछे लाल रंग से भरे गुबारों को छर्रेे वाली एयरपिस्टल से फोड़ कर, 'मैं भी गोडसे' होने के चस्के ले रहे हैं, और चचा और बापू के समर्थक यह कहने में मशग़ूल हैं की चौकीदार ही चोर है।

12.  मुझे तो लगता है की सभी साले चोर हैं, वह भी एक से बढ़ कर एक, और जन्ता है की सम्पूर्ण चूतिया गिरी की चैम्पियन है, वह भी एक से बढ़ कर एक।

13.   जन्ता के ज्यादा लोग तो धर्म वर्म के नाम, और जात पात के नाम पे ही निबट जाते हैं, बाकी शराब, रोटी-शोटि या 500 या 2000 के नोट के लिए ही वोट दे रहे हैं, यानि सुपर चुतियापे का आलम है, और लिखारी के पास, शाम तक रद्दी बन जाने वाले अखबार के  एक अँधेरे से किनारे में,  सिसक सिसक कर दम तोड़ रहा मात्र एक कॉलम है।

14.  क़लम वाले होने का भृम पालने वाले  इस बेनामी कालम पे क़लम घिसा रहे हैं।   ऐसे में यह इंटेलेक्चुअल क्या  घण्टा उखाड़ लें गे, इस भृष्ट व्यवस्था का। इन में से भी ज्यादा तर तो किसी लिटररी सोसाइटी  या किसी लिटरअरी अवार्ड के एवज़ में ही निबट जाते हैं। यानी इनाम या रिकोग्निशन का  बिस्कुट पेश, और कुत्ता फ़ारिग।  

15.  हाँ,  मुझे एक ख़ुशी अवश्य है कि मेरे देश का एक बड़ा युवा वर्ग जाग गया है। वह सड़कों पे है। कल यही लोग लोकसभा और विधान सभा में हों गे, और मेरे देश की तक़दीर बदलें गे।

16.  लेकिन याद रहे मित्रो, गज़ गज़ लम्बी ज़ुबान और कुएं से भीे गहरे हलक वालों का मुकाबला, क़लम से नहीं, डंडो और बंदूखों ही से सम्भव है।

17.  इस बार की इलेक्शन तो बस यही सिद्ध करे गी, की किस की धन थैली कितनी गहरी है, और ज़ुबान कितनी लम्बी। असली फैसला अभी बकाया रहे गा।

18.  अभी देश को रौशनी की ओर और चलना हो गा। अच्छे दिन क्रांती से ही सम्भव हैं। युवाओं को एक जुट होना चाहिये और सभी पुराने राजनितिक सिय्यारों को फ़ारिग कर देना चाहिए। यही हो गा असली सफाई अभियान।

19.  आखिर कब तक राज घरानोंऔर राजनितिक घरानों और उन के चमचों के परिवार के लोग,  जो किसी सच्ची प्रतिस्पर्धा में चपरासी बनने की काबलियत भी नहीं रखते, राजा होने का दावा ठोकते रहें गे ❓ आखिर कब तक ⁉

20.  यह सब  रोकना हो गा।  देश में चल रहे परिवारवाद, पार्टीवाद,  और व्यक्तिवाद  के चाटुकार कुत्तों के इस फर्ज़ीवाड़े को रोकना ही हो गा, फिर चाहे उन्हें ठोकना ही क्यों न पड़े।
🚩तत्त सत्त अकाल🚩
🚩वन्दे मातरम 🚩
© ✒गुरु बलवन्त गुरुने ⚔

🚩चलो फ़िर करें निशाने बगावत बुलन्द🚩@✒GBG⚔

1.  राजनीती एक कड़वा सत्य है, और इस खेल में पुत्र पितृ हन्ता हो जाता है, भ्राता भृतःन्ता हो जाता है,  और भृतिहरि तो राजा हो कर भी सन्यासी हो जाते हैं, जब की चोर उचक्के, और घोर पापी भी सत्ताधारी के शरणागत हो कर  सत्ता सुख के बिस्कुटों का लाभ तो प्राप्त कर ही लेते हैं।

2.  यह सब राजनैतिक नौटंकी भी चलती रहे गी,  नौटंकी के खिलाफ़ आवाज़ भी उठती रहे गी।

3.  मैं  मूलतः न तो किसी राजनितिक दल के साथ हूँ, न ख़िलाफ़।

4.  मेरी ख़िलाफ़त आम-जन के एक्सप्लोइटरज़ और एक्सप्लोइटेशन के ख़िलाफ़ है, सो वह हर हाल में जारी रहे गी।

5.  सत्ताधारी को चेतावनी देना, और इस पर्योजन से उसे अपने मूल कर्तव्य के लिए प्रेरित करना ही मेरा मूल धर्म है। 

6.  पुन्ह परीणाम कुछ भी हो, यह मेरी चिंता नहीं।

7.   राजा की अनितियों का खण्डन ही मेरा प्रयोजन है, राजा मोदी हो, या मनमोहन, या कोई और।

8.  मुझे अपना कौटिल्य दीपक ज्वलन्त रखना है, क्यों कि यही दिया मेरी देश भक्ति का साधन, और पर्योजन है।

9. यही मेरी पूजा, अर्चना एंवम वन्दना है। वैसे भी पालतू कुत्तों की दुनिया में इक्का दुक्का सिंह भी होना अनिवार्य है।
🚩तत्त सत्त श्री अकाल🚩
✒GBG⚔

🚩दास्ताने कृष्ण अर्जुन, भील और गोपीयाँ🚩 @✒GBG⚔

1.   हाल ही में श्री कृष्ण की एक ऐसी कहानी पढ़ी, जिस में भगवान कृष्ण  भी एक दम मजबूर दिखे, और अर्जुन एक दम लाचार।

2.  इस ही प्रसङ्ग को पढ़ कर महात्मा तुलसीदास जी कह उठे थे,
'तुलसी नर था कब बलि, समय बड़ा बलवान,
भीलां लूटी गोपियां, वही अर्जुन वही बाण।'

3. प्रसङ्ग कुछ ऐसे है कि महाभारत का युद्ध समाप्त  हो चुका था। कृष्ण व्याध तीर से घायल थे। ऐसे में अर्जुन उनसे मिलने पहुंचे।

4.   कृष्ण ने अर्जुन से कहा कि पार्थ मुझसे मिलने गोपियां आ रही हैं लेकिन रास्ते में भीलों के कबीले हैं, जो उन को उठाने की फ़िराक़ में हैं,  तुम गोपीयों की  भीलों से रक्षा करना।

5.  अर्जुन को महाभारत विजय के बाद खुद पे अभिमान  हो चुका था। वह श्री कृष्ण से बोला, 'माधव मेरे होते भील गोपीयों को लूट लें, यह असम्भव है',  लेकिन काल का खेल कुछ ऐसा निकला की अर्जुन देखता ही रह गया और भीलों ने गोपियां लूट लीं।

6.  अर्जुन ठगा सा रह गया।  उसे अब समझ आया कि महाभारत के युद्ध में ताकत उस की नहीं, समय की थी, और समय जब अनूकूल न हो तो गोवर्धनधारी कृष्ण की गोपीयों को, गांडीवधारी बाहूबली अर्जुन के संरक्षण के बावजूद, भील तक भी लूट ले जाते हैं।

7.  अर्जुन और कृष्ण की इस दास्तान से एक शेर याद आया,
'बख्त के तख़्त से यक-लख्त उतारा हुआ शख्स,
तुमने देखा है कभी,  जीत के हारा हुआ शख्स ?'
🚩तत्त सत्त अकाल🚩
✒गुरु बलवन्त गुरुने⚔
शब्दार्थ:-
बख्त- किस्मत।
तख़्त- सिंघासन।
यक-लख्त - अचानक, एकदम जल्दी से।

🚩With due regards, मेरे मित्रों के नाम, जो वल्लभ भाई की प्रतिमा पर हुए खर्चे से, या बाकी सब चुनावी दंगल की प्रक्रियाओं से चिंतित हैं🚩@ ✒ GbG⚔


1.  आदरणीय वल्लभ भाई की प्रतिमा तो आवश्यक थी।

2.  कुछ लोग कहते हैं इतनी बड़ी प्रतिमा तो केवल महात्मता गांधी की होनी चाहिये थी।

3.   महात्मा का अपना रोल था,  और उस हिसाब से प्रतिमा तो लाला लाजपत रॉय साहिब की, शहीद भगत सिंह और शहीद चंद्रशेखर आज़ाद, शहीद बिस्मिल,  और  बाकी सभी वीर आत्माओं की भी  बननी चाहिए, लेकिन इतने नाटक और खर्चे की आवश्यकता नहीं है।

4.  प्रतिमाओं के कद से इतिहास पुरुषों का, या प्रतिमाओं को बनवाने वालों का कद नहीँ नापा जा सकता, लेकिन सरदार वल्लभ भाई साहिब जैसी कुछ प्रतिभाएं ऐसी होती हैं, की उन की प्रतिमा कितनी ही बड़ी बना लो, उन की प्रतिभा के नाप से कम ही रहती है।

5.   इस लिए राष्ट्रनिर्माण के एक महानायक की प्रतिमा का बनना बनाना तो सरदार पटेल समान युग पुरुष के स्मरण में एक छोटी सी सलामी है।

6.   इस काम को करने के लिए मैं अवश्य ही, श्री नरेंद्र दामोदर भाई मोदी को बधाई का पात्र मानता हूँ।  हज़ारों कमियां हैं हम सब में, सो मोदी में भी हैं,  हाँ थोड़ा फेंकते हैं  नमो,  तो इस में नया क्या है !? सभी नेता फेंका फेंकी का खेल दशकों से खेल रहे हैं।

7.  उधर  जन्ता का माइक्रोस्कोप भी सब देख रहा है।   आज नहीं तो कल जन्ता हिसाब मांगे गी, लेकिन फ़िलहाल जन्ता को कोई अच्छा हिसाब लेने वाला नहीं दिख रहा।

8.   जन्ता की अदालत ढून्ढ रही है, कि ज्ज्ज किसे बनाएँ, तो पाते हैं कि सभी चोर हैं।

9.  चोरों की बारात को चोरो की बारात से बदल भी दिया तो क्या मिले गा ?

10.  आखीरकार कोई अच्छा विकल्प निकले, यह आवश्यक है,  जो मैदान में हैं,  सब बकवासी लोग हैं।

11.  जिन्हें आगे बढ़ कर देश को दिशा देनी चाहिए, सब चाय बिस्कुट का जुगाड़ करने में जुटते नज़र आते हैं। 

12.  स्थिति दयनीय है, जन्ता दिशाहीन है, मील के पत्थर अपने आप को बचाने में लगे हैं, चमचे मतलबपरस्ती के रसगुल्लों को चापलूसी की चाशनी में डुबाने में व्यस्त हैं।

13.   तो फिर रस्ता कहाँ है, मन्ज़िल कहाँ, कोई नहीं जानता, और इस ही सब का फायदा उठाने में लगे हैं, चोर  उचक्के लोग, नेता बन कर।

14.  अभी तो भक्त मण्डली, और वक्त मण्डली, यानी समय के मतलब-परस्त बटेरों का ही युद्ध जारी है।

15.  एक बार जब प्रेशर सिलेंडर फटने तक पहुंचे गा, तभी कोई युग पुरुष धमाके से पैदा हो गा।

16.  फ़िलहाल तो सब क़वायद युग पुरुषों को कद्दूकस कर के अपने मतलब की मिठाई बनाने  तक सीमित है।

17.  आप  सभी, तजुर्बेकार हैं आदरणीय हैं, सब गोलमाल समझते हैं, लेकिन समझ समझ के भी जो न समझे, मेरी समझ में वो नासमझ है।

19.   यानी, यदी आप देश और समाज को बदलना चाहते हैं, तो गली बाज़ार में निकलीये।  सड़कों का, बाज़ार का, समाज का, राजनीती का कूड़ा कर्कट साफ़ करने में योगदान दीजिये, अपने समय, ऊर्जा और प्रयत्न की आहूती राष्ट्रनिर्माण के यज्ञ में अर्पित कीजिये, केवल बातों से कुछ नहीं होने वाला।  इक़बाल का शेर याद आता है,
'इक़बाल' बड़े उपदेशक हैं,
मन बातों से मोह लेते हैं,
गुफ़्तार के गाज़ी बन तो गये,
किरदार के गाज़ी बन न सके।
🚩तत्त सत्त अकाल🚩
🙏✒गुरु बलवन्त गुरुने⚔

🚩गधों, कुत्तों, शेरों और इंसानों में फ़र्क क्या है ⁉ 🚩✒GBG⚔

🚩गधों, कुत्तों,  शेरों और इंसानों  में फ़र्क क्या है ⁉  🚩✒GBG⚔

1.  गधे किसी भी हरकत पर,  दुल्लात्ति मारते हैं।

2.   कुत्ते किसी भी चलते हाथी पे भौंकते हैं।

3.   शेर केवल कमज़ोरों का शिकार करते हैं ।

4.  केवल इन्सान ही है, जो सोचता है, क्या ठीक है क्या गलत, यानी हार्ट या इमोशन ड्रिवेन नहीं, बल्कि ब्रेन ड्रिवन होता है।

5.  इन्सान के बच्चे बनो दोस्तों, गधे, शेर या कुत्ते के बछेड़े या पिल्ले नहीं।

6.   कोई भी रिएक्शन देनें से पहले, थोड़ा विचार और अध्ययन अवश्य करो. 👍💐💐💐💐
🚩तत्त सत्त अकाल🚩
✒गुरु बलवन्त गुरुने।⚔

🚩क्या है कर्नाटक की जन्ता का जनादेश⁉🚩@✒GBG⚔

1.  कर्नाटक ने एक बहुत बढ़िया जनादेश दिया, और सही किया। जन्ता ने किसी एक दल को बहुमत नहीं दिया, और किसी की भी दाल गलने नहीं दी, यानि सत्ता की बोटी भूखे कूकर दल में कुछ इस तरह फेंकी, की कूकर दौड़ अभी भी जारी है। 

2.   बीजेपी को 104 सीट दी तो जदस और कांग्रेस को अलग अलग  37 और 78, यानि 115 सीट दी। 224 सीटों की विधान सभा में सरकार बनाने के लिए कम से कम 113 सीट चाहिए, यानी भाजपा को 9 विधायकों की दरकार है।

3.  आइये अब जनमत का इक दूसरा, लेकिन बेहद संजीदा और आवश्यक पहलू भी देखें, यानी देखें की किस दल को कितनी % जन्ता ने वोट दिया। आइये  देखें और परखें की शुद्ध जनादेश क्या कहता है।

4.  परसेंटेज ऑफ़ वोटस में कांग्रेस सब से आगे है। जन्ता ने कांग्रेस को 38 % वोट, भाजपा को 36.2% वोट और देवे-गौड़ा की जन्ता दल सेकुयलर को 18.3% वोट दिए। कुल मिला कर कांग्रेस और जदस को  38% +18.3 % वोट , यानी 56.3% वोट मिले।  इस हिसाब से जदस+कांग्रेस को जन्ता ने  भाजपा से 20.1%  वोट ज्यादा  दिए।

5.  नतीजा साफ है, जन्ता ने भाजपा को 36.2% वोट, और भाजपा के खिलाफ लड़ रही पार्टियों को 56.3% वोट दे कर, भाजपा के खिलाफ़ जन-आदेश दिया है। यानी जनादेश भाजपा और कांग्रेस, दोनों के खिलाफ है, लेकिन इस सब में ही छिपी है, जन्ता के जनादेश की असली पहेली।

6.   राजयपाल ने यदुरप्पा को 104 सीटों की बिनाह पर सरकार बनाने का निमन्त्रण और बहुमत सिद्ध करने के लिए 15 दिन का वक्त दिया, लेकिन साथ ही शीर्ष अदालत ने आज शाम 4.30 बजे तक फ्लोर टेस्ट का आदेश भी दे दिया, और यद्दूरप्पा द्वारा आनन फ़ानन में किये गए बड़े पुलिस तबादले, और बाकी तुग़लकी फैसलों पर भी रोक लगा दी। आखिर क्यों ⁉  यह विचारणीय है। जाहिर है की राज्यपाल के फैसले से शीर्ष अदालत सहमत नहीं, और इस के चलते संविधान के प्रावधानों का संज्ञान लेते हुए, शीर्ष अदालत ने अपना फैसला सुनाया।

7.   स्पष्ट है की कोर्ट ने न सिर्फ जदस+कांग्रेस संयुक्त के 115 सीटों का संज्ञान लिया हो गा, बल्कि इन दोनों दलों के जॉइंट वोट शेयर (56.3% वोट बैंक) का भी संज्ञान लिया हो गा। कोर्ट ने यह भी अवश्य देखा हो गा की किसी दल, जिसे अभी सिर्फ अंतरिम सरकार बनाने का मौका मिला है,  उस का नेता, बिना मुख्यमंत्री की शपथ लिए ही मुख्यमंत्री बन बैठा है। काहे भैया, क्या यह तुग़लक़ का ज़माना है, या संविधान का राज्य। कभी मत भूलिये गा की भारत व्यक्ति साशित राज्य नहीं, बल्कि एक सविंधान द्वारा शाषित लोकतान्त्रिक  प्रजातन्त्र है।

8.    एक बात अवशय उभर कर आई है, की जन्ता ने मेरे  द्वारा प्रसारित 'बदली कर,  बदली कर', के पैराडाइम को लागु किया, यानी कोंग्रेस को सब से ज्यादा वोट दे कर भी कम सीटें दे कर अकेले सरकार बनाने के क़ाबिल नहीं छोड़ा, लेकिन जनादेश भाजपा को सरकार बनाने का भी नहीं दिया गया है, इतना तो आंकड़ो से स्पष्ट है ।

9.  जनादेश का एक अत्यंत विशेस पहलू यह है, कि 'जन्ता-दल-सेकुयलर' और कॉंग्रेस के पास संयुक्त 115 सीटे हैं, और 56.3%  वोटर। तो इस के चलते सरकार इन्ही की होनी चाहिए, मुख्यमंत्री और ज्यादा मंत्री जदस के होने चाहिए। कहता चलूँ कि कर्नाटक की मिनिस्ट्री में तकरीबन 75 मिनिस्टर हुआ करते हैं, और अगर जदस संयुक्त/एकजुट रहती है, तो जदस का हर विधायक, देर सवेर मंत्री बन सकता है, और अपने चुनाव क्षेत्र के लिए कुछ खास कर सकता है।

10.  जन्ता का फैसला साफ़ है, किसी एक दल को सम्पूर्ण बहुमत नही दे कर, जन्ता ने मिलीजुली सरकार का जनादेश दिया है।  आगे क्या होता है, जो हो गा, ठीक हो गा, या गलत, इस का फैसला मैं जन्ता पे ही  छोड़ता हूँ,  नमो और अमित 8 से 9 विधायक जुटा लें गे या यद्दूरप्पा  को मैदान छोड़ कर भागना हो गा।

11.  यह भी कहता चलूँ कि यदी भाजपा सरकार बनाती है तो इसे अपनी बड़ी जीत के तौर पे,  और यदी सरकार बनाने में नाकामयाब रही तो उसे अपनी कुर्बानी के रूप में पेश करे गी। 

12.  याद रहे कि कर्नाटक की केवल 72.13% जन्ता ने ही एलक्शन में हिस्सा लिया। यानी बाकी तकरीबन 27% लोगों को या तो परवाह ही नहीं की कौन उन का सञ्चालन करे, या उन्हें अपने अधिकार की ज़िम्मेवारी निभाने का आभास ही नहीं है।

13.   अब गुरु गुरुने का मास्टर स्ट्रोक।  याद रहे की बहुमत का जुगाड़ न होने पर यदि यदुरप्पा और भाजपा पतली गली से निकले भी, फिर भी उन की कोशिश यही हो गी, की 2019 से पहले पहले, वह जदस के  दो तिहाई विधायकों को साम, दाम, दण्ड भेद का इस्तेमाल कर के तोड़ते हुए, कर्नाटक की जदस+कांग्रेस सरकार को गिरा सके। ऐसा कर के वह खुद को हीरो बनाने, और नमो की छवी चमकाने की एक बड़ी क़वायद में जुड़ सकते हैं।

14.  यह भी याद रहे की कम से कम अब तक भाजपा, जदस के किसी विधायक को तोड़ नहीं सकी, जिस के कारण स्पष्ट हैं। पहला सुप्रीम कोर्ट का खुला चयन, यानि ओपन वोटिंग द्वारा फ्लोर टेस्ट में उतरने का आदेश, दूसरा एंटी डेफेक्शनन कानून, और तीसरा व्हिप का लागू होना। जदस की सब से बड़ी विजय यही हो गी, की वह कम से कम 2 वर्ष तक, और हो सके तो 5 वर्ष तक अपनी एकता को भंग न होने दे।

🚩तत्तसत्तश्रीअकाल🚩
©@✒ गुरु बलवन्त गुरुने⚔

🚩गुस्ताख ज़ुबान नेताओं, और 'लड़कों से गलती हो जाती है'🚩@ ✒GBG⚔©


1.   तीन बातें भारत के प्रति सदा याद रखिये,
१.भारतियों की यादाश्त बहुत छोटी है।
२. भारतियों में नैतिक मूल्यों की कमी है।
३. भारतीय तमाशबीन तो हैं, चिंतनशील  नहीं।

2.  इस ही वास्ते, हम लोग बहुत जल्दी भूल जाते हैं कब किस ने क्या कहा, क्या जुर्म किआ, या क्या गुस्ताख़ी की। हम नहीँ समझते कि कैसे किसी शीर्ष स्थान पे बैठे, किसी भी तुच्छ इंसान का बयान, व्सयक्तव्य, या कोई एक्शन, समाज तक एक अत्यंत ख़तरनाक सन्देश पहुँचा सकता है।  हम भूल जाते हैं की नैतिक मूल्यों से महरूम लोगों को, यानि जुमलेबाजों को यदी आप अपने नुमाईंदे चुनें गे, तो वह कभी भी, देश के, आप के और समाज के फायदे में नहीं हो सकते, क्यों कि उन की सारी प्रेरणा, निजी स्वार्थ से उपजती है।

3.  आज ये जो महिलाओं पे, और बच्चीयों पे  ज़ुल्मो जबर के काण्ड हो रहे हैं, इन के पीछे जितना हाथ आज के नेताओं का है, उतना ही बीते कल के नेताओं का भी है।

4.   एक तरफ इस जुल्मों जब्र के पीछे है योगी जैसा  नेता, जिस ने अपने MLA को पकड़ने में इतनी देर कर दी, कि वो रेप विक्टिम के पिता को जेल में पीट पीट कर मार डालने की कगार पे ले जा कर, उसे हस्पताल में बिना इलाज के मरने को छोड़ आया। सो सेंगर के साथ साथ, यानि बलात्कार करने वाले MLA के साथ, महिला के पिता की म्रत्यु का ज़िम्मेवार योगी भी है।

5. पहले भी योगी ने अपनी दबंगई जमाने के लिये,  रोमियो स्क्वाड नाम के गुंडों से दर्जनों लड़कियों को शरेआम पिटवा कर, अपने गुंडों का हौंसला बढाया। भाई जब तेरी पोलिस ही गुंडों की है, जो खुद गुंडों को श्रीमान जी कहते फिरते हैं, और उन की भृष्ट ज़ुबान दबनगियों की चाटते चाटते नहीं थकती, तो तुझे रोमियो स्क्वाड की क्या जरूरत है। अब तो यह सिद्ध हो गया, की योगी कोई सन्यासी वन्यासी नहीं, बल्कि एक गुंडा बॉस है, जिस की मानसिकता दमन की राजनीती की है। भगवा डालने से अगर कोई सन्यासी होता तो मैं सन्सार के सभी कौओं को श्वेत रंग में रंग कर हंस बना देता।

 6.  नरेंदर भाई मोदी ने भी उन्नाव और कथुआ पर बहुत ही अटक कर कोई बयान दिया, लेकिन मैं यह मानता हूं, की यह देरी जायज़ थी, क्यों की प्रधानंत्री, अपने गुप्तचरों से किसी भी सिचुएशन की पुख्ता जानकारी लिए बिना, कोई बयान नहीं दे सकते, इस लिए यह लाज़मी था की वह सारे मामले को सच्च झूठ की कसौटी पर परख कर ही कुछ कहें। मैं नमो को क्लीन चिट नहीं दे रहा। इस में कोई दो राय नहीं की  नमो खुद भी जुमलों की एक मशीन हैं, लेकिन बतौर प्रधानमन्त्री, उन्हों ने कठुआ और उनाव पे, वक्त रहते ज़ोरदार बयान भी दिया और उस का असर भी देखने को मिला, और आने वाले समय तक नमो के ब्यान की क़दर की जाये गी।

6.   अब सवाल उठता है, कि क्या यह सब नया है।  यह सब यूपी के लिए, या देश के लिए कोई नई बात तो नहीं। दरअसल यूपी में गुंडा कल्चर के पितामह हैं, मुलायम सिंह यादव, जो प्रदेश के मुख्यमंत्री और राष्ट्र के रक्षा मंत्री तक रहे हैं। जिन्हें इन के नकली समाजवादी चेले, नेता जी कह कर तकरीबन उन्हें सुभाष बोस का सा कद देने की कोशिश करते हैं, यह सोचे बिना, की 'कहाँ राजा भोज, और कहाँ गंगू तेली'?

7.  डंके की चोट पर कहता हूँ, और आप सभी याद रखिये कि, ये लाल टोपी लगाने वाले मुलायम, न तो खुद समाजवादी हैं, और न इन के चेले। दरअसल लाल रंग के निचे छुपे ये दायें बाज़ू संगठनों के वह पुराने गुंडे हैं, जो लाल रंग, यानि मजदूर और ग़रीब किसान का सहारा ले कर नेता बन बैठे।

8.  कभी मत भूलिये की यूपी के गुंडागर्दी कल्चर के भीष्मपितामह मुलायम भैय्या ही हैं। कभी मत भूलिये की यही वह आदमी है जिस ने, जब इस के विधायक के लड़को ने स्कूली लड़कियों से बदतमीज़ी की थी तो कहा था,
'तो क्या हुआ, लड़कों से ऐसी गलती हो ही जाती है।'

9.  मुलायम सिँह यादव को उस की इस स्टेटमेंट के लिए, कभी भी माफ़ नहीं किया जा सकता, क्यों की जब इस स्तर का नेता कुछ कहता है, उस के बुरे असर देर तक समाज में रहते हैं।
     🚩तत्त सत्त अकाल🚩
©✒गुरु बलवन्त गुरुने⚔