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🚩वारियर क्लास या मार्शल रेस, या स्वर्ण असवर्ण होने का वहम. 🚩@📚GBG⚔


1.  मैं अक्सर मार्शल रेस इत्यादि पे तक़रीरें,  और दलीलें अपने बचपन से सुनता आ रहा हूँ। पहले पंजाब से, और फिर फ़ौज इत्यादि से तालुकात रखने के कारण, ऐसे सैंकड़ों मौके मिले, जब, राष्ट्र, धर्म, समाज,  रेजिमेन्ट, कौम या बिरादरी के नाम पे बहुत कुछ ऐसा सुना, की मन में हंसी आई, लेकिन हंसी दबानी पड़ी, सिर्फ सभ्य होने के नाम पर, लेकिन जब सभ्य लोगों को असभ्यता की सभी हदों को लांघते देखा, तो सोचा की बोलना चाहिए, कहना चाहिए, लिखना चाहिए, कोई सुने न सुने, मैं खुद, मेरी आत्मा और उस मेँ बसता परमात्मा तो अवश्य सुन रहे हैँ, और यह बात अपने आप में मूल्यवान है। खुद से संवाद ही ख़ुदा से संवाद है।

2  नानक, ओशो, रहीम कबीर, रहीम, रविदास जैसे जागृत दिमागों की सोच को पढ़ने, सुनने और समझने का सौभाग्य भी मुझे मिला। कुल मिला कर, यही समझा, की धर्म, राष्ट्र, कौम, अल्लिअंस इत्यादि, किसी कबड्डी, क्रिकेट या वॉलीबाल की टीम से ज्यादा कुछ नहीं। बस गेम्स की फील्ड की पैमाइश और रूल्ज़,  बस टीशर्ट और निक्कर के रंग इत्यादि में ही फ़र्क होता है , और उसी रंग, रूप, और डिज़ाईन इत्यादि के फ़र्क की एवज़ ही,  एक टीम और  दूसरी टीम में फ़र्क पैदा किया जाता है, टीम स्पिरिट इत्यादि का भी निर्माण इन्हीं सभी सुपरफीशियल प्रतीकों द्वारा पैदा और मेंटेन किआ जाता है।  हैं तो सब खेल ही।

3.  कुल मिला के एक गेम का प्लेयर खुद को  केवल उस गेम का प्लेयर मात्र ही समझता  है, और एक बड़े स्तर पे सभी प्लेयर टीम स्पिरिट के साथ साथ स्पोर्ट्स मैन स्पिरिट से भी बाकायदा प्रेरित होते हैं, लेकिन होते तो सभी केवल  खिलाड़ी ही हैं। इस ही तरहं हमारे धर्म और राष्ट्र चाहे अलग हों, हैं तो हम सभी इंसान। किसी भी खेल की टीमों के फॉलोवर या तो आम धार्मिक अनुयाइयों जैसे भीड़ के भेड़ें होती हैं,  या फ़िर टीम में इन्वेस्ट करने वाले बिज़नेस इंवेस्टर्ज़, और या महज़ वह सटोरिये, जो किसी भी जीतने की सम्भावना रखने वाले घोड़े पर दाव लगाते हैं।

4.  जो लोग अपने टीम की टीशर्ट को 24 घण्टे डाल कर के रंग और प्रतीकों के इतने ग़ुलाम हो जाते हैं, की उन्हें उन रंगों और प्रतीकों से आगे कुछ नज़र ही न आये, वह लोग  उन खिलाडियों या फैंन्ज़ की तरहं होते हैं, जो अपनी गेम को ही दुनिया की पहली और आख़िरी गेम समझ बैठते हैं।

5.  खुद को ब्राह्मण, क्षत्रिय, या  वारियर  बैकग्राउंड का बताने वाले, या उच्च अथवा निम्न श्रेणी को बिलौंग करने का दावा करने वाले सभी अहमकों  से कोई यह पूछे कि क्या 1500 या 300 साल पहले निर्मित धर्मों की पैदाइश से पहले, या मनू की श्रेणी वर्गीकरण से पहले,  जंग नहीं होती थी ?  तब भी सिपाही थे, सैनिक थे, फ़र्क सिर्फ यह था कि निशान अलग रहे हों गे,  गेम का नाम और रूलज़ शायद अलग रहे हों गे, और टीशर्ट का रंग और डिज़ाइन शायद अलग रहा हो गा।

6.  मैं किसी धर्म के ख़िलाफ़ नहीं, लेकिन  इन्सान को धार्मिक होने से पहले इन्सान, और इन्सान होने से पहले, एक 'जानवर न बनना', ज्यादा आवश्यक है।  यानी मानव तो मानव से,  वानर-मानव, और फिर आदि-मानव के ज़माने से लड़ता भी आ रहा है, झगड़ता भी आ रहा है, व्यपार और समझोते भी करता आ रहा है, इस में नया क्या है, कुछ भी तो नहीं, सिवाय प्रतीकों के। और प्रतीकों की रक्षा के लिए तो कुत्ते भी लड़ते हैं।

7.  बस इतना जान लीजिये, कि आप की खोपड़ी का आर्केस्ट्रा कैसे बजता है ?  आप को समझाया जाता है कि यह आप के धर्म, कौम इत्यादि पर निर्भर करता है, लेकिन मैं आप को डंके की चोट पर कहता हूँ,   की आप इन्सान होने के साथ, इन्सान होने से भी ज्यादा, किस चीज़ को ज्यादा या कम तरजीह देते हो,  यह दरअसल आप की कन्डीशनिंग पे डिपेंड करता है, लेकिन सिर्फ तब तक जब तक आप प्रतीकों के ग़ुलाम हैं। बीफ़ खाना, सूअर खाना, वेजिटेरिअन होना इत्यादि, ब्राह्मण होना,   क्षत्रिय होना, स्वर्ण होना, असवर्ण होना, हिन्दू, मुसलमान सिक्ख ईसाई इत्यादि होना, इन  सब का गहरे अध्यात्म से कोई रिश्ता नहीं।  यह सब ऊपरी तह  की बाते हैं।आदमी व्ही है, जो सोच समझ के इन्सान बने, बैल,बन्दर, कुता, शेर इत्यादि होने से कुछ आगे बढ़े।
🚩तत्त सत्त अकाल🚩
©📚गुरु बलवन्त गुरुने⚔