1. एक दिन देश के निर्वाचित माननीय प्रधानमंत्री ने, जो खुद को प्रधान सेवक कहते थे , खुद को प्रधान सेवक से बदल कर प्रधान चौकीदार का टाइटल दे दिया। साहिब पुनः निर्वाचन के युद्ध में कुछ ऐसे उतरे, की जैसे, सब स्कोर कार्ड पहले ही से भर रखा हो। यानी Absolutely Confident of Victory.
2. फ़िर क्या था, विपक्ष के लोग एक फ्रांसीसी जहाज़ के नाम का जाप करने लगे, और रफाल रफाल कहते हुए रफाल का रायता हर जगह फैलाने लगे।
3. इस सब शोर-शराबे के बीच, किसी ने एक पटाखा छोड़ा, और वह पटाखा था , 'चौकीदार ही चोर है' का नारा। इस पटाखे का धमाका बड़ी दूर दूर तक सुनाई देने लगा।
4. अब स्त्ता धारी दल के सभी थिंक टैंक काउंटर हमला करने में जुट गए, और इस शोर का इलाज ढूंडने में जुट गए। फ़िर वही हुआ जो अली बाबा चालीस चोर की कहानी में हुआ था। डाकू तो बस अलीबाबा के घर पर निशानी लगा गए थे, लेकिन मरजीना डार्लिंग का कमाल देखिए, मुहल्ले के सभी दरवाजों पर वही निशान लगा आयी। डाकू आए तो सभी कोंफ्युज हो गए, के भाई अलीबाबा का घर, आखिर कौन सा है।
5. बिल्कुल इस ही तर्ज पर, चौकीदार को चोर क्या कहा, एक पूरी की पूरी पलटन ही चौकीदारों कि खड़ी हो गई। क्या मंत्री, क्या संतरी,पलटन के सभी लोग ख़ुद को चौकीदार कहने लगे। 'चौकीदार ही चोर है' की जगह हर ओर 'मैं भी चौकीदार' का शोर फैल गया, और रफाल का रायता, कहीं खो सा गया।
5. इस बीच कुछ ऐसा भी हुआ कि जिस की ओर किसी का ध्यान ही नहीं गया। अंबानी बन्धुओं में भरत मिलाप हो गया। लेकिन इस नाटकीय मिलाप में जो बड़ा राज़ छिपा था, वह 'चौकीदार चोर है, तथा 'मैं भी चौकीदार' के शोर में किसी को नज़र ही नहीं आया।
6. दरअसल बात सोचने समझने की तो यह थी कि अनिल अंबानी जिसे मुकेश अंबानी ने 450 करोड़ रुपए दे कर गरिफ्तारी से बचाया, वह भला रफाल के 25000 करोड़ ₹ के कारखाने को लगाने का ठेका, और इस काम के लिए ऋण की गारंटी, किन आधारों पर ले गया। जो भी हो, रफाल का करोड़ों रुपए का प्रोजेक्ट अनिल को मिलना , अलीबाबा के, 'खुल जा सिम सिम' का खज़ाना हाथ लगने से कम नहीं था।
7. मरजीना अपना काम कर गई, कई अलीबाबा भी लूट का माल ले कर चंपत हो गये, लेकिन डाकू साले अभी भी जिंदा हैं, और वह तेल के कुपों में नहीं छिपे बैठे, बल्कि सियासी कुर्सियों पे बैठे मस्ती ले रहे हैं, और ज्यादा तर अपने अपने सरदार के नाम पर वोटों की लूट के, एक महा डकैती पंचवर्षीय अभियान पे पुनः निकले हुए हैं।
8. एक नहीं अनेक मरजीनाएँ खुद भी अब अलीबाबा के साथ नहीं, किसी न किसी वोट लुटेरा गैंग में शामिल हो चुकी हैं, कुछ तो चुनाव भी लड़ रही हैं। जनता बेचारी अलीबाबा के गधे की तरह और डाकुओं की खच्चरों की तरहां, जुमलों की घास खा कर, कभी अलीबाबा की मेहनत से काटी हुई लकड़ी, यानी टैक्स ढोती है, तो कभी डाकुओं को ढोती है, या उन का लूटा हुआ खज़ाना, यानी नेताओं के भारी भरकम तनख्वाह, भत्ते और पेंशन, तथा वोट का खर्चा ढोती है।
9. अलीबाबाओं , मरजीनाओं और डाकुओं के सरदार और 40 चोरों का कारोबार इस ही तरह बरसों से चलता चला आ रहा है। कभी इस गैंग का सरदार, तो कभी उस गैंग का सरदार गांव का सरपरस्त बन बैठता है। जंता नारे शारे लगा कर संतुष्ट हो जाती है, और चमचे अपना अपना उल्लू सीधा करने के चक्कर में अगले 5 साल बिता देते हैं। दशकों से जनतंत्र के नाम पर यही लूट तंत्र जारी है।
जय सिया राम तो बोलना पड़े गा भानजे।
🚩 सत्य ही अकाल है🚩
©🎙गुरु बलवंत गुरुने✒
2. फ़िर क्या था, विपक्ष के लोग एक फ्रांसीसी जहाज़ के नाम का जाप करने लगे, और रफाल रफाल कहते हुए रफाल का रायता हर जगह फैलाने लगे।
3. इस सब शोर-शराबे के बीच, किसी ने एक पटाखा छोड़ा, और वह पटाखा था , 'चौकीदार ही चोर है' का नारा। इस पटाखे का धमाका बड़ी दूर दूर तक सुनाई देने लगा।
4. अब स्त्ता धारी दल के सभी थिंक टैंक काउंटर हमला करने में जुट गए, और इस शोर का इलाज ढूंडने में जुट गए। फ़िर वही हुआ जो अली बाबा चालीस चोर की कहानी में हुआ था। डाकू तो बस अलीबाबा के घर पर निशानी लगा गए थे, लेकिन मरजीना डार्लिंग का कमाल देखिए, मुहल्ले के सभी दरवाजों पर वही निशान लगा आयी। डाकू आए तो सभी कोंफ्युज हो गए, के भाई अलीबाबा का घर, आखिर कौन सा है।
5. बिल्कुल इस ही तर्ज पर, चौकीदार को चोर क्या कहा, एक पूरी की पूरी पलटन ही चौकीदारों कि खड़ी हो गई। क्या मंत्री, क्या संतरी,पलटन के सभी लोग ख़ुद को चौकीदार कहने लगे। 'चौकीदार ही चोर है' की जगह हर ओर 'मैं भी चौकीदार' का शोर फैल गया, और रफाल का रायता, कहीं खो सा गया।
5. इस बीच कुछ ऐसा भी हुआ कि जिस की ओर किसी का ध्यान ही नहीं गया। अंबानी बन्धुओं में भरत मिलाप हो गया। लेकिन इस नाटकीय मिलाप में जो बड़ा राज़ छिपा था, वह 'चौकीदार चोर है, तथा 'मैं भी चौकीदार' के शोर में किसी को नज़र ही नहीं आया।
6. दरअसल बात सोचने समझने की तो यह थी कि अनिल अंबानी जिसे मुकेश अंबानी ने 450 करोड़ रुपए दे कर गरिफ्तारी से बचाया, वह भला रफाल के 25000 करोड़ ₹ के कारखाने को लगाने का ठेका, और इस काम के लिए ऋण की गारंटी, किन आधारों पर ले गया। जो भी हो, रफाल का करोड़ों रुपए का प्रोजेक्ट अनिल को मिलना , अलीबाबा के, 'खुल जा सिम सिम' का खज़ाना हाथ लगने से कम नहीं था।
7. मरजीना अपना काम कर गई, कई अलीबाबा भी लूट का माल ले कर चंपत हो गये, लेकिन डाकू साले अभी भी जिंदा हैं, और वह तेल के कुपों में नहीं छिपे बैठे, बल्कि सियासी कुर्सियों पे बैठे मस्ती ले रहे हैं, और ज्यादा तर अपने अपने सरदार के नाम पर वोटों की लूट के, एक महा डकैती पंचवर्षीय अभियान पे पुनः निकले हुए हैं।
8. एक नहीं अनेक मरजीनाएँ खुद भी अब अलीबाबा के साथ नहीं, किसी न किसी वोट लुटेरा गैंग में शामिल हो चुकी हैं, कुछ तो चुनाव भी लड़ रही हैं। जनता बेचारी अलीबाबा के गधे की तरह और डाकुओं की खच्चरों की तरहां, जुमलों की घास खा कर, कभी अलीबाबा की मेहनत से काटी हुई लकड़ी, यानी टैक्स ढोती है, तो कभी डाकुओं को ढोती है, या उन का लूटा हुआ खज़ाना, यानी नेताओं के भारी भरकम तनख्वाह, भत्ते और पेंशन, तथा वोट का खर्चा ढोती है।
9. अलीबाबाओं , मरजीनाओं और डाकुओं के सरदार और 40 चोरों का कारोबार इस ही तरह बरसों से चलता चला आ रहा है। कभी इस गैंग का सरदार, तो कभी उस गैंग का सरदार गांव का सरपरस्त बन बैठता है। जंता नारे शारे लगा कर संतुष्ट हो जाती है, और चमचे अपना अपना उल्लू सीधा करने के चक्कर में अगले 5 साल बिता देते हैं। दशकों से जनतंत्र के नाम पर यही लूट तंत्र जारी है।
जय सिया राम तो बोलना पड़े गा भानजे।
🚩 सत्य ही अकाल है🚩
©🎙गुरु बलवंत गुरुने✒