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© ये हो क्या रहा है, आइए समझें❓@✒GBG⚔

1.  भोपाल से साध्वी प्रज्ञा को भाजपा का उम्मीदवार बनाया गया, जिस ने अपने प्रचार के शुरुआती दौर में ही शहीद   हेमंत करकरे की पाकिस्तानी आतंकियों द्वारा निर्मम हत्या को, न केवल सही,  बताया, बल्कि अपने द्वारा दिए गए श्राप का ही फल  बताया, और फिर यह अती निंदनीय बयान  वापिस ले लिया, और इस तरह   देश वासियों का ध्यान एक बार फ़िर बड़े मुद्दों से हटा कर बेमतलब बयानबाज़ी में उलझा दिया। यह एक  पुराना पैंतरा है, मूर्ख वोटरों की वोट खींच कर  सत्ता पाने की करकट  राजनीति का हिस्सा है।

2.  भाजपा ने पहले तो बयान से किनारा किया,  और बाद में यह कह कर दामन झाड़ लिया, की प्रज्ञा  व्यक्तिगत तौर पे भारी मानसिक और शारीरिक दबाव में से निकली हैं, तो यह बयान प्रज्ञा का व्यक्तिगत मामला है। यानी शहीद करकरे की शहादत को गाली देने वाली साध्वी का जलेबी समर्थन।

3.  प्रधानमंत्री  ने टाइम्स के साथ हुई इंटरव्यू  में  इस विषय पर बोलते हुए प्रज्ञा के बयान को नजरंदाज कर के, 'बेल पे और लोग भी चुनाव लड़ रहे हैं,' इत्यादि इत्यादि की ओर ध्यान मोड़ दिया। प्रधान मंत्री की मजबूरी राजनीतिक है। दुबारा सत्ता पाने के लिए, भोपाल हो या चौपाल, प्रज्ञा हो या अवज्ञा, प्रधानमंत्री को ज्यादा से ज्यादा  जीते हुए सांसद चाहिए, जो पुनः भाई की ताजपोशी में सहायक हो सकें।

4.   यानी  पार्लियामेंट्री डेमोक्रेसी में राष्ट्रपति व्यवस्था की तरह   चुनाव लड़ा जा रहा है।  यानी  व्यवस्था के  गलत प्रचार और प्रचलन के चलते, देश की अब तक की सभी राजनीतिक पार्टियों की सरकारों ने देश की जनता को, ना गधा, ना घोड़ा, बल्कि भार उठाने वाली बांझ सी खच्चर बना के रख दिया है, जिस का काम है, अपनी मेहनत की कमाई  पर राजनैतिक सफ़ेद हाथियों की फौज के लिए टैक्स का राशन ढोना, और ढोते चले जाना, ढोते चले जाना, और ढोते ही चले जाना ।

5.   चर्चिल ने कहा था आज़ादी के 60 साल बाद  भारत पर thieves और thugs  rule करें गे।   वह दिख रहा है।  उस ने यह इस लिए कहा था, क्यों कि वह जानता था, जिस किस्म की पार्लियामेंट्री डेमोक्रेसी की व्यवस्था भारत की जनता को दी जा रही है, उस के लिए  अभी जनता शिक्षित और जागरूक ही नहीं  है।

6.  जहां लोगों को यह ही नहीं पता कि वह प्रधानमंत्री का चुनाव  या  मुख्यमंत्री का चुनाव कर के नहीं, बल्कि  अपने इलाके के लिए एक अच्छा सांसद या विधायक चुन कर,  देश की व्यवस्था और प्रशाषण के सुचारू संचालन में  बेहतर  योगदन कर सकते हैं, वह यह कैसे समझें गे कि, चोरों और ठगों की बारात का दूल्हा चाहे कोई भी है, फ़र्क नहीं पड़ता, क्यों कि चोरों का सरदार अलीबाबा, इन्हीं सब 272 चोरों  के कंधो पे बैठ कर  ही  तो सत्ता पाना चाहता है।

7.  मेरा सविनय निवेदन केवल इतना है, कि यदि मोदी राष्ट्रपति प्रणाली के चुनाव जैसे चुनाव जीत कर  पुनः सत्ता में आते हैं, तो  कम से कम,  इतनी  इमानदारी तो दिखाएं कि व्यवस्था को  राष्ट्रपति व्यवस्था ही में बदल दें।  अमेरिका जैसी हरामी व्यवस्था नहीं, बल्कि केवल शुद्ध रूप में, सभी प्रत्याशियों में से एक व्यक्ति का चुनाव, शीर्ष पद के लिए, और फिर 4 साल तक  सब कुछ उस पे छोड़ दिया जाए, वह जिसे चाहे, काबिलियत के हिसाब से, सरकारी महकमों का प्रमुख बनाए, और फ़िर दबा के डंडा चलाए, और खुद केवल गुड गवर्नेंस एश्योर करे, और इस तरह 543 एमपी और हजारों विधायकों का भार देश की व्यवस्था से उतार फेंके। कानून कौन बनाए गा, यह एक अहम सवाल है, लेकिन अब कौन बना रहा है, यह भी तो इक सवाल है। वक़्त के साथ यह सवाल आसानी से हल कर लिया जाए गा।
⏯ यही होने भी जा रहा है। ⏮
🚩सत्य ही ईश्वर है 🚩
🎙✒गुरू बलवंत गुरुने 📚⚔

🚩देर आये, सुस्त आये, कैसे कह दें दरुस्त आये?🚩@ ✒GBG⚔

1.  सरकार के तीन नये कानून लाने के फैसले हैं तो बहुतु अच्छे लेकिन एक तो यह बहुत देरी से आये हैं, और दूसरा  इन का लागू होना भी एक बुझारत बूझने की क़वायद जैसा है।  एक तो है, तीन तलाक को ख़ारिज करने का फैसला,  दूसरा है GST को यकरंग करना, और तीसरा है ग़रीब सवर्णों को 10 प्रतिशत आरक्षण।

2.  हर अच्छी चीज़ का स्वागत करना, अभिन्नन्दन करना  अनिवार्य है,  अतः सरकार के  फैसलों का स्वागतम, लेकिन सच्च की कसौटी पे इन की सार्थकता का परखा जाना भी अनिवार्य है।

3.  याद रहे कि यह मुद्दे बिलकुल नये नहीं हैं। GST का मुद्दा  UPA के समय भी भुनाया गया, और तब भजपा ने इस का जम के विरोध किया था। तीन तलाक के मुद्दे पर उच्चतम न्यायालय 2002 में शमीम आरा बनाम स्टेट ऑफ़ यूपी केस में तीन तलाक को पहले ही गैर संवैधानिक ठहरा चुकी है। सवर्णों के लिए आरक्षण का मुद्दा भी 27 साल से बार बार उछाला जाता रहा है। 1991 में नरसिम्हा सरकार ने सवर्णों को 10% कोटा देने का फैसला किया था, जिसे 1992 में सुप्रीम कोर्ट ने असंवैधानिक ठहराया। वो कहते हैं न की यदी बात कहने भर से बात बन सकती, तो न जाने कब का गधे ने खुद को घोडा कह कर घोडा बना लिया होता।  सरकार के इन फैसलों का असरदार होना  मुश्किल लग रहा है, आइये देखें कैसे।

4.  पहले बात करते हैं तीन तलाक बिल की। इस में कोई शक़ नहीं की 'तीन तलाक़' के प्रावधान के ख़िलाफ़ लाया जा रहा बिल मुस्लिम महिलाओं के मानव अधिकारों की रक्षा के लिए उठाया गया एक  बहुत अच्छा कदम है, और इस का भारतीय संविधान और भारतीयता की रक्षा में एक बड़ा योगदान रहे गा, लेकिन तभी, जब यह बिल पास हो कर कानून बन सका, अन्यथा यह सब केवल राजनितिक धांधली ही साबित हो गा।

5.   याद रखिये कि लोक सभा में तो 27-12-2018, को यह बिल पारित हो गया, जिस के लिए मोदी सरकार सराहना की पात्र है,  लेकिन राज्यसभा में भाजपा के साथी ही इस के ख़िलाफ़ खड़े नज़र आते हैं।

6.   जन्ता दल यूनाइटीड के वशिष्ठ नारायण सिंह ने इस बिल के बारे कहा कि, “We feel the way this bill is being rushed, it was avoidable and we feel more consultation should have taken place".   AIADMK के लीडर एम थम्बीदुराई ने कहा की वह भी मिनियोरिटीज़ की हिफाज़त के लिए, इस बिल की ख़िलाफ़त करें गे।

7.  अब यही लोग अपने राजनितिक फायदे के लिए कांग्रेस के भी ख़िलाफ़ खड़े हैं, और मुस्लिम महिलाओं के हक़्क़ हकूक के भी ख़िलाफ़ खड़े नज़र आते हैं। भाजपा और उस के नेता इन सभी तथ्यों से जानकार हैं। उन्हें मालूम है की यह सब नाटकबाज़ी चल रही है, ऐसे में वह बिल की ख़िलाफ़त करने वाले साथी दलों का हाथ क्यों नहीं झटक देते ?

8.  उत्तर है राजनितिक नुकसान का डर। तो कुल मिला कर  मुस्लिम औरतों का राजनितिक दिल लुभाने के लिए यह बिल एक अच्छा हथकंडा है, दर असल बिल लागू हो न हो, इस बात की किसी को परवाह नहीं।  यानी बिल का कानून बनना मुश्किल नज़र आता है, हाँ इस के ख़िलाफ़ या पक्ष में  हल्ला अवश्य मचाया जा सकता है, और कुछ वोट भी सहेजे  जा सकते है।

9.  अब GST की बात करें, तो जो काम किया ही 'एक राष्ट्र, एक कर' के असूल पर, तो उस  एक रुपी कर में दर्जनों स्लैब बनाने की क्या आवश्यकता थी, और फ़िर उस GST कानून में 300 से भी ज्यादा संशोधन किये जा चुके हैं।

10.  आम करदाता की तो बात ही छोड़िये, वकील और CA भी इस GST के  इंद्र-जाल ने अपना माथा पटकने पर मजबूर कर दिए हैं।  यानी,  साहिब और साहिब की टीम को कम से कम कोई कानून लाना है, तो पूरी तरहं जांच परख के लाओ।  यदी मेरे स्कूल की कक्षा में कोई एक ही विषय में बार बार ग़लती करे, तो उसे क्लास से बाहर कर दिया जाता था, लेकिन यहां कौन कहे, सुधर जाओ साहिब वरना 2019 में आप को जन्ता सत्ता से बाहिर कर दे गी।  अब चुनाव सर पे है,  और आचार संहिता भी लागु होने को है, तो चले बिल्ले हज करने।

11.  चलिये अब ग़रीब  सवर्णों के लिए 10 % आरक्षण की बात करें।  यह बिल भाजपा द्वारा मौके पे चौका मारने की क़वायद है। बेशक़ कोई भी दल इस का खुल कर विरोध नहीं करे गा, और 3 प्रदेशों में सिमटी भाजपा पुन्ह सवर्णों को लुभा कर खोया वोट शेयर  हासिल करने में कुछ कामयाब भी हो गी,  लेकिन यह खेल नया नहीं है। पहले तो यह बिल भी तीन तलाक़ की तरहं राज्य सभा में ही शायद अटक जाये ।  कारण एक तो मोदी का जादू और शाह का दबदबा अब उठ चुका है,  बगावत जगह जगह सर उठा रही है। आसाम  के भाजपाई मित्र, शिव सेना, अडवाणी जी, गडकरी, शत्रुघ्न सिन्हा, और न कितने ही लोग बगावत के अलम लहराने को बेताब हैं। बहुत से भाजपाई और साथी भाजपाई  चूहे भी, अब जहाज़ से छलांग लगाने और किसी दूसरे गठबंधन की नौका पे सवार होने पर गहन विचार कर रहेे हैं। तो इस सब के चलते, बावजूद इस आरक्षण के, स्वर्ण वोट सभी दलों में बंट जाएँ गे।

12.  मूलभूत दिक्कत इस परपोज़ल में यह है, की आप सवर्णों के हिस्से में से ही, 10%  आरक्षण सवर्णों को देने की बात कर रहे हैं, जब की आरक्षण का फायदा पा रही दलित और ओबीसी की क्रीमी लेयर का आरक्षण, जस का तस्स बना हुआ है।

13.  यानी बात तो चली थीे आरक्षण को मूलताः समाप्त करने की, या आरक्षण पा रही क्रीमी लेयर से 10% आरक्षण सवर्णों को देने की, लेकिन बात निपट रही है सवर्णों में ही एक नया वर्ग स्थापित करने की, यानी स्वर्ण वर्गीकरण की।  एक नया वर्ग, अब बन जाये गा  आरक्षित स्वर्ण वर्ग । इस सब में राजनीती की दुर्गन्ध साफ़ आती है, यानी पहले ही से आवंटित समाज को और भी बाँट देंने की क़वायद।

14.  बात इतने पे समाप्त नहीं होती, इस नई स्वर्ण आरक्षित श्रेणी में गिने जाने के मानक भी कुछ अजब गजब हैं, जैसे की किसी के पास मुनिसिपिल लिमिट में 200 गज से ज्यादा का प्लाट/घर न हो, अरे भाई हिमाचल के किसी छोटेे शहर में किसी के पास 500 गज़ का भी घर हो, तो उस की कीमत आज के वक्त भी कुछ ज्यादा नहीं बने गी, जब की मुम्बई या दिल्ली में केवल 50 गज़ जगह भी करोड़ो रुपये की हो गी। यानी किसी के आर्थिक सामर्थ्य को आप केवल घर के नाप पे नहीं आंक सकते।

15.  फिर  भी मसला यहीं समाप्त नहीं होता। ऐसा न हो की यह भी पुन्ह 1991 वाली नरसिम्हा सरकार के सवर्णों को 10% आरक्षण देने का रि-पले ही साबित हो। चुनाव के बाद कोई भी व्यक्ती सुप्रीम कोर्ट में मुद्दे को उठा कर, इसे असंवैधानिक फैसला होने की अपील डाल दे।

16.  मुद्दे  तो और भी बहुत हैं, लेकिन चारागरी का दावा करने वालों के पास देश के दर्दे दिल का कोई इलाज नहीं, सिवाय नई नई बीमारियां ढूँढने के, और एक दूसरे राजनीतिज्ञ या राजनितिक दल को कोसने के।

17.  यानि मौजूदा सरकार यह सब नये बिल आदि लाने का एक जाना बूझा प्रयास, जो एन चुनाव के मौके पे कर रही है, कहीं न कहिं यह सब राजनितिक लाभ के लिए किये जा रहे तालिसमि प्रदर्शन मात्र ही ज्यादा लगते हैं, अन्यथा कुछ नहीं।

18. तभी  मैं कहता हूँ की व्यवस्था परिवर्तन आवश्यक है,  तां की संविधान और मानव अधिकारों की रक्षा डंके की चोट पर की जा सके। मेरा सदृढ़ विश्वास है, कि यदी भारत को एक मजबूत देश बन कर उभरना है, तो देश में केवल संवैधानिक कानून ही लागू होने चाहिए।

19. यहां किसी भी वर्ग को,  धर्म को, या समुदाय को, आस्था और परंपरा के नाम पर खुद को, संविधान और संविधान द्वारा निर्मित कानून से ऊपर,  लादने का कोई अधिकार नहीं होना चाहिए।

20.  साथ ही यह भी आवश्यक है कि कानून बनाने और उस में संशोधन की पेचीदा प्रक्रिया को सरल और ज्यादा लोकतान्त्रिक,  तथा  बेहतर बनाने पर ध्यान दिया जाना चाहिये। जहां लोकतंत्र ही जाली हो, उस देश का माली तो गुलशन का लुटेरा ही हो गा, नाम, दल या पार्टी यह हो या वह। देश सुधारना है तो वयवस्था में संशोधन आवश्यक है, आरक्षण वारक्षण के गोलगप्पे  कुछ चुनावी लाभ तो देते हैं, लेकिन देश को समाज का बंटवारा  कर के भ्र्ष्टाचार और विघठन की और भी गहरी गर्त में गिरा देते हैं,
🚩तत्त सत्त अकाल🚩
✒गुरु बलवन्त गुरुने.⚔

🚩भारत के असली मुद्दों पे कुछ बात हो जाये🚩@✒GBG⚔


1.  क्या आप जानते हैं, आप की भृष्ट व्यवस्था #हररोज़  #EveryDay #18000करोड़  रुपया, यानि 18,000-00,00,000₹ केवल देश के नेताओं, मंत्रियों सांसदों, विधायकों एंवम अन्य नेताओं के वेतन, नखरे चोचले, खाना पीना,  उद्घाटन नौटंकी, सैर सपाटा और अन्य ड्रामेबाज़ी पर खर्च करती है।

2.  कभी सोचा है एक साल में इन जुमलेबाज़ों पे खर्च हुई यह राशी कितनी हो गी ? संयुक्त रूप से #भारत   हमारी अती #भृष्ट राजनीतिक #व्यवस्था के चलते,  18000x 365, यानी #65लाख70हजारकरोड़ ₹ ,  यानि 65,70,000-00,00,000 ₹ सालाना, देश के महाभृष्ट और नौटंकी बाज़ नेताओं पर खर्च करता हैं।

3.  कुछ लोग 3000 करोड़ के पटेल साहिब के सटेच्यु को रो रहे है, अरे भाई वह तो फ़िर भी एक एक पर्यटन स्थल और स्मृति चिन्ह है। अगर सभी नेताओं को केवल 10 दिन के लिए सिस्टम से गायब कर दिया जाये तो केवल 10 दिन में देश की 1,80,000 करोड़ ₹, यानि एक लाख 80 हज़ार करोड़ ₹ की बचत हो गी। सदा के लिए इन्हें गायब किया तो समझो देश के न्यारे वारे हो जाएँ गे। यह है असली मुद्दा।

4.   इलावा इस के मन्दिर, मस्जिद, शहरों का नाम बदली करना, हिन्दू मुसलमान सिक्ख ईसाई का झगड़ा, जातपात का झगड़ा, इन सब में भी जन्ता को उलझाया जाता है, जिस के चलते अन्य सब बड़े बड़े भ्र्ष्टाचार के मुद्दों से ध्यान हटाया जा सके।

5.  शोर ही मचाना है तो नेताओं की बगार बन्द करवाने के लिए मचाओ।   केवल  1 बार सांसद या विधायक बनने के बाद, इन को उम्र भर मिलने वाली पेंशन और बाकी मुफ़्त सहूलतें बन्द करवाओ।

6.  देश की बात करनी है तो असली मुद्दों को पकड़ो, हज़ारों भृष्टाचारी सांसदों, विधायकों और बाकी छुटपुट कॉरपोरेटर, कॉन्सलर इत्यादि, जो व्यवस्था पर जोंकों से लदे हैं, इन  का व्यवस्था में स्थान भंग करवाने के लिए मुहीम चलाओ।  भ्र्ष्टाचार मुक्त भारत तभी बने गा जब भृष्टाचारी नेताओं की भीड़, जो व्यवस्था पर लदी है,  समाप्त हो गीे।
🚩तत्त सत्त अकाल🚩
✒गुरु बलवन्त गुरुने⚔