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🚩यदि संक्रमण से जंग में हुई कोताही, तो हर तरफ़ होगी तबाही ही तबाही🚩@ ✒GBG⚔

1.  आज की सब से बड़ी खबर यह है कि पंजाब के  माननीय मुख्यमंत्री, कैप्टन अमरिंदर सिंह ने एक टेली प्रेस कॉन्फ्रेंस की, जिस में उन्हों ने दो दिल दहला देने वाले तथ्य लोगों के सन्मुख रखे। याद रहे की मुख्य मंत्री या प्रधानमन्त्री, जब कोई बात कहते हैं, उस बात के पीछे सैकड़ों वैज्ञानिकों, हैल्थ एक्सपर्ट्स और विशेषज्ञों का  ज्ञान हुआ करता है, सलाह  हुआ करती है, यदी इस औहधे के लोग, सलाह लें तो। अब यदि किम जोंग जैसे लोगों की बात करें, तो वह तो सनकी और खब्ती इंसान है।  भारत के नेताओं से किम जोंग जैसे ग्धेपन की उम्मीद नहीं की जा सकती।

2.  पंजाब के मुख्य मंत्री ने क्या कहा ? एक तो यह कि करोना अभी लंबा चले गा।  कयास लगाया जा रहा था, कि करोना 15 अप्रैल तक पीक करे गा, और मई तक थमना शुरू हो जाए गा, मेरा भी यही अंदाज़ा था,   लेकिन अब जो स्थिति बनती नजर आ रही है, वह यह है कि,  करोना जुलाई अगस्त में पीक करे गा, और अक्टूबर तक ही शायद काबू में अा सके, वह भी तब, अगर " हर्ड इम्यूनिटी " का सिद्धांत काम कर गया तो।  दूसरा जो मुख्य मंत्री ने कहा, वह यह की पंजाब की 87% आबादी के इस वायरस द्वारा प्रभावित होने का खतरा है। खबरों की मानें तो माननीय प्रधानमंत्री ने भी देश की 58 % आबादी के संक्रमित हो जाने की चिंता जताई है।

3.  इस खबर को यदि एनालाइज किया जाए तो कुछ चौंकाने वाले परिणाम सह्मने आते हैं। याद रहे की पिछली जनगणना के हिसाब से पंजाब की जनसंख्या 2 करोड़ 80 लाख के करीब है,   जिसे आज मोटे तौर पे गणित लगाने के लिए 3 करोड़ माना जा सकता है। भारत की जनसंख्या 130 करोड़ है।

4. अब करोना ने विदेश में कैसे नुकसान किया, इस के विश्लेषण के लिए,  इटली और चीन का रुख करें,  तो इटली में करोना संक्रमित लोगों की  मृत्यु दर 7% और चीन में यह 3% रही है। अमरीका में जब 3 लाख लोग  संक्रमित गिने गए, तो उन में से तकरीबन 10,000 मृत हुए, यानी हर 20 में से एक व्यक्ति, हर 100 में से 5 व्यक्ति, यानी 5% मृत्यु दर।

5.  मैंने अपने पिछले  लेख में भी लिखा था, कि हमारे देश, यानी भारत की जनसंख्या डेंसिटी अमरीका से 11 गुणा ज्यादा है। अमरीका भारत से 3 गुणा ज्यादा इलाका रखता है, जब की इस के विपरीत,  भारत के पास अमरीका से 4 गुणा ज्यादा आबादी है।   लेकिन हम संक्रमण और मृत्यु दर को 11 गुना नहीं, केवल 2 गुणा ही अमरीका से ज्यादा लेे कर चलेंगे। तो  मान कर चलें कि  भारत में, विपरीत परिस्थितियों के चलते यह दर 10% तक भी हो सकती है।

6.   लेकिन  आशावादी होते हुए हम इस दर को 5% पे फ्रीज़ करते हैं।   यानी 100 संक्रमित लोगों में से 5 रोगियों की मौत।  तो इस हिसाब से 3 करोड़ की आबादी वाले पंजाब में, जहां कप्तान अमरिंदर सिंह जी ने 87% लोगों के जुलाई अगस्त तक संक्रमित होने का अनुमान दिया है, वहां  3 करोड़ में से 87%, यानी 2 करोड़ 61 लाख लोगों के संक्रमित होने का अंदेशा है।   और 5% की मृत्यु दर लगाते हुए,  केवल करोना से तकरीबन 13 लाख लोगों की मृत्यु संभव है। बताता चलूं कि मृत्यु के बाकी कारण अपनी जगह, जस के तस बने रहेंगे।

7.  भारत में  नेशनल लेवल पे 58%  संक्रमण का ख़दसा प्रधान मंत्री जी ने जताया है, मेरा अंदाजा है, यह 60% होगा।  130 करोड़ का 60% बनता है  78 करोड़ लोगों के  संक्रमित होने की संभावना। अब 5 % की मृत्यु दर के चलते मरने वालों की संख्या, 3.9 करोड़, या मोटे तौर पे 4 करोड़ तक जा सकती है ।

8.  यह अनुमान मैंने, देश के बड़े नेताओं के बयानों पे आधारित  आशावाद के सहारे लगाए हैं। यदि प्रैक्टिकल हो कर संक्रमण से ग्रसित लोगों में से 10%  की मृत्यु की संभावना लगाएं, तो पंजाब में  26 लाख और भारत में 8 करोड़ लोगों को अक्टूबर तक, करोना अपना ग्रास बना सकता है। 

9. अब करते हैं बात पते की, यानी इस लेख के उद्देश्य की । मित्रो,  याद रहे, करोना अमीर गरीब, हिन्दू , मुसलमान, सिक्ख ईसाई, यानी धर्म के नाम पर, या जात पात के नाम पर, या इलाके के नाम पर कोई भेद भाव नहीं करता। करोना की  इस निष्पक्षता के चलते,   सभी एहतियात और सावधानियां, सभी के लिए एक सी हैं।

10.  इस के इलावा कुछ  अनिवार्य सत्य भी देश और कौम के समक्ष खड़े हैं। कनक कि लाखों एकड़ में खड़ी पकी हुई फसल, कटने के लिए तैयार खड़ी है।  कारखानों की मशीनें, कारीगरों के दर्शनों को तरस रही हैं, प्रोजेक्ट मजदूरों के पवित्र हाथों द्वारा की जा सकने वाली मेहनत को तरस रहे हैं, यानी देश के असली  रोजगार देने वाले मजदूरों के मन्दिर मस्जिद, पुनः अपने भक्तों, और पुजारियों यानी मजदूरों के पांव की आहट को तरस रहे हैं।  दुकानें ग्राहकों को तरस रही हैं, व्यपार व्यपारियों को तरस रहा है, और सूनी सूनी सड़कें, और रेलवे लाइन, लरियों और रेलों के आवागमन को तरस रही हैं। हमें सभी को मिलजुल कर अपने देश की अर्थ व्यवस्था को वापिस  पटरी पर भी लेजाना है। इस के चलते एक सैनिक की तरह सीना तान के इस युद्ध में उतरना होगा।  जिए तो जिए, मरे तो मरे।  किसी डाक्टर या नर्स का करोना से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त होना, किसी सैनिक की शहादत से कम नहीं। सभी को दिल से सलाम।

11.   यह भी सच है, कि देश विदेश के राष्ट्रध्यक्ष,  प्रधानमन्त्री, प्रदेशों के मुख्य मंत्री, सेना अध्यक्ष, प्रदेशों के डीजीपी,  जिलों के डीसी और पुलिस चीफ, डाक्टर, वैज्ञानिक, बुद्धिजीवी, सभी इस प्लेग से बचने का एक ही मंत्र बता रहे हैं, और वह है समाजिक दूरी बनाए रखना। कृपया इसे अवश्य मानिए, जब तक की कहीं भी आना जाना अनिवार्य ना हो।   साबुन से बार बार हाथ धोते रहना, मास्क और दस्ताने डाल कर विचरण करना,  तथा बाकी सब एहतियात की बातों से तो आप आलरेडी वाक़िफ हैं।  तो कुल मिला कर निष्कर्ष यह निकला, कि बचाव ही में बचाव है। सावधानी में ही समझदारी है। बाकी मौत से कया डरना। जब भी सरकार इजाज़त देती है, तब सर पे बांधो कफ़न और  काम पे निकलो। मेरे देश के मजदूरों, सैनिकों, पुलिस कर्मियों  और किसानों को गुरु गुरुने का शत्त शत्त प्रणाम।
🚩सत्य ही अमृत है🚩
🔱सत्य सुनें, सत्य सुनाएं, सत्य ही का प्रसारण करें।🔱
@✒गुरु बलवंत गुरूने⚔

🚩Ringing Bells and Clapping was a Rude Display of Lack of Empathy for Victims of Epidemic.🚩

1.   Supporting the 'Janta Curfew' was alright. A country wide lock down was a medical emergency and thus a necessity.   I heartily supported it, and will willingly support it again, as and when our government shall require us to do so,    'but' clapping of hands and ringing of bells  was nothing more than a cheap publicity stunt. It all looked like a vulgar display of  insensitivity and  looked  hollow and cheap.

2.  Many people came out and did it, partly because it is such an easy thing to do. Just  stand there and applaud and then walk back into our houses feeling self content, as if we have actually achieved something,  and partly many folks  did it just  because everyone else is doing it @ 'Fear Of Missing Out'. If the true intent to appreciate the health and sanitation workers existed,  the government would have focused on providing them with health care kits, rather than just ringing bells. The health workers  don't have enough personal protective equipment (Full body plastic suits we've seen frontline workers wearing in China and Italy).  They don't have enough testing kits. There have been cases where doctors and nurses working with COVID-19 haven't been tested yet,  as there aren't enough kits. The pitiable number of ventilators and  ICUs are nothing to applaud about.

3.   What's wrong with such symbolism is, that for Chamchas, it's just a chance to display their cheap support to a politician's call, bent upon believing that he is irreplaceable for India.  The common man imagines that, healthcare and other frontline workers are taken care of, by  just ringing a bell or clapping hands for them.  I'm afraid it doesn't work like that. The doctors and frontline workers are too busy to ask questions, they want us to see what's not going proper for them. They want us,  the people of India to  ask questions from our government on their behalf. We must ask the  government everyday, what it is actually doing for these frontline health workers on ground.

4.  Ironically, by ringing  bells and clapping our hands, we were simply hurting the sentiments of those suffering the consequences of epidemic.  Are we celebrating the suffering and death of thousands of lives taken by Covid-19,  or are  some of us even superstitiously HOPING, that like this the virus will disappear ?  Some fools were even dancing and making loud noises while clapping there hands.  How foolish and heartless it all seemed.  If it's all about showing support for health workers, well then,  rather than ringing bells, why don't  the clappers offer themselves as volunteer health assistants.

5.   I am sorry, but the truth must be upheld.  Personally, I appreciate the 'Janta Curfew',  as well as the lockdown, but this bell and clap drill sounded rather sick, when in Italy coffins are awaiting burials  for lack of space, and in India, people are not only dying, but  don't even know what is about to hit them.  Instead of ringing a bell or beating my daphali, I rather said a silent prayer for the departed souls, and those continuing to suffer unsaid pain @ Covid-19.

6.  केवल शोरशराबे के माध्यम से और इस तरह की ड्रामेबाजी  से काम नहीं चले गा आदरणीय, प्रधान प्रचारक साहिब । अभी तो बीमारी और जोर पकड़ेगी ।  कुछ निर्णायक कीजिये।  हर स्वास्थ्य सेवा करने वाले को full body masks मुहैया करवाना सरकार का फ़र्ज़ है। टेस्टिंग किट्ट भी भारी मात्रा में कम हैं।   केवल ताली या घंटियां बजाने से  COVID-19 पर विजय नहीं पाई जा सकती।
🔱🚩 सत्य ही शिव है🚩🔱
✒GBG⚔

🚩भारत की राजनीति का अटल सत्य दर्शन🚩@🎙GBG✒

1.  भारत के राजनेता लगातार भारतवासियों को, दशकों से राजनैतिक धोखा देते चले आ रहे  हैं। यहां  खुद के खिदमतगार  नेता, खुदा,  धरम, जात, इलाका या किसी व्यक्ति के नाम पे वोट प्राप्त कर  के,  सत्ता के मज़े लूट रहे हैं, और देश का,  व्यवस्था और जनता का शोषण कर रहे हैं, लगातार पिछले 70 साल से।

2.   भारत एक पार्लियामेंट्री डेमोक्रेसी है, यानी यहां लोगों को चाहिए कि वह  केवल लोकल मुद्दों  को ध्यान में रखते  हुए,  अपने लिए  लोकसभा या विधानसभा  में भेजने के लिए एक काबिल लोकल नेता को  चुनें।  फ़िर इन  चुने हुए नुमाइंदों को अपना नेता चुनने दो, जो देश का प्रधान मंत्री या प्रदेश का मुख्य मंत्री  बने।

3  लेकिन देश का दुखांत यह रहा, कि मंगल पांडे, राजगुरु,  आज़ाद, बिस्मिल, और भगत सिंह जैसे  बगावती  शहीदों की कुर्बानियों पर बना यह  देश,  केवल हरामी चमचों का मुल्क बन कर रह गया।

4.  यानी नेहरू  इंदिरा  के दौर  में शुरू हुआ व्यक्ति वाद का खेल, पहले पर्टिवाद पे भारी पड़ा। यहां तक कि नेहरू इंदिरा के रसोइए, नाई, धोबी बटलर, सब नेता बन गए।  यानी एक ऐसा दौर शुरू हुआ कि जिस में किसी व्यक्ति का राजनैतिक कद्द, काब्लियत से नहीं, बल्कि चापलूसी से नापा जाने लगा। यानी आप परिवार के चमचे कितने बड़े है, वह आप के राजनैतिक भविष्य का मानक बन गया।

5.  इस विध्वंसक और वीभत्स व्यूहरचना से निकलने के लिए, वाजपई ने गाय रक्षा का सहारा लिया, आडवाणी ने मन्दिर मस्जिद का, जब की वह असली मुद्दों, जैसे भ्रष्टाचार  कुव्यवस्था की बात कर के भी चुनाव जीत सकते थे, लेकिन  फिर भी, वाजपई ने गाय रक्षा का सहारा लिया, और आडवाणी ने मन्दिर मस्जिद का, और वहां से शुरू हुआ राजनीति का अत्यन्त दूषित कुचक्र।

6.  मोदी इस विकार युक्त सोच और नीति से उपजा हुआ नेता है, तो मोदी को अपराधी क्यों माना जाए। मोदी की देश के  प्रति  सर्वोत्तम  सेवा यही है, कि मोदी ने  नेहरू, इंदिरा और वाजपई आडवाणी की विरासत को एक साथ वक़्त के कूड़े दान में डाल दिया। देश प्रेमी शुक्र गुज़ार हैं।

7.    लेकिन इस का  मतलब यह नहीं कि मोदी को राजनाथ इत्यादि अपनी चाटुकारिता   का  शिकार बना डालें, और यहां  तक कह  डालें की यदी इंदिरा ने 1971 के नाम पर इलेक्शन जीती, तो पुलवामा के नाम पे वोट मांगना मोदी के लिए क्यों गलत है। भाई राजनाथ सिंह, आप ने  सीआरपीएफ में 2 दिन भी नौकरी नहीं की, आप के परिवार का कोई व्यक्ति शहीद  नहीं हुआ।

8.  तो  आप को, ना मोदी को, न  किसी और को,  पुलवामा के शहीदों की शहादत की मार्केटिंग करने का   रती भर भी अधिकार नहीं है। आप को सत्ता चाहिए, शौक से लीजिए, लेकिन शहीदों के शवों पे राजनीति की, तो परिणाम अत्यन्त दुखद ही हों गे

9.  कारण मैं बताता हूं भ्राता। कारण स्पष्ट है, चिताओं पर राजनीति करने वाले सदा कुत्ते की मौत मरे हैं, इंदिरा हो, सदाम हो, गद्दाफी हो या  कोई और।

10.  इस लिए मोदी के नाम की चाय पी कर , मोदी की छाया के पकौड़े खा कर बना कोई  मंत्री हो या संतरी हो, इतना अवश्य जान ले,  कि आप मोदी को उस हद्द तक ना इस्तेमाल करें, कि मोदी ही विखंडित हो जाए।

11.  वैसे भी भारत वर्ष इतना चूतिया नहीं, जितना आप समझ रहे हैं, और जिस दिन जनता ने पलट वार किया, वह आप के लिए असहनीय  होगा।
🚩 सत्य ही ईश्वर है🚩
🎙✒गुरु बलवंत गुरूने📚⚔

🚩मैं भी चौकीदार का नारा छोड़ो, कहो मैं भी वोटर।🚩@GBG

1.  एक दिन देश के निर्वाचित माननीय प्रधानमंत्री ने, जो खुद को प्रधान सेवक कहते थे , खुद को प्रधान सेवक से बदल कर प्रधान  चौकीदार का टाइटल दे दिया। साहिब  पुनः निर्वाचन के युद्ध में कुछ ऐसे उतरे, की जैसे, सब स्कोर कार्ड पहले ही  से भर रखा हो। यानी Absolutely Confident of Victory.

2.    फ़िर क्या था,  विपक्ष  के लोग एक  फ्रांसीसी  जहाज़ के नाम का जाप करने लगे, और रफाल रफाल कहते हुए रफाल का  रायता हर जगह फैलाने लगे।

 3.   इस सब शोर-शराबे के बीच, किसी ने  एक पटाखा छोड़ा, और वह पटाखा था , 'चौकीदार ही चोर है'  का नारा। इस पटाखे का धमाका बड़ी दूर दूर तक सुनाई देने लगा।

4.  अब स्त्ता  धारी दल के सभी थिंक टैंक काउंटर  हमला करने में  जुट गए, और इस शोर का इलाज  ढूंडने में जुट गए।  फ़िर वही हुआ जो अली बाबा चालीस चोर की कहानी में हुआ था। डाकू तो बस अलीबाबा के घर पर निशानी लगा गए थे, लेकिन मरजीना डार्लिंग का कमाल देखिए, मुहल्ले के  सभी  दरवाजों पर वही निशान लगा आयी। डाकू आए तो सभी कोंफ्युज हो गए, के भाई अलीबाबा का घर,  आखिर कौन सा है।

5. बिल्कुल इस ही तर्ज पर, चौकीदार को चोर क्या कहा, एक पूरी की पूरी पलटन ही चौकीदारों कि खड़ी हो गई। क्या मंत्री, क्या संतरी,पलटन के सभी लोग ख़ुद  को  चौकीदार कहने लगे। 'चौकीदार ही चोर है'  की जगह हर ओर 'मैं भी चौकीदार' का शोर फैल गया, और रफाल का रायता, कहीं खो सा गया।

5.  इस बीच कुछ ऐसा भी हुआ कि  जिस की ओर किसी का ध्यान ही नहीं गया। अंबानी बन्धुओं में भरत मिलाप हो गया। लेकिन इस नाटकीय मिलाप में जो बड़ा राज़ छिपा था,  वह  'चौकीदार चोर है,  तथा 'मैं भी चौकीदार'   के शोर में  किसी को नज़र ही नहीं आया।

6.  दरअसल बात सोचने समझने की तो यह थी कि अनिल अंबानी जिसे मुकेश अंबानी ने 450 करोड़ रुपए दे कर गरिफ्तारी से बचाया, वह भला रफाल के 25000 करोड़ ₹ के कारखाने को लगाने का ठेका, और इस काम के लिए ऋण की गारंटी, किन आधारों पर ले गया। जो भी हो,  रफाल का  करोड़ों रुपए का प्रोजेक्ट अनिल को मिलना , अलीबाबा के, 'खुल जा सिम सिम' का खज़ाना हाथ लगने से कम नहीं  था।

7.  मरजीना अपना काम कर गई,  कई अलीबाबा भी लूट का माल ले कर चंपत हो गये, लेकिन डाकू साले अभी भी जिंदा हैं, और वह तेल के कुपों में नहीं  छिपे बैठे, बल्कि सियासी कुर्सियों पे बैठे मस्ती ले रहे हैं, और ज्यादा तर अपने अपने सरदार के नाम पर वोटों की  लूट के, एक महा डकैती पंचवर्षीय अभियान पे पुनः निकले हुए हैं।

8.  एक नहीं अनेक मरजीनाएँ खुद  भी अब अलीबाबा के साथ नहीं, किसी न किसी वोट लुटेरा गैंग में शामिल हो चुकी हैं, कुछ तो चुनाव भी लड़ रही हैं।  जनता बेचारी अलीबाबा के गधे की तरह और डाकुओं की  खच्चरों  की तरहां, जुमलों की घास खा कर,  कभी अलीबाबा की मेहनत  से काटी हुई   लकड़ी, यानी टैक्स ढोती है, तो कभी डाकुओं को ढोती है, या उन का लूटा हुआ खज़ाना, यानी नेताओं के भारी भरकम तनख्वाह, भत्ते और पेंशन,  तथा वोट का खर्चा ढोती है।

9.  अलीबाबाओं  , मरजीनाओं और डाकुओं के सरदार और 40 चोरों का कारोबार इस ही तरह बरसों से चलता चला आ रहा है। कभी इस गैंग का सरदार, तो कभी उस गैंग का सरदार  गांव का सरपरस्त बन बैठता है।  जंता नारे शारे लगा कर संतुष्ट हो जाती  है,  और चमचे अपना अपना उल्लू सीधा करने के चक्कर में अगले 5 साल बिता देते हैं। दशकों से जनतंत्र के नाम पर यही लूट तंत्र जारी है।
जय सिया राम तो बोलना पड़े गा भानजे।
🚩 सत्य ही अकाल है🚩
©🎙गुरु बलवंत गुरुने✒

🚩 भारत के पहले उच्चतम लोकपाल अध्यक्ष की नियुक्ति हुई🚩 @ 📚GBG⚔

1. उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति पिनाकी चन्द्र घोष  देश के पहले लोकपाल अध्यक्ष बने। न्यायमूर्ति घोष मई 2017 में उच्चतम न्यायलय के न्यायधीश बने, और उपरांत राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के सदस्य थे।  लोकपाल अध्यक्ष का वेतन और भत्ते भारत के प्रधान न्यायाधीश के बराबर होंगे। यह अपने आप में एक अतिमहत्वपूर्ण बात है, क्यों की सरकारी प्रोटोकोल में और ' किस का फ़ैसला किस पे भारी ' की तुलनात्मक विवेचना करते समय यह बात अहम रहे गी।

2.   लोकपाल की मदद के लिए, लोकपाल समिति का गठन किया गया है, जिस में  8 सदस्य नियुक्त किए गए हैं। इस समिती के सदस्यों के वेतन भत्ते उच्चतम न्यायलय के न्यायाधीश के बराबर हों गे। नियमों के अनुसार,  इनमें से चार न्यायिक सदस्य होने चाहिए और 4 अन्य सदस्य होने चाहिए। सदस्यों में से 50 प्रतिशत सदस्य अनुसूचित-जाति,  जनजाति, या किसी अन्य पिछड़े या अल्पसंख्यक वर्ग से होने चाहिए, और इन में कम से कम एक महिला भी होनी चाहिए। अध्यक्ष लोकपाल और सदस्य पांच साल के कार्यकाल तक,  या 70 साल की उम्र तक, अपने  पद पे बने रह सकते हैं।

3. न्यायिक सदस्यों के नाम हैं, न्यायमूर्ति दिलीप भोसले, न्यायमूर्ति प्रदीप मोहंती, न्यायमूर्ति अभिलाषा कुमारी तथा न्यायाधीश अजय त्रिपाठी । न्यायाधीश अजय त्रिपाठी  छतीसगढ़ के उच्च न्यायधीश हैं, जब की बाकी सभी विभिन्न उच्च न्यायलयों  से सेवानिर्वित मुख्य न्यायधीश हैं।  गैर न्यायिक सदस्य हैं,  i). सशस्त्र सीमा बल की पूर्व पहली महिला प्रमुख अर्चना रामसुंदरम,  ii). महाराष्ट्र के पूर्व मुख्य सचिव दिनेश जैन,  iii). पूर्व IRS अधिकारी महेंद्र सिंह,  और  iv). पूर्व IAS अधिकारी इंद्रजीत प्रसाद गौतम।

5.  सरकार ने जस्टिस पिनाकी को लोकपाल नियुक्त कर के उन्हें जस्टिस रंजन के समकक्ष कर दिया गया है। धरातल पे यह समिती कितनी सार्थक सिद्ध होती है, वक़्त ही दर्शाए गा।
📚 गुरु बलवंत गुरने⚔

🚩राजनीतिक कोयले की दलाली में, सब का मुंह काला है, गाय का हत्यारा तो खुद उस का अपना ग्वाला है🚩@✒GBG⚔


1.  आज कल लोग भड़कते बहुत जल्दी हैं। भगतों की भीड़ हर तरफ है। सब कोई अपने अपने नेता या दल के छोले भटूरे खाने खिलाने में व्यस्त है। मूर्खों की कोई कमी नहीं जो बिना कुछ जाने समझे, किसी भी मुद्दे में, भक्ति की कड़छी,  किसी भी दाल में डाल कर,  न जाने किस दानव या देवता को खुश करने में लगे हैं।

2. कुछ लोग तो डरपोक इतने हैं, की सच्च जानते हुए भी झूठ की आरती उतारते हैं, कुछ मूढ़ इतने हैं, की उन से बात करना मेंढे से सर टकराने जैसा है।  चलो जो है सो है, लेकिन इस का यह अर्थ तो कतई नहीं की हम जैसे लोग कुछ लिखना या कहना छोड़ दें।

3.  जिस दिन आम आदमी की क़लम रुक गयी, समझ लो उस दिन भारत फ़िर ग़ुलाम हो गया, तो इस लिए आप सभी से निवेदन है कि सज्जनों की रक्षा के लिए और दुर्जनों के विसर्जन के लिए चर्चा चिंतन जारी रहे।

4.  अभी कुछ दिन पहले इलेक्टोरल  बॉन्ड या निर्वाचन बांड पे बात हो रही थी, तो एक श्रीमान भड़क उठे, की क्या आप जानते हैं की यह सब इलेक्टोरल  बॉन्ड भारतीय स्टेट बैंक द्वारा सारी KYC जानकारी लेने के बाद ही जारी किये जाते हैं।  अब उन्हें कौन समझाए कि भैया पहले जान लो, की जानकारी है क्या,  बे-वजह काहे आधे पके तथ्यों का रायता फैला रहे हो।

5.  तो सब से पहले तो यह कहने में मुझे कोई संकोच नहीं की इलेक्टोरल  बॉन्ड असीमित धन राजनितिक दलों को बिना किसी भय के चन्दा देने का साधन है, यानी धन किस ने दिया, कहाँ से आया और किस दल को दिया, इस के बारे कोई बड़ी जानकारी दिए बगैर,  राजनितिक लाभ के लिए धनविसर्जन का माध्यम ।

6.  अब आप और हम जैसे के, सौ पचास को कौन पूछता है, दिए न दिए, एक  बराबर।  असली राज़ की बात यह है कि बड़ी बड़ी देसी विदेशी कम्पनियाँ, या उन के मुखौटों के पीछे छुपे विदेशी सेंध-मार, अब हज़ारों करोड़ों का राजनितिक दान, एक छुपे हुए निवेश के रूप में कर सकते हैं। वह कैसे, तो साहिब वह भी बताता हूँ, लेकिन पहले थोड़ा सा इस गोलमाल का इतिहास भी जान लें।

7. भारत में, चुनाव में राजनैतिक दल, बेतिहाशा खर्चा करते हैं, बहुत पैसा लगाते हैं। याद रहे, यह सब पैसा किसी कुबेर या इंद्र के खजाने से नहीं आता, बल्कि देश में करदाताओं का या करचोरों का, यानी देशी विदेशी बड़े व्यपार घरानों का काला धन ही होता है।

8.  मौजूदा व्यवस्था की चुनावी प्रक्रिया देश के अरबों रूपये को, जो विकास के लिए काम में लाये जा सकते थे, चन्द झूठे जुमलेबाज़ों को चुनने, और फिर 5 साल तक उन्हें मसनद पर बिठा कर उन के नखरे नाज़ उठाने  में, कुव्यय करवा रही है।  इस लिए व्यवस्था परिवर्तन, जिस की देश को ज्वलन्त आवश्यकता है, उस का एक बड़ा हिस्सा चुनावी प्रक्रिया का सादा, सरल व व्यय विहीन बनाये जाना भी है। 

9.  राजनितिक दलों के पास पैसे कहाँ से आते हैं, तो जान लीजिये कि हर दल चंदा, यानी डोनेशन लेता है, और यह डोनेशन आप या मुँझ जैसे साधारण लोग कहाँ देते हैं, और दें गे भी तो कितना ? यह चन्दा तो बड़े व्यपारी देते हैं, जिन के पास असीमित माया और धन कमाने के मायावी  साधन हैं।

10.  अब चन्दा लेने और देने वाले दोनों ही मौजूद हों तो इस लेन देन की कोई राह भी इन द्वारा निकाली गई हो गी,  सो उस ही राह का नवीनीकरण करने के उपरांत, उस का नया नाम  इलेक्टोरल  बॉन्ड रखा गया है।

11.  चन्दा वंदा तो चन्दा मामा ही जाने कब से शुरू हुआ, लेकिन राजनैतिक चन्दा लेने देने का व्यवस्थित पथ  एक बड़े 'गुरु घंटाल', यानी राजनीती के धनुन्धर नेता, अब स्वर्ग निवासी, श्री वाजपयी जी के समय शुरू हुआ।

12.  वाजपेयी साहिब की सरकार ने राजनितिक चन्दा देने वालों को शरेआम पुरस्कृत किये जाने का राह खोला, राजनैतिक चन्दा देने वालों को VIP, यानी खासमखास स्टेटस दे कर।

13.  एक तो चन्दा देने वाली कम्पनी अब अपने द्वारा दिए गये चंदे को अपने खर्चों में दिखा कर टैक्स रिबेट ले सकती थी, जब की चन्दा लेने वाला दल उस चंदे पे कोई टैक्स नहीं देता था।  यह भी प्रवधान कर दिया गया कि बदले में चन्दा- दाता कर विभाग के लेखे जोखे में VIP भी हो जाता था। यानी, दे ले के सभी का फायदा।

14.  फ़िर UPA का समय आया, तो माल समेटने में भला इन्हें कब गुरेज़ था, सो इन्होंने   कॉरपोरेट्स को राजनितिक चन्दा देने के प्रोसेस को सरल बनाने के लिए एलेक्टोरल ट्रस्ट बनाने का प्रवधान बना दिया।  अब बहुत सी  कम्पनियों ने इन ट्रस्टों द्वारा चन्दा दे कर सरकार को अपने हक़ में पॉलिसी बनाने के लिए प्रेरित करने का रस्ता खोज लिया।

15.  यानी की कम्पनियों द्वारा चन्दा देने के नाम पे सरकार बनाने वाली संभावित राजनीतीक पार्टी को रिश्वत देने का रास्ता,  या यूँ कहिये कि पैसे के ज़ोर पर किसी भी दल की सरकार बनाने का हाईवेह अब तैयार था।

16.  धनवान कारपोरेट अब पैसा फेंक तमाशा देख की स्थिति में आ गये। बड़े बड़े नेता, व्यपारियों के जहाज़ों में बेधड़क राजनैतिक कम्पेनों पर उड़ते हुए नज़र आने लगे, यानी अब सरकार ये राजनितिक दल बनाये या वो राजनितिक दल, नेता बड़े व्यापारिक घरानों के, या अती अमीर राजनितिक परिवारों के दल्ले बनने तक ही सीमित रह गये, और जन्ता, बस  चुनाव से पहले नेताओं के जुमलोँ के रसगुल्ले, और चुनाव के बाद भृष्ट और झूठे नेताओं के जूते खाने के क़ाबिल ही रह गयी।

17.   यह सत्य किसी एक व्यक्ति या दल नहीं, सभी राजनितिक दलों पे लागू है।  मैं तो यहां तक कहूँ गा कि राजनितिक दल का गठन, अब कुछ लोग केवल जन सेवा या सत्ता प्राप्ती के लिये नहीं बल्कि, चन्दा प्राप्ती द्वारा धन प्राप्ती हेतु भी करने लगे हैं।

18.  फिर नमो साहिब की मौजूदा सरकार भला इस काम को आगे क्यों न बढ़ाती।  यानी सरकार कोई भी हो, किसी भी दल की हो, उस का नारा कोई भी हो, चाहे विकास, चाहे भृष्टाचार मुक्त भारत, चाहे गरीबी हटाओ, चाहे किसी भी धर्म से प्रेरित राष्ट्र निर्माण, कारपोरेट धन से चुनाव जीती सरकार, कारपोरेट दैत्यों की सेवा  करने में कैसे पिछड़ सकती है ?  जिन पंखों पे बुलबुल उड़ रही हो, उन्हें ही कैसे काट सकती है ? सो साहिब बाग़ की मैजूदा बुलबुल  ले आई कारपोरेट बांडस का सिलसिला।

19. सन् 2017 में एक कानूनी प्रावधान लाया गया , जिस के चलते अब कोई भी, धना सेठ, गन्ना सेठ, सोना सेठ, जादू टोना सेठ,  बाबा लोग,  कोयला सेठ,  पेट्रोल डीज़ल सेठ, मदिरालय से ले कर शौचालय  सेठ, यानी कोई भी अडानी, अम्बानी, या फिर राजा जानी, जितना चाहे उतना धन, इन बांडस के जरिये किसी भी दल को दे सकता है,  और फ़िर उस राजनीतिक दल में अपने दल्लालों को फिट भी कर सकता है।

20.  इस तरहं भारत में देश की आज़ादी के बाद, एक बार फ़िर कंपनी राज की स्थापना हो चुकी है। कोई भी कम्पनी अब एक हज़ार ₹ से ले कर 1 करोड़ ₹ तक के असीमित निर्वाचन बांड, 'असीमित' शब्द पे ध्यान दें, खरीद कर, उसे चन्दा स्वरूप राजनैतिक दल को दे सकती है।

21.   2017  के वित्तीय बिल संशोधन से पहले,  कोई भी कम्पनी, अपनी बीते तीन सालों की शुद्ध कमाई, या शुद्ध मुनाफ़े की धनराशि का 7.5% हिस्सा, किसी राजनितिक दल को दे सकती थी, लेकिन कम्पनी को अपनी लाभ-हानी की वित्तीय रिपोर्ट में इस राशी को दिखाना अनिवार्य था और यह भी बताना आवश्यक था कि किस पार्टी को पैसा दिया गया है।

22.   2017 के वित्तीय बिल संशोधन के बाद यह प्रावधान हटा दिए गये।

23. अब न तो धन देने की कोई सीमा है, न ही जिसे धन दिया गया, उस पार्टी का कोई विवरण देने की आवश्यकता। अब खुल के खाओ, खुल के खिलाओ का फण्डा जारी हैं, जब तक आप फण्ड राजनैतिक दल को दे रहे हैं।

24.   जिन लोगों को यह गलत फ़हमी है कि चन्दा दाता को KYC के तहत अपनी या चन्दा लेने वाले की जानकारी देनी हो गी, वह जरा संशोधित कानून और उस की उचित व्याख्या, एक बार पुन्ह पढ़ लें।
🚩तत्त सत्त अकाल🚩
✒गुरु बलवन्त गुरुने⚔

🚩क्यों आवश्यक है व्यवस्था परिवर्तन @✒GBG⚔

1.  क्या  भारतीय व्यवस्था जन्ता को धोखा देती है... यदी इस का जबाब आप 'हां' में देते हैं  तो जान लीजिये की इसके ज़िम्मेवार आप खुद हैं, क्यों की आप व्यवस्था को झनझोड़ते नहीं, बल्कि भेड़ों बकरियों की तरहं इस का हिस्सा बनना एक आसान काम समझते हैं, और यदी आप का जबाब है 'नां', तो निश्चित तौर पे, या तो आप भृष्ट हैं, और या आप भृष्ट व्यवस्था के आदी , यानी हेबिचुअल हो चुके हैं।

 
2 .  हमारे यहाँ सिस्टम  डेमोक्रेसी के नाम से जाना जाता है, और व्यवस्था चुनाव द्वारा या फ़िर शिक्षा और प्रतिस्पर्धा  के मापदण्ड द्वारा चुने हुए अधिकारी नियंत्रित करते हैं।

3.   त्रासदी यह है की प्रतिस्पर्धा द्वारा चुने गये सिविलियन और फ़ौजी अधिकारीयों पर, वोटों द्वारा चुने हुए लोग, हुक्मरान बन कर बैठ जाते हैं,  जिन्हें सिस्टम में नेता के नाम से जाना जाता है।

4.  चुनाव की प्रक्रिया एक दम भृष्ट है, जो सीधे सीधे जन्ता का  शोषन करती है।  इस प्रक्रिया में एक दार्शनिक और अधपागल का बराबर मूल्यांकन  किया जाता है, यानी के उन की वोट का वैल्यू बराबर है।

5.   दूसरा, समाज जाती, वर्ग, धर्म इत्यादि में नाम पर बंटा  हुआ है। और,  जब केवल ज्यादा वोट बटोरना ही ज्यादा सामर्थ्य की निशानी मानी जाये,  तो राजनीतिक वर्ग द्वारा समाज को विभाजित किया जाता है, बाँटो और राज करो की निति अपनायी जाती है, वोट खरीदे जाते हैं, या लूटे जाते हैं, और चुनाव में उतरे उम्मीदवारों द्वारा भ्र्ष्टाचार का नंगा नाच नाचा जाता है। इस बिगड़ी हुई व्यवस्था में चुनाव में उमीदवार बनने के मापदण्ड,  चुनाव में भृष्टाचार की सम्भावनाओं को और ज्यादा बढ़ा देता हैं।

6.  आइये  देखें की जहां डॉक्टर, IAS, IPS या सैन्य अधिकारी बनने के लिए, न सिर्फ एक जबरदस्त प्रतिस्पर्धा के दौर से गुज़रना पड़ता है, बल्कि कई किस्म के मापदण्डों पे खरा उतरना पड़ता है, वहीँ विधायक या सांसद, और फ़िर मंत्री बनने के माप दण्ड क्या हैं।

7. चलिये पहले तो आप, यानी वोटर और आप के भृष्ट नेता में फ़र्क जान लें।  कोई भी चुनाव का उम्मीद वार नेता यदी चाहे तो दो जगह से एक साथ चुनाव लड़ सकता है , लेकिन आप दो जगहों पर वोट नहीं डाल सकते।  अब तक मैं आप को इतना तो बता ही चूका हूँ, कि हमारे यहाँ सिस्टम डेमोक्रेसी के नाम से जाना जाता है, और व्यवस्था चुनाव द्वारा या फ़िर शिक्षा और प्रतिस्पर्धा  के मापदण्ड द्वारा चुने हुए अधिकारी नियंत्रित करते हैं।  त्रासदी यह है की प्रतिस्पर्धा द्वारा चुने गये सिविलियन और फ़ौजी अधिकारीयों पर हुक्मरान बन कर बैठ जाते हैं, वोटों द्वारा चुने हुए भृष्ट बुद्धि या तुच्छ बुद्धि लोग, जिन्हें सिस्टम में नेता के नाम से जाना जाता है।

8.  इन भृष्ट नेताओं की बदकिरदार सरदारी के चलते, प्रितिस्पर्धा द्वारा चुने गये अधिकारी, यानी ओफ्फिसर और करिंदे भी भृष्ट हो जाते हैं।  यह भी हम देख चुके हैं कि चुनाव की परिक्रिया एक दम भृष्ट है, जो सीधे सीधे जन्ता का  शोषण करती है।  इस प्रतिक्रिया में एक दार्शनिक और अधपागल का बराबर मूल्यांकन  किया जाता है, यानी के गधे या घोड़े, चोर या सिपाही, राष्ट्रवादी या अराष्ट्रवादी, देशभक्त या गद्दार की वोट का वैल्यू बराबर है। यह भी मैं आप के लिए हाईलाईट कर चुका हूँ कि समाज जाती, वर्ग, धर्म इत्यादि में नाम पर बंटा  हुआ है, और जब केवल ज्यादा वोट बटोरना ही ज्यादा सामर्थ्य की निशानी मानी जाये ,  तो समाज को विभाजित किया जाता है, बाँटो और राज करो की निति अपनायी जाती है, वोट खरीदे जाते हैं, या लूटे जाते हैं, और चुनाव में उतरे उम्मीदवारों द्वारा भ्र्ष्टाचार का नंगा नाच नाचा जाता है।

9.  इस बिगड़ी हुई व्यवस्था में चुनाव में उमीदवार बनने के मापदण्ड,  चुनाव में भृष्टाचार की सम्भावनाओं को और ज्यादा बढ़ा देता हैं। चलिये आब बात करते हैं किसी सेलेक्शन प्रोसेस द्वारा चुने हुए अधिकारी और नेता में फ़र्क। जहां डॉक्टर, IAS, IPS या सैन्य अधिकारी बनने के लिए, न केवल एक जबरदस्त प्रतिस्पर्धा के दौर से गुज़रना पड़ता है, बल्कि और भी कई किस्म के मापदण्डों पे खरा उतरना पड़ता है, वहीँ विधायक या सांसद, और फ़िर मंत्री बनने के माप दण्ड क्या हैं, कुछ भी नहीं, बस केवल इतना, कि आप कितने भृष्ट, झूठे, फ़रेबी, जुमलेबाज़, नौटंकी, ठग, गमनकर्ता, जराइम्पेशा, चालबाज़, कमीने, धोखेबाज़ या गद्दार  हैं।

10.   किसी  दफ्तर में  लिपिक की सरकारी नौकरी पाने के लिये आपको ग्रैजुएट होना जरूरी है, सेना में एक सैनिक की नौकरी पाने के लिये  प्लस 2 या ग्रेजुएट डिग्री के साथ आप को शारीरिक बल के भी कई मानक पार करने होते हैं, जैसे कि, 10 किलोमीटेर की दौड़, एक खास ऊंचाई तक रस्सा चढ़ना, लॉन्ग जम्प, हाई जम्प, इत्यादि इत्यादि।  सैन्य अधिकारी बनने के लिए पहले सम्पूर्ण भारत स्तरीय लिखित परीक्षा में मेरिट प्राप्त करनी होती है,  उपरांत उस के 7 दिन का लम्बा शारीरिक व मानसिक  परीक्षण पार करना होता है, लेकिन  नेता अंगूठा छाप भी हो तो चले गा, यानी चुनाव की भृष्ट प्रिक्रिया में से गुज़रने के बाद, दलबदल, ख़रीदो फरोख्त, चमचागिरी या  राजनितिक ब्लैकमेंलिंग का इस्तेमाल कर के, कोई भी भारत का डिफेन्स मिनिस्टर, फायनेन्स मिनिस्टर,  शिक्षा मंत्री, इत्यादि  बन सकता है ।

11.  आप को यह जान कर हैरानी हो गी की आज एक सरकारी कर्मचारी  '35' वर्ष की संतोष जनक सेवा करने के उपरांत भी पेशन का हकदार नहीं  होता,  जब कि राजनेताओं ने, जन्ता के पैसे पर जन्ता की सेवा के नाम पर जन्ता का ही दोहन करने के उपरांत, अपने लिए  मात्र '5' वर्ष  विधायक  या सांसद   की कुर्सी पर काबिज़ होने  के बाद, अपने लिए आजीवन पेंशन का बन्दोबस्त कर लिया है।  राजस्थान की भाजपाई मुख्यमंत्री रानी वसुंधरा  राजे ने तो राज्य के कानून में संशोधन कर के, अपने लिए और सभी मुख्य तथा उप-मुख्यमंत्रियों के लिए,  आजीवन, पेंशन, 5 लिपिक, 2 सहायक, एक RAS अफ़सर, गाड़ी, ड्राइवर, बंगला, मुफ़्त बिजली, पानी, टेलीफोन, कंप्यूटर, इंटेटनेट, और हवाई यात्रा का भी मुफ़्त प्रबन्ध कर लिया है। यह  कहाँ का न्याय है⁉

12.    क्या आप इस व्यवस्था से खुश हैं, या आप को लगता है की व्यवस्था में परिवर्तन आवश्यक है, यानी नेता और जनता, दोनो के लिये एक ही कानून होना चाहिये ⁉ यदि आप देशभक्त नागरिक हैं, किसी व्यक्ति या पार्टी के अंधभक्त नहीं हैं,  तो इस संदेश को फार्वड करें, और  मातृभूमि में जागृति लाने के इस अभियान को आगे बढ़ायें।
🚩तत्त सत्त श्री अकाल🚩
©✒गुरु बलवन्त गुरुने⚔🇮🇳🙏

🚩अब शुरू होने वाली है लोकतंत्र की सब से बड़ी जंग🔥🚩हल्ला बोल, हल्ला बोल🚩✒GBG⚔

1.  हर शहर में छोटे छोटे राजनितिक प्रोपेगण्डा के गेंदबाज और बल्ले बाज़, यानी छोटे छोटे गेबल्ज़ की 'कोर टीमें' बनाई जा चुकी हैं, जिन का काम है, मौजूदा सरकार और मौजूदा नेता के हक़्क़ में दबा कर झूठ बोलना, और किसी भी प्रकार की विपरीत ध्वनि को दबाना।

2.   विपक्ष भी अब कमर कसने में लगा है। यानि मीडिया और सोशल मीडिया पे आरोपों प्रतिरोपों का संघर्ष सा छिड़ने वाला है।

3.  आप कुछ भी कहिये या शेयर कीजिये, आप को रोका जाये गा,  दबाया जाये गा, धमकाया भी जाये गा।

4.  तो मित्रो याद रहे, यदी आप देश से प्रेम करते हैं, तो पार्टी कोई भी हो, आप का मत्त कोई भी हो, जो सही न लगे, उस के खिलाफ आवाज़ अवश्य उठाइये, लेखनी अवश्य  चलाइये। यही आप के होने की निशानी है।

5.   ताक़तवर को सलाम करने की, चढ़ते सूरज को सलाम करने की अपनी ग़ुलाम मानसिकता को त्याग दी जीये। अब समय आ गया है, पगड़ी सम्भालने का, अतः आप अपनी अभिव्यक्ति की आज़ादी का सम्मान कीजिए।

6.  नेता आते जाते रहें गे, आप को वादों से लुभाते, और जुमलोँ के जंगलों में घुमाते फिराते, और यहां तक की धमकाते भी रहें गे।

7.  नेता किसी भी दल का हो, वादे करे गा, ऐसे वादे जो निभाये नहीं जाएँ गे।  जुमलोँ के तीर भी छोड़े जाएँ गे, कई किस्म के छोटे मोटे लालच और भय इत्यादि भी दिखलाये जाएँ गे। कोई चिंता न करें। अपनी अभिव्यक्ति को मरने मत दी जिए, ज़िंदा रखिये।

8.  अभिव्यक्ति की आज़ादी ही असली आज़ादी है। कानून की बंदिशे तो मुग़लों के समय भी थी, अंग्रेजों के समय भी और आज़ादी के बाद भी हैं, मौजूदा सरकार से पहले भी थी, और इस सरकार के उपरांत भी रहे गी,  लेकिन अभिव्यक्ति की आज़ादी सर्वोपरि है, कुछ कहिये, कुछ लिखिए, और सच्च का साथ दीजिये।

9.   अनिवार्य नहीं की सब का सच्च एक हो।  आप का और मेरा सच्च भिन्न हो सकते हैं। हमारी राजनितिक सोच अलग हो सकती है, लेकिन शोध चिंतन और चर्चा के बाद, जो भी आप को ठीक लगे, उस का साथ दीजिये।

10.  यदी आप किसी लोभ-वश या भय-वश किसी का साथ देते हैं,  तो समझ लीजिये कि मूलतः आप, असत्य के साथ खड़े हैं, और यदी आप केवल अपनी अंतहकरन की आवाज़ के साथ हैं, तो आप सत्य के योद्धा हैं।

11.   युद्ध मज़ेदार होने वाला है, मंगलमय चित के साथ इस युद्ध में उतरिये। सभी को शुभआशीष। सर्व का मंगल हो।
🚩तत्त सत्त अकाल🚩
©✒गुरु बलवन्त गुरुने⚔

🚩आज भारतीयता का सरंक्षण आवश्यक क्यों⁉ @ ✒GBG⚔🚩

1.    भारतीयता क्या है, इसे समझने के लिये, राज्यसभा टी वी का प्रोग्राम, 'मैं भी भारत' अवश्य देखें। एंकर और प्रोड्यूसर, श्री श्याम सुंदर ने भारत के दूरस्थ कबीलों और ट्राईबल्ज़ पे बेहतरीन काम किया है, ।  देश को अगर जवाहर लाल और कोंग्रेस का कोई महानतम योगदान है, तो वह है विविधताओं को जीवित रखना,  इनटेन्जिबल और टेन्जिबल कल्चरल विविधताओं को जीवित रखना।

2.   कुछ लोग भारत को भारत की विभिन्न इकाइयों पे थोम्पा हुआ एक विचार मात्र बताते हैं। कौन कहता है कि विचार का थोम्पना ठीक है ?  लेकिन क्या आप में से किसी को भी लगता है,  की भारतीयता को कोई किसी पे थोम्प रहा है, या थोम्प सकता है ? याद रखिये दोस्तो,  किसी  भी विचार को किसी भी पे न थोम्पना ही दरअसल भारतीयता है।

3.  भाजपा के बीफ पॉलिटिक्स या  गौरक्षक  गुर्गों को, दिल्ली या गुजरात के दंगाइयों को,  पंजाब और कश्मीर के अलगाववादियों को,  या किसी भी राजनितिक दल के बदमाशों को, समस्त भारत की सोच  नहीं कहा जा सकता। यह सब तो केवल राजनितिक सिंधु में उथल पुथल करते राजनितिक मगरमछों की, भोली जन्ता को फांसने और खाने की चालें मात्र हैं।

4.  राजनेता कोई भी हो, विंध्वन्स का स्रोत हुआ करता है। सत्ता प्राप्त करना ही उस का मकसद होता है, जरिया कोई भी बने। राजनेता का कोई धर्म, दीन इमां नहीं होता, और वह किसी राम अल्लाह या वाहेगुरु का भक्त नही, बल्कि सत्ता का पुजारी होता है।  मन्दिर मस्जिद और रथ यात्रा की राजनीती भाजपा को अडवाणी की देन  है,  बीफ और गाय की राजनीती बाजपायी  की देन है,  पंजाब की गन्दी राजनीती, कोंग्रेस और अकालियों की आपसी रस्साकशी की देन है,  'मुसलमान खतरे में है',  की राजनीती, कुछ मुस्लिम नेताओं की देन है, जो आप को हर दल में दिख जाएँ गे। यह सब नहीँ झुठलाया जा सकता।  यह बहुत गहरे मसले हैं।

5.  लेकिन यह भी सच्च है, कि जितना गलत राहुल का मज़ाक उड़ा कर मोदी को हीरो बनाना है, उतना ही गलत मोदी को गलत कह के  राहुल को या  किसी और को चमकाना भी है। हम किसी भी व्यक्ति विशेष को भारतीयता के साथ नहीं जोड़ सकते। भारतीयता किसी भी व्यक्ति या राजनितिक दल द्वारा प्रमाणित किये जाने की मोहताज नहीं। भारतीयता हमारे इतिहास, शहीदों और संविधान द्वारा प्रमाणित है।

6.  आज  देश के भले के लिए आवश्यक है, की देश की बात हो, भारतीयता की बात ही, लेकिन देशभक्ति सिद्ध करने के लिए नहीं,  न ही किसी मौकापरस्त राजनितिक साधना के लिए, बल्कि देश को अनेकता में एक बनाये रखने के लिए।

7.    मैं मानता हूँ, भारत में बहुत विभिन्तायें हैं, लेकिन विभिन्तायें तो सारे विश्व भर में हैं। प्रमाणिक तौर पे सिक्ख, जैन या बौद्ध हिन्दू नहीं हैं,  हिन्दू मुसलमान नहीं, मुसलमान  हिन्दू नहीं हैं लेकिन हिन्दोस्तानी अवश्य है,  बीफ़ खाने वाले बहुत से हिन्दू भी हैं, न खाने वाले बहुते मुसलमान भी हैं,  बहादुर सिर्फ राजपूत या मरहठे, सिक्ख या जाट ही नहीं, महार और दलित भी हैं,   चालाक और मक्कार लोग  भी हर जगह हैं, लेकिन एक कॉन्सेप्ट है,  इंडिया, भारत, या कुछ भी कह लो, वह है तो इस सारे इलाके के  स्वाभिमान की गुंजाईश ज्यादा  है।

8.  मैं तमिल आंदोलन, खालिस्तान और आज़ाद कश्मीर आंदोलन, सब पे अध्य्यन कर चुका हूँ, फर्स्ट हैण्ड तज़ुर्बे भी है, लेकिन मेरा दृढ़ विश्वास है, इन में से कोई भी इकाई  अकेले दुकेले चीन या बाकी अंतर्राष्ट्रीय ताक़तों द्वारा ग्रस ली जाये गी।

9.   अतः,  बाकी सब ज़रूरी हो या न हो, आप किसी भी राजनीतिक सोच या दल से प्रेरित हों,  आज हमारी सभी की सब से बड़ी प्रेरणा आवश्यकता है, भारतीयता के प्रति निष्ठां, स्नेह और समर्पण। याद रहे मित्रो  की सम्पूर्ण जगत बहुत विकट परिस्थितयों से गुजरने वाला है, और हम भारतीयों की भलाई,  विभिनिताओं के बावजूद  भारत की रीढ़ की ताकत,   यानी भारतीयता को जीवित रखने में है।
🔱तत्त सत्त अकाल🚩
.©✒प्रेरक गुरु बलवन्त गुरुने⚔

🚩भारत को असली खतरा, चीन से , पाकिस्तान से, या अपने नेताओं से⁉?@✒GBG⚔

1.  चीन और पाकिस्तान से भी बड़ीसमस्या यदी कोई भारत के सामने है, तो वह है  भारत के भृष्टाचारी, मौका परस्त नेता,  जो जुमलों की राजनीती करते हैं, भारतीय धन का और व्यवस्था का पूर्ण दोहन करते हैं, और लोगों को, उन  की विविधताओं को ज़रिया बना कर उकसाते हैं, आपस में लड़वाते हैं और सता प्राप्त करते हैं, देश के भले के लिए नहीं, बल्कि अपनी सुखसुविधाओं को जीवन भर के लिए आरक्षित करने के लिए।

2.   जो थोडा  सा जातीय, धार्मिक या  रिजनल डिफ़रेंस होता है, या किसी छोटी सी  कश्मकश को  एक बड़ी स्थानीय लड़ाई में, यहां तक की दंगो और खून खराबे में बदल  दिया जाता  है, उस का असली कारण देश की नेचुरल रिलीजियस, कल्चरल, और भाषीय विविधता का कोई नेचुरल कोन्फ्लिक्ट नहीं,  बल्कि हमारे कमीने, वोटे-लोलुप नेता हैं, जो हमारी भृष्ट व्यवस्था की हराम की वह औलादे हैं, जो निजी स्वार्थ के लिए, समाजिक विवधिताओं को, समाज में  द्वेष पैदा करने का माध्यम बना लेते हैं।

3.   यह कमीने  नेता वोट बैंक की राजनीती करने के चक्कर में, कभी बीफ, कभी भगवा, कभी हरे तो कभी केसरी के नाम पे राजनीती उकसा कर, कभी हिन्दू, सिख तो कभी मुस्लिम को  मन्दिर मस्जिद गुरुद्वारा के नाम पे उकसा कर,  देश का दोहन कर रहे हैं। आज कल लेटेस्ट ट्रेंडिंग कमीनागिरी  है,  उत्तराखण्ड में सिखों के वाहनों से उन के धार्मिक ध्वज को उतारने की क़वायद।

4.  इस में तो दो राय नहीं हो सकती कि ऐसा कोई भी काम, राजनितिक निर्देश के बिना नहीं हो सकता। कभी मन्दिर मस्जिद की राजनीती, कभी बीफ की राजनीती, कभी भगवा या सब्ज़ की राजनीती, करने वाले, क्लिपटोक्रेटिक  नेताओं को इतिहास कभी  माफ नहीँ करे गा, लेकिन इन हरामी राजनेताओं के चक्कर में अब भारत वासियों को  भी ज्यादा दिन नहीं आना है, देशवासियों को सब से ज्यादा सचेत इस आंतरिक खतरे की और होने की आवश्यकता है।

5.    पहली स्वतंत्रता की लड़ाई जो देश ने लड़ी, वह अँगरेज़ के खिलाफ, अँगरेज़ से आज़ादी पाने के लिए लड़ी  थी,  लेकिन  अब जो बड़ी लड़ाई देश को लड़नी है, वह है देश की भृष्ट व्यवस्था से आज़ादी पाने की लड़ाई, इस व्यवस्था से जन्मे और इस पे काबिज़ भृष्ट राजनेताओं से आज़ादी पाने की लड़ाई।

6.   यह सभी भृष्ट नेता, इन का दल कोई भी हो, या निशान कोई भी हो, यह झूठ और फ़रेब के व्यपारी,  किसी आतंकवादी से कम नहीँ हैं।   यह तो उस से भी ख़तरनाक हैं, क्यों की ये,  आप को,  आप के अपने बन कर,  यहां तक की आप के नायक बन क लूटते हैं।

7.  इस भृष्ट व्यवस्था से आज़ादी की लड़ाई लड़ना भी अत्यंत आवश्यक है, लेकिन फ़िलहाल इस की सम्भावना केवल एक ही शब्द में है।  इस कोढ़ को काटने का मात्र एक ही उपाय है।  और वह उपाय  है जन जगृति के लिए विराट जनसम्पर्क, जिस का बेहतरीन माध्यम है, सोशल मीडिया। 

हमें देश भर में 'अनेकता में एकता' का अलख जगाना हो गा, और आपस की फूट का फायदा उठाने वाले राजनेताओं को खत्म करना हो गा।
🔱सत्य ही भगवान है🚩
🚩 संघर्ष ही  इबादत है 🔱
✒गुरु बलवन्त गुरुने⚔

🚩भारत और भरतीयता के पतन के मूल कारण।🚩©@✒Guru Balwant Gurunay⚔

1.    हम सभी भारतीय, पंजाबी, बंगाली, सिक्ख, राजपूत, जाट या फ़िर कुछ भी और होने पे बेवजह गर्व करते हैं, लेकिन भारतीय होने पर गर्व नहीं करते।

2.  हमारे नेता भी वोटों की राजनीती के कुपाष में जकड़े, अलगाववाद की भावना को तो बढ़ चढ कर हवा देते हैं, लेकिन एकता की भावना को कोई बिरला ही बढ़ावा देता है। जब किसी समाज के नेता ही, भ्र्ष्टाचार, झूठ, फ़रेब, और बांटो और राज करो की नीतियों को अपना सब कुछ समर्पित कर चुके हों,  तो देश और समाज का भृष्ट होना,  बंटना और आखिर  बिखर जाना स्वभाविक ही है।

3.  आखिर हम भारतीय इस दयनीय स्थिति तक पहुँचे कैसे ?!!!!    यह गहन चिंता और अथक चर्चा का विषय है। यह चिंतन जन जन, और हर मन में जागृत करने की आवश्यकता है। यह चर्चा, गली नुक्कड़ की चर्चा से ले कर राष्ट्रीय चर्चा बननी चाहिए, तभी माँ भारती का उद्धार सम्भव है, वरना इक़बाल का यह शेर सच्च हो निकले गा, कि
"न समझो गे तो मिट जाओ गे ऐ हिन्दोस्तां वालो,
तुम्हारी दास्ताँ तक भी न हो गी दास्तानों में "।

4.  आइये मित्रो, इस से पहले की यह हालात हमारा दुखांत बन जाये, इस बदहाली के कारणों पे एक नज़र डालें।

5.  देखिये, आप और मैं, इस तथ्य से मुंह नहीँ मोड़ सकते की हम सब मूलतः एक खुदगर्ज़ समाज की खुदगर्ज़ इकाइयां हैं। अपने से आगे देखने की प्रिविर्ति हम सभी में न के बराबर है। अपने घर का कूड़ा पड़ोसी के घर के आगे डालना, अपने मन की गन्दगी के कारणो को, दूसरों में ढूंढना हमारा स्वभाव सा बन गया है। भाई भाई को लूटने का सबब बना हुआ है। मित्रता मात्र किसी से धोखा करने का हथियार बन चुकि है। हर इकरार केवल तोड़ने के लिये किया जा रहा है, वादे बस जुमले बन कर रह गये हैं, और देश भक्ति बस इक मज़ाक।

6.  खुद को ख़ुदाई का मरकज़ समझने वाले हम भारतीय अपने आप में इस कदर खो चुके है, की हम देश या समाज के बारे सोचना, देश और समाज की चिंता करना, अब केवल एक मूर्खता समझने लगे है।  यानी भारतीय सन्दर्भ में जो खुदगर्ज़ है, वह समझदार है, और जो आज भी देश या समाज को अपनी होंद का केंद्र बिंदु या मरकज़ समझता है, वह मूर्ख है,  पागल है,  या दीवाना है।

7.  ज्यादा से ज्यादा हम खुद को किसी पार्टी, गुट, ग्रुप, धर्म या इलाके से जोड़ कर देखने के क़ाबिल ही हो पाये हैं। कहना पड़े गा की हम भारतियों में भ्र्ष्टाचार और अलगाववाद, सोच के लेवल पे स्थापित हो चुका है,  वह भी अत्यंत  प्रबलता से।  तो ऐसे में आप ही कहिये कि कोई भी खुदगर्ज़ और खण्डित समाज, भला एकजुट हो कर तरक्की कैसे कर सकता है ?

8.  हमारी खुदगर्ज़ी  के चलते आज देश में करप्शन  या भृष्टाचार, घूसख़ोरी या रिश्वतखोरी, हमारी संस्कृति का हिस्सा बन चुके है। भ्र्ष्टाचार आज,  देश और समाज के हर स्तर और पहलू में व्यापक रूप से प्रस्तुत है.  हम भारतियों ने भृष्टाचारी व्यक्तियों को सुधारने की जगह उन्हें मान्यता देना स्वीकार कर लिया है।

9.  हम किसी भी थोड़े से धनवान व्यक्ति की इज़्ज़त करते हैं, उसे सम्मान की नज़र से देखते हैं। कोई भी बईमान,  छोटा हो या बड़ा, चोर हो या डाकू, किसी छोटे मोटे ज़मीन माफ़िया का सरग़ना हो, या फ़िर कोइ राज्य स्तरीय तस्कर,  आज समाज में वह उच्च आसन ग्रहण कर रहा है। कवियों लेखकोँ और बुद्धिजीवियों को सम्मानित करने के लिये जब चोर उचक्कों को स्टेज पे चढ़ाया जाये, जब यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर या   बुद्धिजीवी  किसी सड़क छाप गुंडे से नेता बने क्रिमिनल पॉलिटिशियन के गले में हार डालते दिखें, तो इस के चलते युवा पीढ़ी का, जल्दी धनवान और असरदार या बाहूबली बनने के कुचक्र में फंस कर, जुर्म की दुनिया की ओर आकर्षित होना स्वभाविक ही है।

10.  हैरत की बात है, कि आज परीक्षाओं में नकल करवाना, पेपर लीक करवाना, नकली डिग्रियाँ बेचना,  एक सुस्थापित माफिया बन के उभर रहा है। नकली सर्टिफिकेटस का बाजार गर्म है।  नकली डिग्रियाँ बना कर लोग, डॉक्टर, इंजीनियर, और यहां तक की न्यायाधीश  तक बन बैठे हैं। यानी, आप की दवा दारु करने वाले डॉक्टरों से ले कर आप को न्याय देने वाले जज और वकील, तथा आप का प्रशाधन चलाने वाले अफ़सर और राजनेताओं तक,  कितने ही, नकल द्वारा परीक्षा पास कर के, या नकली डिग्री के सहारे, खुद  को स्थापित किये बैठे हैं। कितनी ही नौकरियां केवल घूसख़ोरी के चलते, ऐसे बिक रही हैं, जैसे की मण्डी में आलू प्याज़। कीमत चुकाओ, और ले जाओ, मानक चाहे फ़र्ज़ी हों, जब तक अर्जी के साथ फ़र्ज़ी डिग्री, लेकिन साथ में लाल नोट संलगित हैं, तो बन जाओ अधिकारी।

11.   याद रहे, कोई भी व्यक्ति या कौम, समाज या देश, जन्मजात भृष्ट नहीं होते, लेकिन कोई  भी व्यक्ति या कौम, और फ़िर समाज या देश,  अपने कल्चर द्वारा बुरी तरहं भृष्ट हो सकते है ?  इस लिए, यह जानने के लिए कि भारत में भ्र्ष्टाचार इतना व्यापक क्यों है, हमें अपने  देश के निवासियों की कार्यशैली, जीवनशैली और स्थापित तौर तरीकों पे नज़र डालनी हो गी।  हमें अपने धर्म, धार्मिक संस्कारों, समाजिक और निजी संस्कारों का पुन्हांकलन करना हो गा।

12.  निजी तौर पे तो चलो हम सभी अव्व्ल दर्जे के खुदगर्ज़ हैं, लकिन समाज की इस गिरावट के लिए हमारे धर्म , और हमारी धार्मिक मान्यताएं भी उतनी ही ज़िम्मेवार हैं।  मैं तो यहां तक कहूँ गा की समाज में रिश्वत ख़ोरी का चलन भी हमारे धार्मिक परपंचो से ही शुरू हुआ है। भगवान को भी भारतीय लोग चढ़ावा चढ़ा कर, यानी उसे रिश्वत दे कर, अपने लीये वांछित फल पाने का, और अपनी कुपात्रता पर पर्दा डालने का एक जरिया मात्र ही मानते हैं।

13.  आज हम भारतीयों ने अपने गुरुओं, वेदों, उपनिषदों और पुराणों की बाणी को, ज्ञानस्रोत न मान कर, यानी अपने धर्मग्रन्थो को पढ़ने, समझने और उन की बाणी द्वारा प्रसारित शिक्षा का अनुसरण करने की राह को त्याग कर,  उन्हें पूजा अर्चना के मार्के मात्र बना दिया है। धर्मग्रन्थों को सर्दी में रजाई ओढांना, गर्मी में  AC  लगाना, मूर्तियों और ग्रन्थों को भोजन, वस्त्र, आभूषण, धन आदि भेंट करना, उन के साहमने भीखारियों  की तरहं गिड़गिड़ाना, मूर्तियों और ग्रन्थों के साहमने, भजन, कीर्तन, अरदास पूजा आदी करना,  साफ़ दर्शाता है, की हम भारतीय, धर्म ग्रन्थो की बाणी या मूर्तियों द्वारा प्रकाशित व प्रसारित सत्यों या तथ्यों पे  कोई ध्यान नहीं देते, बल्कि इन सब को भी हम ने चढ़ावे की रिश्वत दे कर, या पूजा प्रशंसा की चापलूसी कर के, कुछ आउट ऑफ़ टर्न पाने का, कोई सुख साधन के द्रव्य पाने का साधन मात्र ही बना छोड़ा है।  यानी हमारी भृष्टाचारी व्यवसथा की जड़े हमारी धार्मिक आस्थाओं और प्रपंचो तक गहरी जुडी हुई हैं।

14.  मन्दिर के अंदर भगवान को चढ़ावे का कल्चर, मन्दिर के परकोटे के बाहर रिश्वत की प्रथा बन कर सामने आता है। ग़रीब लोग भगवान को चन्द सिक्के या नोट चढ़ाते है, तो अमीर उसे सोने चाँदी और हीरे जड़ित आभूषण। कोई भी किसी ग़रीब को उपहार देने में नहीं, बल्कि भगवान को उपहार देने में विश्वास करता है। एवज़ में दी गयी चढ़ावे रुपी रिश्वत, या पूजा के रूप में की गयी चापलूसी से ज्यादा बड़े 'उपहार या कृपा'  पाने की उम्मीद में।

15.  गरीबों को या तो भगवान के नाम पर दान दिया जाता है, जो वक़्त-बा-वक्त उन्हें कुछ चिल्लड़ या त्योहारों पे भोजन आदी देने तक ही सिमित है। बस इतना सा दान पुन्य कर के,  बदले में कोई शुभ फ़ल पाने की,  और अपनी किस्मत चमक जाने की उम्मीद हम भारतीय बनाये रखते हैं। यहां तक की  हमारी नज़र में दान पुन्य भी, अपना बुरा समय टालने का साधन मात्र है। इस ही भावना के चलते मंगल वार को मीठा दान, शनिवार को काले मांश, सोमवार को दूध दान आदि की प्रथा है। भारतीय मानसिकता में समाज सेवा, और दान पुन्य  भी किसी न किसी स्वार्थ सिद्धि हेतू ही किया जाता है।

16.  किसी भी व्यक्ति की ग़रीबी, या उस का बुरा वक़्त, उस के पूर्वजन्मों का फ़ल समझ कर, इग्नोअर किया जाता है, और इस तरहं समाज के दुखी जीवों के दुःख से, सभी धार्मिक लोगों द्वारा अपना पल्ला झाड़ लिया जाता है। भृष्ट आदमी भगवान को भी बड़ी से बड़ी रिश्वत देता है, कई बार केवल अपने काले धन को किनारे लगाने मात्र के लिए। मूर्ख लोग ऐसे व्यक्तियो को महान धर्मभीरु समझते हैं, और उन की जूता परेड करने की जगह उन्हें इज़्ज़त देने लगते हैं। जून 2009 में छपी, मशहूर भारतीय अख़बार,' Hindu' की ख़बर के अनुसार, कर्नाटक के मिनिस्टर, जनार्धन रेड्डी ने तिरुपति में हीरों जड़ित एक मुकुट भेंट किया, जिस की कीमत 45 करोड़ रूपये आंकी गयी।

17.   धर्मस्थलों में इतना धन और दौलत जुटता है, कि वहाँ की व्यवस्था को पता ही नहीँ चलता कि उस का सदुपयोग कैसे किया जाये। या तो यह धन मन्दिर के तहखानों में पड़ा रह जाता है, और या फ़िर इस के कुछ अंश को पुजारी वर्ग द्वारा निजी उपयोग में लाया जाता है। आश्चर्य तो यह है कि हम भारतियों की मानसिकता में, ऐसी सौदे बाज़ी में कोई बुराई नहीं समझी जाती। अती भृष्ट लीडर जयललिता, इस ही सब के चलते मन्दिरों को बड़े उपहार दे कर, और आम लोगों को आटे-दाल की चिल्लड़ रिश्वत दे कर, पुन्ह सत्ता में आ गयी थी। पश्चिमी देशों में किसी भी भृष्ट नेता के इस तरहं पुन्ह इलेक्शन जीत कर सता में आने की कोई सम्भावना ही नहीं, क्यों की वहाँ किसी को भी कोई प्रलोभन दे कर वोट बटोरना, बहुत ही हिक़ारत की नज़रों से देखा जाता है।

18. घूसख़ोरी और रिश्वत की जड़े हमारे इतिहास में भी गहरी दिखती हैं। भारतियों की भृष्टाचार और कृप्शन के विषय पे सुप्त, उदासीन, कनफ़्यूज़्ड  और स्तम्भित मानसिकता की एक नही अनेक तस्वीरें भारतीय इतिहास में दिखती है। न जाने कितने ही उदाहरण हैं, जब द्वारपालों ने ही आक्रमणकारियों से रिश्वत ले कर उन के लिये किले के द्वार खोल दिये, तथा सैन्य कमांडरों ने दुश्मन से रिश्वत ले कर, अपनी ही फौजों से सरन्डर करवा दिया।  महाराजा रणजीत सिंह की मृत्यु के बाद उन्हीं के बिकाऊ सरदारों की गद्दारी के चलते, अंग्रेजों ने पंजाब पे कब्ज़ा किया। आज़ादी की जंग के दौरान भी मरहठों, रोहिलों, सिक्खों, राजपूतों और अन्य कईयों ने दुश्मन के साथ मिल कर,  कई बार एक दूसरे पे हमले बोले। नतीजा हुआ 1857 के ग़दर का दुखांत।

19.  भारतीय राजा और सरदार हमेशां बिकने के लिये इस कदर तत्तपर रहते थे, कि इतिहास का गहन क्रिटिकल अध्य्यन किया जाये तो यह सत्य साफ़ नज़र आता है।  उस ज़माने का भरतीय राजनीतिक पटल, इतना भृष्ट था कि वह किसी रण्डी-मण्डी से कम नहीं दीख पड़ता। कोई भी आक्रमणकारी, सिर्फ धन के ज़ोर पर  ज्यादातर  भारतीय राजाओं और उन के लाखों सैनिकों को अपने रस्ते से हटा सकता था। प्लासी के युद्ध में क्लाइव ने मीर जाफर को धन और सत्ता की रिश्वत दे कर बंगाल जीत लिया। 1687  में  गोलकुंडा का किला, भृष्टाचारी रिश्वतखोरों द्वारा गुप्त द्वार खुलवाकर जीता गया। मुगलों ने भी अनेकों बार,  राजपूत और मरहठों को घूसबाज़ी से ही जीता। दारा शिकोह के बेटे के संरक्षकदाता, श्रीनगर के राजा ने, दारा के पुत्र सुलेमान को,  औरंगजेब को केवल कुछ धन के बदले सौंप दिया।

20.  बाबा बन्दा बहादुर जी की कमांड के निचे, जब लाहौर को फ़तेह करने के पुख्ता इरादे से, सिक्ख लाहौर के किले पर हल्ला बोलने के लिए  संगठित हुए, तो निशाने पर पहुंचकर सिक्ख स्तम्भित रह गए, जब उन्हों ने देखा कि सिक्खोँ का ही एक धड़ा बिक चुका है, और किले के बाहर अपने  ही भ्राता सिक्खों के साथ जंग करने के लिए तयार खड़ा है। बाबा बन्दा सिंह बहादुर, यह सब देख कर इतने व्यथित हुए, कि उन का ह्रदय ही बैठ गया। भाइयों के हाथोँ भाइयों ही का वध टालने के लिए, गुरु गोबिंद के उस महान कप्तान ने सारी मुहीम ही  स्थगित कर दी, वरना आज भारत और सिक्खों का इतिहास कुछ और ही होता। ऐसे  और भी बहुत किस्से हैं, जब भ्र्ष्टाचार के जाल में फंस कर भारतीय ही  दुश्मन के हाथों बिक गए, और उन्हों ने रिश्वत के लालच में,  देश से, अपने राजा से, अपने साथियों से या अपने कमांडर से, गद्दारी की।

21.  यह भी अब तो काफी वायरल है की भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फाँसी दिलवाने के मामले में, कुछ बड़े लीडरों ने कैसे चुप्पी साधते हुए अंग्रेजों के सुर में सुर मिला दियेे। चन्द्र शेखर आज़ाद का एन्काउन्टर कैसे हुआ, यह भी आज कोई छुपा हुआ सत्य नहीं। सत्ता का प्रलोभन भी रिश्वत ही है, जिस के भृष्ट-कुचक्कर में न जाने कितने ही आज़ादी के दीवानों को, अपनों ने ही अंग्रेजों के हाथों शहीद करवा दिया।

22.  इस सभी के संदर्भ में जो एक प्रश्न उठता है, वह यह है, कि आखिर, हम भारतीय इतने बिकाऊ और खुदगर्ज़ क्यों हैं ?

23.  उत्तर स्पष्ट है। हम भारतीय सैद्धान्तिक तौर पे  नैतिक मूल्यों या नैतिक आचरण में विश्वास नहीं करते। कहीं न कहीं यह विश्वास हम सभी के ज़हन में घर कर गया है, कि रिश्वतखोरी, चापलूसी, भृष्टाचार, या फ़िर साधारण भाषा में कहें तो, चालू-पंथी के रास्ते पर चले बिना हम तरक्की नहीँ कर सकते ।

24.   जहां भगवान के साथ ही इन्सान ने घूसखोरी और चापलूसी का रस्ता अख्तियार कर लिया हो, वहाँ नैतिकता कहाँ  से आये गी?    भारतीय एक दूसरे पर नहीं, बल्कि किसी अदृश्य भगवान, ख़ुदा, रब्ब या गॉड पर ज्यादा विशवास करते हैं, जो उन की मान्यताओं  के अनुसार ख़ुद भी चढ़ावा ले कर, या चापलूसी करने पर  ही, भक्तो के काम करता है। जिस समाज का भगवान ही रिश्वतखोर हो, उस का भला कैसे होगा, यह मुझ जैसे स्वतन्त्र विचारकों का यक्ष प्रश्न है।
मेरा एक ही उद्घोष है, जागो इण्डिया, जागो।
🚩तत्त सत्त श्री अकाल🚩
© ✒गुरु बलवन्त गुरुने⚔