🚩 क्या कभी सोचा है, कुछ कटु सत्य यह भी हैं🚩@✒GBG⚔


क्या कभी सोचा है कि  देवताओं ने सिर्फ राक्षसों  को ही क्यों हराया,  मुगलों और अंग्रेजों को क्यों नहीं हराया ?

क्या कभी सोचा है, कि क्योंकर पुजारी सोमनाथ में मन्त्र पढ़ते रहे, लेकिन मन्त्र शक्ति के बावजूद महमूद गज़नवी, और  ख़िलजी का सेनापति नुसरत ख़ान मन्दिर कोे  लूटते रहे ! क्यों, कहाँ गई तब मन्त्रं की शक्ति?

क्या कभी सोचा है कि महिषासुर को मार कर दुर्गा तो माता और देवी कहलाई, लेकिन बलात्कारियों को मार कर फूलन देवी, डाकू ही कहलाई, यह कैसी विडम्बना है ? क्या कभी सोचा है कि भारत दुनिया का इकलौता देश है जहाँ मिट्टी की मूर्ति को देवी कह कर कीमती वस्त्र और आभूषण  पहनाये जाते हैं जब कि जिन्दा औरतों को नग्न कर  प्रताड़ित  किया जाता है ।

क्या कभी सोचा है, कि अन्धी आस्था के चलते, चाहे वह किसी व्यक्ति पर हो या किसी भगवान पर,  अंधविश्वास का आडम्बर विस्तृत हो रहा है। अन्धी आस्था लोगों को मूत्र पिला रही है, जब के दूध तथा नारियल का पानी पत्थरों पर फिंकवा रही है।

अफसोस इस बात का नहीं कि “धर्म” का धंधा हो रहा है, बल्कि अफसोस तो इस बात का है कि पढ़ा लिखा बन्दा भी अंधा हो रहा है । 

पूरी दुनिया में भारत ही एक ऐसा देश है जहाँ लहसुन, प्याज खाने से पाप लगता है, लेकिन दलाली, रिश्वत या  हराम की कमाई खाने से पाप नहीं लगता। इसे कहते हैं खरबुद्धि होना।

अगर यूपी और बिहार वालों ने मंदिर बनाने  की जगह कारख़ाने लगाने के लिये वोट किया होता, तो आज  गुजरात से जूते खा कर घर न लौट रहे होते !
#क्या कभी सोचा है ? 
✒गुरू बलवन्त गुरुने⚔

🚩राजनीतिक कोयले की दलाली में, सब का मुंह काला है, गाय का हत्यारा तो खुद उस का अपना ग्वाला है🚩@✒GBG⚔


1.  आज कल लोग भड़कते बहुत जल्दी हैं। भगतों की भीड़ हर तरफ है। सब कोई अपने अपने नेता या दल के छोले भटूरे खाने खिलाने में व्यस्त है। मूर्खों की कोई कमी नहीं जो बिना कुछ जाने समझे, किसी भी मुद्दे में, भक्ति की कड़छी,  किसी भी दाल में डाल कर,  न जाने किस दानव या देवता को खुश करने में लगे हैं।

2. कुछ लोग तो डरपोक इतने हैं, की सच्च जानते हुए भी झूठ की आरती उतारते हैं, कुछ मूढ़ इतने हैं, की उन से बात करना मेंढे से सर टकराने जैसा है।  चलो जो है सो है, लेकिन इस का यह अर्थ तो कतई नहीं की हम जैसे लोग कुछ लिखना या कहना छोड़ दें।

3.  जिस दिन आम आदमी की क़लम रुक गयी, समझ लो उस दिन भारत फ़िर ग़ुलाम हो गया, तो इस लिए आप सभी से निवेदन है कि सज्जनों की रक्षा के लिए और दुर्जनों के विसर्जन के लिए चर्चा चिंतन जारी रहे।

4.  अभी कुछ दिन पहले इलेक्टोरल  बॉन्ड या निर्वाचन बांड पे बात हो रही थी, तो एक श्रीमान भड़क उठे, की क्या आप जानते हैं की यह सब इलेक्टोरल  बॉन्ड भारतीय स्टेट बैंक द्वारा सारी KYC जानकारी लेने के बाद ही जारी किये जाते हैं।  अब उन्हें कौन समझाए कि भैया पहले जान लो, की जानकारी है क्या,  बे-वजह काहे आधे पके तथ्यों का रायता फैला रहे हो।

5.  तो सब से पहले तो यह कहने में मुझे कोई संकोच नहीं की इलेक्टोरल  बॉन्ड असीमित धन राजनितिक दलों को बिना किसी भय के चन्दा देने का साधन है, यानी धन किस ने दिया, कहाँ से आया और किस दल को दिया, इस के बारे कोई बड़ी जानकारी दिए बगैर,  राजनितिक लाभ के लिए धनविसर्जन का माध्यम ।

6.  अब आप और हम जैसे के, सौ पचास को कौन पूछता है, दिए न दिए, एक  बराबर।  असली राज़ की बात यह है कि बड़ी बड़ी देसी विदेशी कम्पनियाँ, या उन के मुखौटों के पीछे छुपे विदेशी सेंध-मार, अब हज़ारों करोड़ों का राजनितिक दान, एक छुपे हुए निवेश के रूप में कर सकते हैं। वह कैसे, तो साहिब वह भी बताता हूँ, लेकिन पहले थोड़ा सा इस गोलमाल का इतिहास भी जान लें।

7. भारत में, चुनाव में राजनैतिक दल, बेतिहाशा खर्चा करते हैं, बहुत पैसा लगाते हैं। याद रहे, यह सब पैसा किसी कुबेर या इंद्र के खजाने से नहीं आता, बल्कि देश में करदाताओं का या करचोरों का, यानी देशी विदेशी बड़े व्यपार घरानों का काला धन ही होता है।

8.  मौजूदा व्यवस्था की चुनावी प्रक्रिया देश के अरबों रूपये को, जो विकास के लिए काम में लाये जा सकते थे, चन्द झूठे जुमलेबाज़ों को चुनने, और फिर 5 साल तक उन्हें मसनद पर बिठा कर उन के नखरे नाज़ उठाने  में, कुव्यय करवा रही है।  इस लिए व्यवस्था परिवर्तन, जिस की देश को ज्वलन्त आवश्यकता है, उस का एक बड़ा हिस्सा चुनावी प्रक्रिया का सादा, सरल व व्यय विहीन बनाये जाना भी है। 

9.  राजनितिक दलों के पास पैसे कहाँ से आते हैं, तो जान लीजिये कि हर दल चंदा, यानी डोनेशन लेता है, और यह डोनेशन आप या मुँझ जैसे साधारण लोग कहाँ देते हैं, और दें गे भी तो कितना ? यह चन्दा तो बड़े व्यपारी देते हैं, जिन के पास असीमित माया और धन कमाने के मायावी  साधन हैं।

10.  अब चन्दा लेने और देने वाले दोनों ही मौजूद हों तो इस लेन देन की कोई राह भी इन द्वारा निकाली गई हो गी,  सो उस ही राह का नवीनीकरण करने के उपरांत, उस का नया नाम  इलेक्टोरल  बॉन्ड रखा गया है।

11.  चन्दा वंदा तो चन्दा मामा ही जाने कब से शुरू हुआ, लेकिन राजनैतिक चन्दा लेने देने का व्यवस्थित पथ  एक बड़े 'गुरु घंटाल', यानी राजनीती के धनुन्धर नेता, अब स्वर्ग निवासी, श्री वाजपयी जी के समय शुरू हुआ।

12.  वाजपेयी साहिब की सरकार ने राजनितिक चन्दा देने वालों को शरेआम पुरस्कृत किये जाने का राह खोला, राजनैतिक चन्दा देने वालों को VIP, यानी खासमखास स्टेटस दे कर।

13.  एक तो चन्दा देने वाली कम्पनी अब अपने द्वारा दिए गये चंदे को अपने खर्चों में दिखा कर टैक्स रिबेट ले सकती थी, जब की चन्दा लेने वाला दल उस चंदे पे कोई टैक्स नहीं देता था।  यह भी प्रवधान कर दिया गया कि बदले में चन्दा- दाता कर विभाग के लेखे जोखे में VIP भी हो जाता था। यानी, दे ले के सभी का फायदा।

14.  फ़िर UPA का समय आया, तो माल समेटने में भला इन्हें कब गुरेज़ था, सो इन्होंने   कॉरपोरेट्स को राजनितिक चन्दा देने के प्रोसेस को सरल बनाने के लिए एलेक्टोरल ट्रस्ट बनाने का प्रवधान बना दिया।  अब बहुत सी  कम्पनियों ने इन ट्रस्टों द्वारा चन्दा दे कर सरकार को अपने हक़ में पॉलिसी बनाने के लिए प्रेरित करने का रस्ता खोज लिया।

15.  यानी की कम्पनियों द्वारा चन्दा देने के नाम पे सरकार बनाने वाली संभावित राजनीतीक पार्टी को रिश्वत देने का रास्ता,  या यूँ कहिये कि पैसे के ज़ोर पर किसी भी दल की सरकार बनाने का हाईवेह अब तैयार था।

16.  धनवान कारपोरेट अब पैसा फेंक तमाशा देख की स्थिति में आ गये। बड़े बड़े नेता, व्यपारियों के जहाज़ों में बेधड़क राजनैतिक कम्पेनों पर उड़ते हुए नज़र आने लगे, यानी अब सरकार ये राजनितिक दल बनाये या वो राजनितिक दल, नेता बड़े व्यापारिक घरानों के, या अती अमीर राजनितिक परिवारों के दल्ले बनने तक ही सीमित रह गये, और जन्ता, बस  चुनाव से पहले नेताओं के जुमलोँ के रसगुल्ले, और चुनाव के बाद भृष्ट और झूठे नेताओं के जूते खाने के क़ाबिल ही रह गयी।

17.   यह सत्य किसी एक व्यक्ति या दल नहीं, सभी राजनितिक दलों पे लागू है।  मैं तो यहां तक कहूँ गा कि राजनितिक दल का गठन, अब कुछ लोग केवल जन सेवा या सत्ता प्राप्ती के लिये नहीं बल्कि, चन्दा प्राप्ती द्वारा धन प्राप्ती हेतु भी करने लगे हैं।

18.  फिर नमो साहिब की मौजूदा सरकार भला इस काम को आगे क्यों न बढ़ाती।  यानी सरकार कोई भी हो, किसी भी दल की हो, उस का नारा कोई भी हो, चाहे विकास, चाहे भृष्टाचार मुक्त भारत, चाहे गरीबी हटाओ, चाहे किसी भी धर्म से प्रेरित राष्ट्र निर्माण, कारपोरेट धन से चुनाव जीती सरकार, कारपोरेट दैत्यों की सेवा  करने में कैसे पिछड़ सकती है ?  जिन पंखों पे बुलबुल उड़ रही हो, उन्हें ही कैसे काट सकती है ? सो साहिब बाग़ की मैजूदा बुलबुल  ले आई कारपोरेट बांडस का सिलसिला।

19. सन् 2017 में एक कानूनी प्रावधान लाया गया , जिस के चलते अब कोई भी, धना सेठ, गन्ना सेठ, सोना सेठ, जादू टोना सेठ,  बाबा लोग,  कोयला सेठ,  पेट्रोल डीज़ल सेठ, मदिरालय से ले कर शौचालय  सेठ, यानी कोई भी अडानी, अम्बानी, या फिर राजा जानी, जितना चाहे उतना धन, इन बांडस के जरिये किसी भी दल को दे सकता है,  और फ़िर उस राजनीतिक दल में अपने दल्लालों को फिट भी कर सकता है।

20.  इस तरहं भारत में देश की आज़ादी के बाद, एक बार फ़िर कंपनी राज की स्थापना हो चुकी है। कोई भी कम्पनी अब एक हज़ार ₹ से ले कर 1 करोड़ ₹ तक के असीमित निर्वाचन बांड, 'असीमित' शब्द पे ध्यान दें, खरीद कर, उसे चन्दा स्वरूप राजनैतिक दल को दे सकती है।

21.   2017  के वित्तीय बिल संशोधन से पहले,  कोई भी कम्पनी, अपनी बीते तीन सालों की शुद्ध कमाई, या शुद्ध मुनाफ़े की धनराशि का 7.5% हिस्सा, किसी राजनितिक दल को दे सकती थी, लेकिन कम्पनी को अपनी लाभ-हानी की वित्तीय रिपोर्ट में इस राशी को दिखाना अनिवार्य था और यह भी बताना आवश्यक था कि किस पार्टी को पैसा दिया गया है।

22.   2017 के वित्तीय बिल संशोधन के बाद यह प्रावधान हटा दिए गये।

23. अब न तो धन देने की कोई सीमा है, न ही जिसे धन दिया गया, उस पार्टी का कोई विवरण देने की आवश्यकता। अब खुल के खाओ, खुल के खिलाओ का फण्डा जारी हैं, जब तक आप फण्ड राजनैतिक दल को दे रहे हैं।

24.   जिन लोगों को यह गलत फ़हमी है कि चन्दा दाता को KYC के तहत अपनी या चन्दा लेने वाले की जानकारी देनी हो गी, वह जरा संशोधित कानून और उस की उचित व्याख्या, एक बार पुन्ह पढ़ लें।
🚩तत्त सत्त अकाल🚩
✒गुरु बलवन्त गुरुने⚔

🚩Understanding via a short essay, Mass Bribing, Messing up with RBI reserves and Electoral Bonds, the worst scams of century @ ✒GBG⚔


1.  People are once again drawn to, deliberately being pulled in to 'Mandir- Masjid', 'Hindu Muslim',  'Nationalist Anti-Nationalist'  and 'Name Change', game, where as the country is being ruined by crooked politicians.

2.  If reports in some media are to be believed, government is planning to draw 3.6 lakh crore ₹ from RBI Reserves. RBI is reluctant because this reserve is only touched in times of war or other such contingencies. 

3.  The irony is, that the only way RBI can practically  pay this kind of money to government, is by printing surplus  cash... that is by printing 3.6 lakh crore currency notes  before next  elections.  This printing of currency without  gold reserves to  backup the cash,  shall play havoc with economy.

4.  What actually could be the aim of printing such huge currency. May be there could be direct  currency distribution before election, which shall take electoral bribing to a new level, a sort of mass bribing.

5.  What ever the aim,  RBI parting with 40% of its reserves, by whatever means,  will certainly  devalue the ₹ as never before,  and sink economy to a new low.

6.  Then there is the issue of electoral bonds.  The issue of electoral bonds is an extremly serious issue. This legalises mega corruption and allows corporates and foreign powers to buy huge stakes in our political and power space.

7.  The electoral bonds are anonymous so if a corporate, or any foreign donor says, I’ll give you an electoral bond of Rs 1,000 crore if you pass this specific policy, there will be no prosecution, as the donor shall remain nameless.  So this too is a way of taking bribing to a new high.

8.  In this scenario no honest person can ever win an election, because without corporate or foreign financial support, no one other than a sponsored person will have the money to win elections.   It  means to win elections, either one will now have to be a corporate tommy, or a traitor. 

9.  The electoral bonds issue is hugely serious, and hopefully the Supreme Court will step in and  strike it down. Hopefully it does, and a common man prays,  that it does.
🚩तत्त सत्त अकाल🚩
✒Guru Balwant Gurunay.⚔

🚩India needs freedom from politicians habitual of 'Lying either as a habit, or by Ommision',🚩@✒GBG⚔


1.  Is India in grip of blatantly  lying politicians, or politicians in habit of lying by ommision❓Lying by omission, by the way is the act of misrepresenting reality, by telling half the truth, while leaving out key facts that could change the meaning of whole truth. In other words, 'Lying by Ommision',  a way of spreading falsehood by   not telling the complete truth.

2.  Is it true that the present government, which has come to power on  Hindutva and Akhand Bharat agenda, have ceded territory,  have given away thousands of acres of land to Bangladesh without even a battle, in the name of sorting out our borders ❓

3.  Is it true that the government has  literally bowed down to eat the dust in front of Chinese at Doklam and Arunachal Pradesh❓

4.  Is it true that Inspite if so much of noise being made against foreign nationals, Bangladeshis, and specially Rohingiyas, the number of Rohingiyas in Jammu has in fact Doubled the, and the government has been busy giving them adhar cards, electricity and water connections and shops making a 'Burma Bazar' for them ❓

5. Is it true,  that to the corrupt  Indian politician, the MOST important thing is not the nation, but votes, and for votes our so called leaders are ready to put at stake any national interest❓

6.  Is it true that India is passing through a worst scenario political phase post-independence ? During Mrs. Indira Gandhi's time, when the government had wanted to  just negotiate, not cede  the  three bigha corridor to BD, the slogan, 'Raqt Dayibo, Pran Dayibo , Maati  Dayibo naa,' was raised, but how come now the same folks silently let go a huge territory, as also they grant around 2 lakh BD cross-overs,  full fledged Indian citizenship❓

7. All these are examples of double faced, fork tounged 'cheating the nation politicians'.  Listen to Shri Sushil Pandit, to know the facts.
🚩तत्त सत्त अकाल🚩

🚩दास्ताने कृष्ण अर्जुन, भील और गोपीयाँ🚩 @✒GBG⚔

1.   हाल ही में श्री कृष्ण की एक ऐसी कहानी पढ़ी, जिस में भगवान कृष्ण  भी एक दम मजबूर दिखे, और अर्जुन एक दम लाचार।

2.  इस ही प्रसङ्ग को पढ़ कर महात्मा तुलसीदास जी कह उठे थे,
'तुलसी नर था कब बलि, समय बड़ा बलवान,
भीलां लूटी गोपियां, वही अर्जुन वही बाण।'

3. प्रसङ्ग कुछ ऐसे है कि महाभारत का युद्ध समाप्त  हो चुका था। कृष्ण व्याध तीर से घायल थे। ऐसे में अर्जुन उनसे मिलने पहुंचे।

4.   कृष्ण ने अर्जुन से कहा कि पार्थ मुझसे मिलने गोपियां आ रही हैं लेकिन रास्ते में भीलों के कबीले हैं, जो उन को उठाने की फ़िराक़ में हैं,  तुम गोपीयों की  भीलों से रक्षा करना।

5.  अर्जुन को महाभारत विजय के बाद खुद पे अभिमान  हो चुका था। वह श्री कृष्ण से बोला, 'माधव मेरे होते भील गोपीयों को लूट लें, यह असम्भव है',  लेकिन काल का खेल कुछ ऐसा निकला की अर्जुन देखता ही रह गया और भीलों ने गोपियां लूट लीं।

6.  अर्जुन ठगा सा रह गया।  उसे अब समझ आया कि महाभारत के युद्ध में ताकत उस की नहीं, समय की थी, और समय जब अनूकूल न हो तो गोवर्धनधारी कृष्ण की गोपीयों को, गांडीवधारी बाहूबली अर्जुन के संरक्षण के बावजूद, भील तक भी लूट ले जाते हैं।

7.  अर्जुन और कृष्ण की इस दास्तान से एक शेर याद आया,
'बख्त के तख़्त से यक-लख्त उतारा हुआ शख्स,
तुमने देखा है कभी,  जीत के हारा हुआ शख्स ?'
🚩तत्त सत्त अकाल🚩
✒गुरु बलवन्त गुरुने⚔
शब्दार्थ:-
बख्त- किस्मत।
तख़्त- सिंघासन।
यक-लख्त - अचानक, एकदम जल्दी से।

🚩India slides down to position 133 amongst 156 nations on UN's Happiness Index. Here is a reality check🚩@✒GBG⚔

1.  Although some or other kind of wellness surveys, studies, research and other initiatives have been the norm with United nations, but from year 2012, they started publishing a Happiness Index annually.

2.   This exercise of researching, indexing and  reporting  of this survey is carried out by SDNS,  or 'Sustainable Development Solutions Network' of UN.

3.  Just to put the concept straight, we all know what happiness means, so happiness in 'Happiness Index',  is just happiness.  'Index',  for info of some is a simple listing , which shows, indicates, manifests, or discloses information about  items, people,  places or or just about any thing, in an alphabetical, chronological, or a numeric order. So 'Happiness Index', is a list of countries listed by United Nations on a precedence of most happy to least happy.

4.  For any survey and report/indexing/listing some parameters have to be set.  Parameters for measuring happiness of the people if a nation were seven, namely, GDP, Per Capita Income, Health and life expectancy, Social Support, Social Freedom, Generosity,  and Absence of Corruption.

5.  The survey was carried out in 156 nations, ranging from Ethiopia, Syria to America and  Afghanistan. There were some surprising out comes and revelations. The happiest place to live, or migrate to, turned out to be Finland, and the saddest place is Syria.

6.  America, a happiness destination for many, was at 18th place, UK was 19th, and 20th position went to United Arab Emirates.

7.  Talking of India and its immediate neighbours, sadly India came last amongst them,  at position 133. India slipped down from its 122nd position in 2017 to 133,  position in the year 2018. We will look at the reasons in the end, but Pakistan is at position 75, China is at 86th, Bhutan at 97th, Nepal at 101, Bangladesh at 115 and Sri lanka is at 116th position. 

8.  The top 10 happiest nations of the world are as follows,
1).  Finland.
2).  Norway.
3).  Denmark.
4).  Ice land.
5). Switzerland.
6.). Netherlands.
7). Canada.
8). Newzealand.
9). Sweden.
10). Australia.

9.  Out of these nations, the top  nations are Finland, Norway, Denmark  Iceland,  Netherland and Sweden, all Scandanavian nations or nations neighbouring Scandinavia. General reasons for super happiness prevailing here are, small population, rich resources, honest governance, great health care and education, honesty and generosity amongst people, beautiful land scape, availability of pollution free and very affordable energy resources. Norway for instance has totally converted to electric cars, Iceland has abundance of geothermal energy as a result of geysers, and Denmark and Netherland have the best cycle track networks in the world.

10.  In these nations acceptance of diversity of  thought, culture and lifestyle, or supreme tolerance for others is a huge reason for happiness.  You will be surprised that in terms of immigrant happinesses, the happiest foreign born immigrants live in Finland.

11.  Switzerland ranking 5th in the world, deserves to be ranked higher, as it not only has a very evolved society, but also practices the best form of democracy and citizen participation in governance and decision making.  It is the most beautiful nation in terms of natural beauty, sporting culture and closeness of man to nature.

12.  Canada, New zealand, and Australia are open spaces with good governance and good society, although the immigrants from Indian subcontinental nations, or islamic nations  are in the the process of slowly poisioning these societies with religion, superstition and fundamentalist mindset. Their cheating and creepy ways are setting in faster than expected, as they continue to be more active in the political and governance machinery of these Commonwealth nations. These countries are most suitable other wise, for english speaking cosmopolitan, westernised immigrants, as they face no language or cultural shift problems here.

13.  How come Pakistan is ranking 75. Well I will have to say that there must have been a computer error there.  Pakistan in every way is practically as good or bad as India,  or else may be it is  a generally accepted fact that when poor, downtrodden, abused, misgoverned and unfortunate folks accept their lot, they choose to be happy on 'As is Where is' basis.  Also may be now that Imran Khan is ruling this pseudo democratic,  quasi theocratic islamic nation, the Pathan attitude seems to have set in. The joke doing the rounds in Chandigarh is, Nawaz Shareef was bending in to a gutter, trying to clear it. Imran saw him doing so, and thinking he was placing Naans in a tandoor/oven shouted, "Oye Yara Miyaan,   4 naan merey bhi laga de."  Nawaz saw the opportunity and said, 'Khan saab, aaj sey tandoor hi aap kaa hua",  and ran off handing over the gutter to Imran. Khan sahib since then is running, PM's car bazar by the side of same manhole.

14.   Although I wish both siblings Pakistan and India to share the top spot on happiness index, but it sadly is a distant dream, going by our fucked up system and extremely corrupt jokers presiding over.

15.  But why India is at spot 133.  With 65% youth population, with skill development  slogans, with India shining slogans, we should  atleast be, amongst the top 50 on the list. To be on slit 133, is truly shameful, but a poetic thought came to my mind,
'Mar bhi ham kiyon nahin Jattey,
Sharm bhi abb hamein nhin aati,
'Gurunay' tu rota hai ab kis ke liye,
Sach ki unhein yaad bhi nahin aati.'

116.  The singular reason for India's downgradation is 'The Indian Politicians'. These rascals have rogered our nation.  Ever since independence, the rascals have been playing votebank politics. Every single politician of india has done caste, creed, religion, region based politics to gain political power.  As a result none of them have ever represented a true India, why even talk of a new India. Thus an average Indian feels, insecure, divided and socially distrustful, of each other, resulting in extreme unhappiness.

17.  Another reason for Indian unhappiness is a huge economic insecurity set in Indian minds, post demonitization and other financial mismanagements.  Indians by the way are a very aware, awakened and media savvy nation, badly let down by its politicians, who have used the media, social and mainstream both, to misinform public via misrepresentation of facts.

18.    India has slipped to 133 rank on UN happiness index  because, the people  of India are unhappy about the farmers committing suicides unable to pay back a bank loan worth a few thousands or a lakh plus, where as huge financial dacoits  are successfully running away to foreign lands,  after defrauding banks of thousands of crores worth of ₹s, deposited by common man.

19.  I, as a citizen opinion leader, will blame it all, on poor governance, stupid strategy and a corrupt and cheating mindset of our politicians.

20.  We can change it all, we must change it, and the common man must find, more and more ways to shub a bamboo up the a*se,  of any and all bad governance.
🚩तत्त सत्त अकाल.वन्देमातरम🚩
©✒Guru Balwant Gurunay⚔

🚩Is Mr Modi capable of being a Chhota Sardar⁉@✒ GBG⚔




1.  Mr. Modi dedicated to unity of India, a statue made in mega proportions of a person of mega proportion, Sardar Patel, who still stands taller than  the tallest statue,  and is undoubtedly a great icon of united India.

2.  Congress on the other hand has rightly stated that Patel was a Congress Stalwart, who after the assassination of Mahatma, had ordered an absolute ban on  RSS, an organisation from which,  Mr. Modi started his political career as a pracharak.

3.  So what could be the aim of Mr. Modi in politically magnifying Sardar Patel ?

4.   Either it is to claim a precious  trophy from the enemy camp, or it is to  recast  him self in a new  'Nation builder'  image.

5.  By casting himself  in the cast of Sardar Patel, Modi Sahib has made an effort to make himself  rise above his basic fixed image of being an ex sanghi. In this I  find nothing wrong. Politically every one has the right to be reborn.

6.  Being reborn in politics, or politically re-casting one self is not  easy, but  going by the race for control of political space in India, Mr. Modi  might pull a double trick, and succeed in his aim, that is to marginalise his political opposition in congress, aswellas succeed in containing his critics and enemies in sangh, ultimately marginalising RSS and all other forces of extreme political positioning.

7.  To deserve to be called a Chhota Sardar, enacting Patel's statues alone won't do. 

8.  Although such steps are alright as far as preserving, building and creating national icons are concerned, but the nation as a whole seems to have out grown the era of symbols and slogans alone.

9.  For deserving what he desires, Mr. Modi shall have to tame the forces of national disintegration,  trying to position themselves as flag bearers of seprate nations, as well as those, who are dividing the nation by claiming a brighter patriotic space for themselves,  by using  pseudo nationalism to whip all or any opposition.

10.   Afterall,  this is what being a 'Sardar Patel' is all about. Any one desirous of being seen in his shadow shall have to now prove his worth via his actions, more than his words.
🚩तत्त सत्त अकाल🚩
©✒Guru Balwant Gurunay⚔