🚩भारत और भरतीयता के पतन के मूल कारण।🚩©@✒Guru Balwant Gurunay⚔

1.    हम सभी भारतीय, पंजाबी, बंगाली, सिक्ख, राजपूत, जाट या फ़िर कुछ भी और होने पे बेवजह गर्व करते हैं, लेकिन भारतीय होने पर गर्व नहीं करते।

2.  हमारे नेता भी वोटों की राजनीती के कुपाष में जकड़े, अलगाववाद की भावना को तो बढ़ चढ कर हवा देते हैं, लेकिन एकता की भावना को कोई बिरला ही बढ़ावा देता है। जब किसी समाज के नेता ही, भ्र्ष्टाचार, झूठ, फ़रेब, और बांटो और राज करो की नीतियों को अपना सब कुछ समर्पित कर चुके हों,  तो देश और समाज का भृष्ट होना,  बंटना और आखिर  बिखर जाना स्वभाविक ही है।

3.  आखिर हम भारतीय इस दयनीय स्थिति तक पहुँचे कैसे ?!!!!    यह गहन चिंता और अथक चर्चा का विषय है। यह चिंतन जन जन, और हर मन में जागृत करने की आवश्यकता है। यह चर्चा, गली नुक्कड़ की चर्चा से ले कर राष्ट्रीय चर्चा बननी चाहिए, तभी माँ भारती का उद्धार सम्भव है, वरना इक़बाल का यह शेर सच्च हो निकले गा, कि
"न समझो गे तो मिट जाओ गे ऐ हिन्दोस्तां वालो,
तुम्हारी दास्ताँ तक भी न हो गी दास्तानों में "।

4.  आइये मित्रो, इस से पहले की यह हालात हमारा दुखांत बन जाये, इस बदहाली के कारणों पे एक नज़र डालें।

5.  देखिये, आप और मैं, इस तथ्य से मुंह नहीँ मोड़ सकते की हम सब मूलतः एक खुदगर्ज़ समाज की खुदगर्ज़ इकाइयां हैं। अपने से आगे देखने की प्रिविर्ति हम सभी में न के बराबर है। अपने घर का कूड़ा पड़ोसी के घर के आगे डालना, अपने मन की गन्दगी के कारणो को, दूसरों में ढूंढना हमारा स्वभाव सा बन गया है। भाई भाई को लूटने का सबब बना हुआ है। मित्रता मात्र किसी से धोखा करने का हथियार बन चुकि है। हर इकरार केवल तोड़ने के लिये किया जा रहा है, वादे बस जुमले बन कर रह गये हैं, और देश भक्ति बस इक मज़ाक।

6.  खुद को ख़ुदाई का मरकज़ समझने वाले हम भारतीय अपने आप में इस कदर खो चुके है, की हम देश या समाज के बारे सोचना, देश और समाज की चिंता करना, अब केवल एक मूर्खता समझने लगे है।  यानी भारतीय सन्दर्भ में जो खुदगर्ज़ है, वह समझदार है, और जो आज भी देश या समाज को अपनी होंद का केंद्र बिंदु या मरकज़ समझता है, वह मूर्ख है,  पागल है,  या दीवाना है।

7.  ज्यादा से ज्यादा हम खुद को किसी पार्टी, गुट, ग्रुप, धर्म या इलाके से जोड़ कर देखने के क़ाबिल ही हो पाये हैं। कहना पड़े गा की हम भारतियों में भ्र्ष्टाचार और अलगाववाद, सोच के लेवल पे स्थापित हो चुका है,  वह भी अत्यंत  प्रबलता से।  तो ऐसे में आप ही कहिये कि कोई भी खुदगर्ज़ और खण्डित समाज, भला एकजुट हो कर तरक्की कैसे कर सकता है ?

8.  हमारी खुदगर्ज़ी  के चलते आज देश में करप्शन  या भृष्टाचार, घूसख़ोरी या रिश्वतखोरी, हमारी संस्कृति का हिस्सा बन चुके है। भ्र्ष्टाचार आज,  देश और समाज के हर स्तर और पहलू में व्यापक रूप से प्रस्तुत है.  हम भारतियों ने भृष्टाचारी व्यक्तियों को सुधारने की जगह उन्हें मान्यता देना स्वीकार कर लिया है।

9.  हम किसी भी थोड़े से धनवान व्यक्ति की इज़्ज़त करते हैं, उसे सम्मान की नज़र से देखते हैं। कोई भी बईमान,  छोटा हो या बड़ा, चोर हो या डाकू, किसी छोटे मोटे ज़मीन माफ़िया का सरग़ना हो, या फ़िर कोइ राज्य स्तरीय तस्कर,  आज समाज में वह उच्च आसन ग्रहण कर रहा है। कवियों लेखकोँ और बुद्धिजीवियों को सम्मानित करने के लिये जब चोर उचक्कों को स्टेज पे चढ़ाया जाये, जब यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर या   बुद्धिजीवी  किसी सड़क छाप गुंडे से नेता बने क्रिमिनल पॉलिटिशियन के गले में हार डालते दिखें, तो इस के चलते युवा पीढ़ी का, जल्दी धनवान और असरदार या बाहूबली बनने के कुचक्र में फंस कर, जुर्म की दुनिया की ओर आकर्षित होना स्वभाविक ही है।

10.  हैरत की बात है, कि आज परीक्षाओं में नकल करवाना, पेपर लीक करवाना, नकली डिग्रियाँ बेचना,  एक सुस्थापित माफिया बन के उभर रहा है। नकली सर्टिफिकेटस का बाजार गर्म है।  नकली डिग्रियाँ बना कर लोग, डॉक्टर, इंजीनियर, और यहां तक की न्यायाधीश  तक बन बैठे हैं। यानी, आप की दवा दारु करने वाले डॉक्टरों से ले कर आप को न्याय देने वाले जज और वकील, तथा आप का प्रशाधन चलाने वाले अफ़सर और राजनेताओं तक,  कितने ही, नकल द्वारा परीक्षा पास कर के, या नकली डिग्री के सहारे, खुद  को स्थापित किये बैठे हैं। कितनी ही नौकरियां केवल घूसख़ोरी के चलते, ऐसे बिक रही हैं, जैसे की मण्डी में आलू प्याज़। कीमत चुकाओ, और ले जाओ, मानक चाहे फ़र्ज़ी हों, जब तक अर्जी के साथ फ़र्ज़ी डिग्री, लेकिन साथ में लाल नोट संलगित हैं, तो बन जाओ अधिकारी।

11.   याद रहे, कोई भी व्यक्ति या कौम, समाज या देश, जन्मजात भृष्ट नहीं होते, लेकिन कोई  भी व्यक्ति या कौम, और फ़िर समाज या देश,  अपने कल्चर द्वारा बुरी तरहं भृष्ट हो सकते है ?  इस लिए, यह जानने के लिए कि भारत में भ्र्ष्टाचार इतना व्यापक क्यों है, हमें अपने  देश के निवासियों की कार्यशैली, जीवनशैली और स्थापित तौर तरीकों पे नज़र डालनी हो गी।  हमें अपने धर्म, धार्मिक संस्कारों, समाजिक और निजी संस्कारों का पुन्हांकलन करना हो गा।

12.  निजी तौर पे तो चलो हम सभी अव्व्ल दर्जे के खुदगर्ज़ हैं, लकिन समाज की इस गिरावट के लिए हमारे धर्म , और हमारी धार्मिक मान्यताएं भी उतनी ही ज़िम्मेवार हैं।  मैं तो यहां तक कहूँ गा की समाज में रिश्वत ख़ोरी का चलन भी हमारे धार्मिक परपंचो से ही शुरू हुआ है। भगवान को भी भारतीय लोग चढ़ावा चढ़ा कर, यानी उसे रिश्वत दे कर, अपने लीये वांछित फल पाने का, और अपनी कुपात्रता पर पर्दा डालने का एक जरिया मात्र ही मानते हैं।

13.  आज हम भारतीयों ने अपने गुरुओं, वेदों, उपनिषदों और पुराणों की बाणी को, ज्ञानस्रोत न मान कर, यानी अपने धर्मग्रन्थो को पढ़ने, समझने और उन की बाणी द्वारा प्रसारित शिक्षा का अनुसरण करने की राह को त्याग कर,  उन्हें पूजा अर्चना के मार्के मात्र बना दिया है। धर्मग्रन्थों को सर्दी में रजाई ओढांना, गर्मी में  AC  लगाना, मूर्तियों और ग्रन्थों को भोजन, वस्त्र, आभूषण, धन आदि भेंट करना, उन के साहमने भीखारियों  की तरहं गिड़गिड़ाना, मूर्तियों और ग्रन्थों के साहमने, भजन, कीर्तन, अरदास पूजा आदी करना,  साफ़ दर्शाता है, की हम भारतीय, धर्म ग्रन्थो की बाणी या मूर्तियों द्वारा प्रकाशित व प्रसारित सत्यों या तथ्यों पे  कोई ध्यान नहीं देते, बल्कि इन सब को भी हम ने चढ़ावे की रिश्वत दे कर, या पूजा प्रशंसा की चापलूसी कर के, कुछ आउट ऑफ़ टर्न पाने का, कोई सुख साधन के द्रव्य पाने का साधन मात्र ही बना छोड़ा है।  यानी हमारी भृष्टाचारी व्यवसथा की जड़े हमारी धार्मिक आस्थाओं और प्रपंचो तक गहरी जुडी हुई हैं।

14.  मन्दिर के अंदर भगवान को चढ़ावे का कल्चर, मन्दिर के परकोटे के बाहर रिश्वत की प्रथा बन कर सामने आता है। ग़रीब लोग भगवान को चन्द सिक्के या नोट चढ़ाते है, तो अमीर उसे सोने चाँदी और हीरे जड़ित आभूषण। कोई भी किसी ग़रीब को उपहार देने में नहीं, बल्कि भगवान को उपहार देने में विश्वास करता है। एवज़ में दी गयी चढ़ावे रुपी रिश्वत, या पूजा के रूप में की गयी चापलूसी से ज्यादा बड़े 'उपहार या कृपा'  पाने की उम्मीद में।

15.  गरीबों को या तो भगवान के नाम पर दान दिया जाता है, जो वक़्त-बा-वक्त उन्हें कुछ चिल्लड़ या त्योहारों पे भोजन आदी देने तक ही सिमित है। बस इतना सा दान पुन्य कर के,  बदले में कोई शुभ फ़ल पाने की,  और अपनी किस्मत चमक जाने की उम्मीद हम भारतीय बनाये रखते हैं। यहां तक की  हमारी नज़र में दान पुन्य भी, अपना बुरा समय टालने का साधन मात्र है। इस ही भावना के चलते मंगल वार को मीठा दान, शनिवार को काले मांश, सोमवार को दूध दान आदि की प्रथा है। भारतीय मानसिकता में समाज सेवा, और दान पुन्य  भी किसी न किसी स्वार्थ सिद्धि हेतू ही किया जाता है।

16.  किसी भी व्यक्ति की ग़रीबी, या उस का बुरा वक़्त, उस के पूर्वजन्मों का फ़ल समझ कर, इग्नोअर किया जाता है, और इस तरहं समाज के दुखी जीवों के दुःख से, सभी धार्मिक लोगों द्वारा अपना पल्ला झाड़ लिया जाता है। भृष्ट आदमी भगवान को भी बड़ी से बड़ी रिश्वत देता है, कई बार केवल अपने काले धन को किनारे लगाने मात्र के लिए। मूर्ख लोग ऐसे व्यक्तियो को महान धर्मभीरु समझते हैं, और उन की जूता परेड करने की जगह उन्हें इज़्ज़त देने लगते हैं। जून 2009 में छपी, मशहूर भारतीय अख़बार,' Hindu' की ख़बर के अनुसार, कर्नाटक के मिनिस्टर, जनार्धन रेड्डी ने तिरुपति में हीरों जड़ित एक मुकुट भेंट किया, जिस की कीमत 45 करोड़ रूपये आंकी गयी।

17.   धर्मस्थलों में इतना धन और दौलत जुटता है, कि वहाँ की व्यवस्था को पता ही नहीँ चलता कि उस का सदुपयोग कैसे किया जाये। या तो यह धन मन्दिर के तहखानों में पड़ा रह जाता है, और या फ़िर इस के कुछ अंश को पुजारी वर्ग द्वारा निजी उपयोग में लाया जाता है। आश्चर्य तो यह है कि हम भारतियों की मानसिकता में, ऐसी सौदे बाज़ी में कोई बुराई नहीं समझी जाती। अती भृष्ट लीडर जयललिता, इस ही सब के चलते मन्दिरों को बड़े उपहार दे कर, और आम लोगों को आटे-दाल की चिल्लड़ रिश्वत दे कर, पुन्ह सत्ता में आ गयी थी। पश्चिमी देशों में किसी भी भृष्ट नेता के इस तरहं पुन्ह इलेक्शन जीत कर सता में आने की कोई सम्भावना ही नहीं, क्यों की वहाँ किसी को भी कोई प्रलोभन दे कर वोट बटोरना, बहुत ही हिक़ारत की नज़रों से देखा जाता है।

18. घूसख़ोरी और रिश्वत की जड़े हमारे इतिहास में भी गहरी दिखती हैं। भारतियों की भृष्टाचार और कृप्शन के विषय पे सुप्त, उदासीन, कनफ़्यूज़्ड  और स्तम्भित मानसिकता की एक नही अनेक तस्वीरें भारतीय इतिहास में दिखती है। न जाने कितने ही उदाहरण हैं, जब द्वारपालों ने ही आक्रमणकारियों से रिश्वत ले कर उन के लिये किले के द्वार खोल दिये, तथा सैन्य कमांडरों ने दुश्मन से रिश्वत ले कर, अपनी ही फौजों से सरन्डर करवा दिया।  महाराजा रणजीत सिंह की मृत्यु के बाद उन्हीं के बिकाऊ सरदारों की गद्दारी के चलते, अंग्रेजों ने पंजाब पे कब्ज़ा किया। आज़ादी की जंग के दौरान भी मरहठों, रोहिलों, सिक्खों, राजपूतों और अन्य कईयों ने दुश्मन के साथ मिल कर,  कई बार एक दूसरे पे हमले बोले। नतीजा हुआ 1857 के ग़दर का दुखांत।

19.  भारतीय राजा और सरदार हमेशां बिकने के लिये इस कदर तत्तपर रहते थे, कि इतिहास का गहन क्रिटिकल अध्य्यन किया जाये तो यह सत्य साफ़ नज़र आता है।  उस ज़माने का भरतीय राजनीतिक पटल, इतना भृष्ट था कि वह किसी रण्डी-मण्डी से कम नहीं दीख पड़ता। कोई भी आक्रमणकारी, सिर्फ धन के ज़ोर पर  ज्यादातर  भारतीय राजाओं और उन के लाखों सैनिकों को अपने रस्ते से हटा सकता था। प्लासी के युद्ध में क्लाइव ने मीर जाफर को धन और सत्ता की रिश्वत दे कर बंगाल जीत लिया। 1687  में  गोलकुंडा का किला, भृष्टाचारी रिश्वतखोरों द्वारा गुप्त द्वार खुलवाकर जीता गया। मुगलों ने भी अनेकों बार,  राजपूत और मरहठों को घूसबाज़ी से ही जीता। दारा शिकोह के बेटे के संरक्षकदाता, श्रीनगर के राजा ने, दारा के पुत्र सुलेमान को,  औरंगजेब को केवल कुछ धन के बदले सौंप दिया।

20.  बाबा बन्दा बहादुर जी की कमांड के निचे, जब लाहौर को फ़तेह करने के पुख्ता इरादे से, सिक्ख लाहौर के किले पर हल्ला बोलने के लिए  संगठित हुए, तो निशाने पर पहुंचकर सिक्ख स्तम्भित रह गए, जब उन्हों ने देखा कि सिक्खोँ का ही एक धड़ा बिक चुका है, और किले के बाहर अपने  ही भ्राता सिक्खों के साथ जंग करने के लिए तयार खड़ा है। बाबा बन्दा सिंह बहादुर, यह सब देख कर इतने व्यथित हुए, कि उन का ह्रदय ही बैठ गया। भाइयों के हाथोँ भाइयों ही का वध टालने के लिए, गुरु गोबिंद के उस महान कप्तान ने सारी मुहीम ही  स्थगित कर दी, वरना आज भारत और सिक्खों का इतिहास कुछ और ही होता। ऐसे  और भी बहुत किस्से हैं, जब भ्र्ष्टाचार के जाल में फंस कर भारतीय ही  दुश्मन के हाथों बिक गए, और उन्हों ने रिश्वत के लालच में,  देश से, अपने राजा से, अपने साथियों से या अपने कमांडर से, गद्दारी की।

21.  यह भी अब तो काफी वायरल है की भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फाँसी दिलवाने के मामले में, कुछ बड़े लीडरों ने कैसे चुप्पी साधते हुए अंग्रेजों के सुर में सुर मिला दियेे। चन्द्र शेखर आज़ाद का एन्काउन्टर कैसे हुआ, यह भी आज कोई छुपा हुआ सत्य नहीं। सत्ता का प्रलोभन भी रिश्वत ही है, जिस के भृष्ट-कुचक्कर में न जाने कितने ही आज़ादी के दीवानों को, अपनों ने ही अंग्रेजों के हाथों शहीद करवा दिया।

22.  इस सभी के संदर्भ में जो एक प्रश्न उठता है, वह यह है, कि आखिर, हम भारतीय इतने बिकाऊ और खुदगर्ज़ क्यों हैं ?

23.  उत्तर स्पष्ट है। हम भारतीय सैद्धान्तिक तौर पे  नैतिक मूल्यों या नैतिक आचरण में विश्वास नहीं करते। कहीं न कहीं यह विश्वास हम सभी के ज़हन में घर कर गया है, कि रिश्वतखोरी, चापलूसी, भृष्टाचार, या फ़िर साधारण भाषा में कहें तो, चालू-पंथी के रास्ते पर चले बिना हम तरक्की नहीँ कर सकते ।

24.   जहां भगवान के साथ ही इन्सान ने घूसखोरी और चापलूसी का रस्ता अख्तियार कर लिया हो, वहाँ नैतिकता कहाँ  से आये गी?    भारतीय एक दूसरे पर नहीं, बल्कि किसी अदृश्य भगवान, ख़ुदा, रब्ब या गॉड पर ज्यादा विशवास करते हैं, जो उन की मान्यताओं  के अनुसार ख़ुद भी चढ़ावा ले कर, या चापलूसी करने पर  ही, भक्तो के काम करता है। जिस समाज का भगवान ही रिश्वतखोर हो, उस का भला कैसे होगा, यह मुझ जैसे स्वतन्त्र विचारकों का यक्ष प्रश्न है।
मेरा एक ही उद्घोष है, जागो इण्डिया, जागो।
🚩तत्त सत्त श्री अकाल🚩
© ✒गुरु बलवन्त गुरुने⚔

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