🚩उलझे उलझे लोग और बाग़ी बाग़ी सोच🚩✒ गुरु बलवन्त गुरुने⚔

1.   कुछ लोग किसी भी जगह, व्यक्ति, या समय में उलझ कर से रह जाते हैं। कोई मक्का, मदीना, हरिद्वार या अमृतसर में उलझ कर रह गया, तो कोई, किसी ईसा या मूसा में। कोई अष्ट भुजाओं वाली देवी में उलझा है, तो कोई कलिका की जिव्हा या कामख्या की योनि में, कोई शव के भक्षण में उलझा है, तो कोई शिव के लिंग में, कोई अरबी किताब में उलझा है तो कोई किसी ग्रन्थ में।

2.   मेरा एक लेख पढ़ कर ऐसे ही एक मित्र कह उठे, कुछ कुछ ओशो का असर है आप पर। कुछ हंसी सी भी आई, और कुछ हैरानी भी हुई। हंसी इस लिए की जिस ओशो ने जीवन को सुलझाने में अपना जीवन ही लगा दिया, दुनिया उस ही ओशो तक में भी उलझ गयी, यानि ओशो की लाश को ढोने में लगा है ज़माना आज कल।

3.  वैसे ओशो को पढ़े हुए तो अब मुझे मुद्दतें हो गयी। पहले पहल सब कुछ पढ़ डाला, फ़िर लगा की एक प्रोफेसर ही तो है ओशो, एक ट्रांसलेटर, जो खुद शब्दों के जाल में फंसे सत्य को सुलझाता सुलझाता,  उन्हीं शब्दों के माया जाल में ऐसा फंसा, की माया मेम साहिब  ही ओशो की मौत का सबब बन गयी।

4.  हाँ, हम भी चले थे कुछ दूर ओशो के साथ,  लेकिन फ़िर वह  मर गया, मरना ही था उसे भी, इस मातलोक में आख़िर कौन कब तक ज़िंदा रहा है ?

5.  फिर ओशो बिखर  गया, बिखरना ही था, और फ़िर समा गया,  कुछ मुझ में कुछ आप में,   और फ़िर कुछ लोगों ने ओशो को बिखराना शुरू कर दिया, उस की राख को उड़ाना शुरू कर दिया।

6.  ओशो की भी भक्त मण्डली चल निकली, म्हां बहन** मादर** छुटकल बाबा या ड्रेस बदलू मेकप थोपु माता लोग, जो आज कल ओशो को भगवान, और उस के इर्द गिर्द मन्दिर मस्जिद बनाने में जुटे हैं।  जैसे और भी अनेकों  राम, कृष्ण, व्यास, बाल्मिकी, रहीम, नानक, कबीर, बुद्ध और रूमी, जैसे प्रज्ञा पुष्प खिले,  जिये, बिखरे और समा गए,  अपने अनेकों चाहने वालों में, लेकिन पांडितो और कर्मकांडियों के समूह ने उन के इर्द गिर्द मन्दिर मस्जिद, गिरिजा गुरुद्वारों की दुकानें सजा दी।

7.   मैंने भी बहुत पढ़ा ओशो को, आसान था, सरल था, मैं युवा था, सो सुर ताल बैठ गया मेरा ओशो नामक बाग़ी के साथ।  लेकिन फ़िर जैसा की मैंने कहा, मैंने ओशो को मरने दिया, चैन से, बिखरने दिया इत्मिनान से मरने दिया उसेे,  मैंने ओशो को ढोया नही। मैं  लाशों का कारोबारी बनने से इन्कार करता हूँ, शायद यही मेरे द्वारा ओशो को सब से बड़ी ख़िराजे अक़ीदत है, जब की बहुत से De-Novo Oshoite  पण्डित आज कल ओशो के मन्दिर स्थापित करने में लगे हैं।

8.  ओशो के बाद मैंने  नानक, कृष्णा मूर्ति और बाकियों को पढ़ा, जिन्हें शायद, या सत्य कहूँ तो निश्चित ही ओशो ने मुझ से पहले पढ़ा हो गा, लेकिन हमारा, यानि मेरा और ओशो का पढ़ना अलग था, हमारा समझना भी अलग है। मात्राओं के एक होने से, शब्द एकरूप नहीं होते। एकरूपता केवल ख्याल की है, प्यास की है, फिर  नदी, ओशो हो, नानक हो या कृष्णमूर्ती, सभी मात्र प्यास बुझाने के स्रोत हैं, प्यास शुद्ध मेरी या आप की है।

9.   आज कल मैं हाशिम शाह, मियाँ मोहम्मद बख्श, तृगनेव, टॉलस्टॉय, दोस्तोविस्की, ऍफ़ स्कॉट, शिन्या अशिबि, विलियम फाकनर, जिओर्ज ऑरवेल शरतचन्द्र, बीचर सटो, एमीली ब्रांतो, विलियम मेकपीस, इदरीस शाह, गुरचरण दास और पार्थसारथी को पढ़ कर रसानवित हो रहा हूँ, लेकिन मैं टॉलस्टॉय की तरहं गॉड to नो गॉड से पुन्ह गॉड तक के सफ़र तक सीमित नहीं। मैंने भगत सिंह की तरहं नो गॉड to नो गॉड at all तक के सफ़र को चुना है। इस में ज्यादा सार है, सत्य है।

10.  अच्छा लगता है  सुन कर, कि कुछ मित्रगण परमात्मा को महसूस करते हैं, या अपने रस पान के लिये यह कहते हैं। उन्हें अभी भी यह भृम है की खेचरी मुद्रा में जीभ तालु में लगा कर, और भ्रुकटी में नेत्र ध्यान केंद्रित कर के आप के दशम द्वार से अमृत झरता है।

11.  मैं उस ही परमात्मा को, महसूस कर के, ओढ़ के छोड़ चूका हूँ।  उतार के फेंक चूका हूँ मैं परमात्मा नाम की चादर को।   वह मेरी आत्मा की खड्डी पे बुनी गयी चद्दर न थी। उधार दी गई थी बचपन में मुझे, थोंपी गयी थी मुझ पे।

12.  ओढ़े रखी बहुत साल,  फिर चलते चलते एक दिन लगा,  काफी हुआ यह भी,  तो बस उतार कर एक भूत चुड़ैलों के पीपल के पेड़ पे छोड़ आया उसे मैं बाग़ी। लटकता हो गा वहां परमात्मा, मेरा और मेरी पाषाण और मध्य युगीय  सोच का भूत बन कर।।

13.  जो अलख है, निरंजन है , उस की बात ही क्यों की जाये। इस विषय को हमारे सन्सार को, जल्दी विराम देना चाहिए। इस से सन्सार को शांत और जंग-रहित होने में मदद मिले गी।

14.  क्या आप में से किसी को कहीं दिखता है आस्तिकों का परमात्मा ? दिखता है तो बस इंसान का दुःख,  इन्सान का वहशीपन, और  मौका मिलते ही, उस भगवान भक्त  इन्सान का जानवर बन जाना, एक लालची, भूखा और खूंखार जानवर, जो जानवरों से भी बत्तर है ।।

15.  और फिर जिसे सर्व्यापि, सभी पे रहम करने वाला, सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहती फिरती है दुनिया, उस ***ज़ादे का हज़ारों दुआओं के बावजूद भी कहीं कोई खुरा खोज तक भी नहीं मिलना।

16.  परमात्मा नाम की  बबल-गम से, और इस बबल-गम को चबा चबा कर 'धर्म'के फुग्गे बनाने वाले पुरोहित वर्ग से, जिस ने जितनी जल्दी छुटकारा पा लिया, वह उतना ही बेहतर रहा है और रहे गा  ।

17.  वक्त आ गया है की अब हम, सत्यम शिवम् सुंदरम को किसी बकचोदी द्वारा निर्मित divinity की जगह, एक आम आदमी में स्थापित करें। यह अती-आवश्यक है।

18.   जो परमात्मा, द्रौपदी का चीर,  सिवाय एक  कहानी के,  और कहीं बढ़ाता ही नहीं, जब निर्भया, या आसिफा का चीर हरा जाये तो जो परमात्मा गैरहाज़िर रहता है,  जब सरहिंद का ज़ालिम नवाब, नन्हे बच्चों को दीवार में चिनवाता है तो रब्ब होने के बावज़ूद वह बच्चों तक को बचाने नहीं आता, कोई जलवा नहीं दिखाता, ऐसे कमज़र्फ को रब्ब कहना कोरी मूर्खता है।

19.   दिल्ली, गुजरात, मुरादाबाद के दंगों में, जब दुनिया चीख चीख कर उसे बुलाती है, तो वह नज़र ही नहीं आता, सीरिया में जब बच्चों, बूढ़ों और निहथे नागरिकों पर केमिकल बम्ब गिरते हैं, और जन्ता 'या खुदाया मदद' की गुहार लगाती है, लेकिन वह सुनता ही नहीं, तो  ऐसे ख़ुदा, परमात्मा या रब्ब को  सत्यम शिवम् सुंदरम कहना, एक भ्रांति नहीं तो और क्या है।

20.  तो क्यों न  हम 'सत्यम शिवम् सुंदरम' को किसी बन्दा बहादुर जैसे योद्धा में देखें,  जिस ने असल में ज़ालिम की ईंट से ईंट बजा दी। क्यों न हम  'सत्यम शिवम् सुंदरम' को किसी शहीदेआजम सरदार भगत सिंह में देखें,  जो मात्र  23 साल की उम्र में शहीद हो गया, अपने असूलों के लिए। 

21.  So friends, My God Died a long time back, and I have buried him long ever since.

22.  था मेरे पास भी यह खिलौना, जिसे मैंने फेंक दिया। बहुत जप, तप, सिमरण, स्मरण की चाबी भरी मैंने उस में, लेकिन वह सदा ,केवल मेरी चाबी भरने पर ही निर्भर करता था। तोड़ फोड़ कर फेंक दिया मैंने उसे, कचरे के ढेर पे, जो उस की असली जगह है।

23.  अब, केवल 'अहम् ब्रह्मास्मि - I am God', ततत्वमअसि - You are That, प्रज्ञानंब्रह्म- Wisdom/Knowledge/Consciousness is God,  अह्लहक़्क़, ख़ुदी ही  ख़ुदा है,और इंक़लाब ज़िंदाबाद के इलावा, बाकी कुछ नही बचा, यही सार्थक है।
🚩तत्त सत्त श्री अकाल🚩
©✒गुरु बलवन्त गुरुने⚔

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