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🚩क्यों आवश्यक है व्यवस्था परिवर्तन @✒GBG⚔

1.  क्या  भारतीय व्यवस्था जन्ता को धोखा देती है... यदी इस का जबाब आप 'हां' में देते हैं  तो जान लीजिये की इसके ज़िम्मेवार आप खुद हैं, क्यों की आप व्यवस्था को झनझोड़ते नहीं, बल्कि भेड़ों बकरियों की तरहं इस का हिस्सा बनना एक आसान काम समझते हैं, और यदी आप का जबाब है 'नां', तो निश्चित तौर पे, या तो आप भृष्ट हैं, और या आप भृष्ट व्यवस्था के आदी , यानी हेबिचुअल हो चुके हैं।

 
2 .  हमारे यहाँ सिस्टम  डेमोक्रेसी के नाम से जाना जाता है, और व्यवस्था चुनाव द्वारा या फ़िर शिक्षा और प्रतिस्पर्धा  के मापदण्ड द्वारा चुने हुए अधिकारी नियंत्रित करते हैं।

3.   त्रासदी यह है की प्रतिस्पर्धा द्वारा चुने गये सिविलियन और फ़ौजी अधिकारीयों पर, वोटों द्वारा चुने हुए लोग, हुक्मरान बन कर बैठ जाते हैं,  जिन्हें सिस्टम में नेता के नाम से जाना जाता है।

4.  चुनाव की प्रक्रिया एक दम भृष्ट है, जो सीधे सीधे जन्ता का  शोषन करती है।  इस प्रक्रिया में एक दार्शनिक और अधपागल का बराबर मूल्यांकन  किया जाता है, यानी के उन की वोट का वैल्यू बराबर है।

5.   दूसरा, समाज जाती, वर्ग, धर्म इत्यादि में नाम पर बंटा  हुआ है। और,  जब केवल ज्यादा वोट बटोरना ही ज्यादा सामर्थ्य की निशानी मानी जाये,  तो राजनीतिक वर्ग द्वारा समाज को विभाजित किया जाता है, बाँटो और राज करो की निति अपनायी जाती है, वोट खरीदे जाते हैं, या लूटे जाते हैं, और चुनाव में उतरे उम्मीदवारों द्वारा भ्र्ष्टाचार का नंगा नाच नाचा जाता है। इस बिगड़ी हुई व्यवस्था में चुनाव में उमीदवार बनने के मापदण्ड,  चुनाव में भृष्टाचार की सम्भावनाओं को और ज्यादा बढ़ा देता हैं।

6.  आइये  देखें की जहां डॉक्टर, IAS, IPS या सैन्य अधिकारी बनने के लिए, न सिर्फ एक जबरदस्त प्रतिस्पर्धा के दौर से गुज़रना पड़ता है, बल्कि कई किस्म के मापदण्डों पे खरा उतरना पड़ता है, वहीँ विधायक या सांसद, और फ़िर मंत्री बनने के माप दण्ड क्या हैं।

7. चलिये पहले तो आप, यानी वोटर और आप के भृष्ट नेता में फ़र्क जान लें।  कोई भी चुनाव का उम्मीद वार नेता यदी चाहे तो दो जगह से एक साथ चुनाव लड़ सकता है , लेकिन आप दो जगहों पर वोट नहीं डाल सकते।  अब तक मैं आप को इतना तो बता ही चूका हूँ, कि हमारे यहाँ सिस्टम डेमोक्रेसी के नाम से जाना जाता है, और व्यवस्था चुनाव द्वारा या फ़िर शिक्षा और प्रतिस्पर्धा  के मापदण्ड द्वारा चुने हुए अधिकारी नियंत्रित करते हैं।  त्रासदी यह है की प्रतिस्पर्धा द्वारा चुने गये सिविलियन और फ़ौजी अधिकारीयों पर हुक्मरान बन कर बैठ जाते हैं, वोटों द्वारा चुने हुए भृष्ट बुद्धि या तुच्छ बुद्धि लोग, जिन्हें सिस्टम में नेता के नाम से जाना जाता है।

8.  इन भृष्ट नेताओं की बदकिरदार सरदारी के चलते, प्रितिस्पर्धा द्वारा चुने गये अधिकारी, यानी ओफ्फिसर और करिंदे भी भृष्ट हो जाते हैं।  यह भी हम देख चुके हैं कि चुनाव की परिक्रिया एक दम भृष्ट है, जो सीधे सीधे जन्ता का  शोषण करती है।  इस प्रतिक्रिया में एक दार्शनिक और अधपागल का बराबर मूल्यांकन  किया जाता है, यानी के गधे या घोड़े, चोर या सिपाही, राष्ट्रवादी या अराष्ट्रवादी, देशभक्त या गद्दार की वोट का वैल्यू बराबर है। यह भी मैं आप के लिए हाईलाईट कर चुका हूँ कि समाज जाती, वर्ग, धर्म इत्यादि में नाम पर बंटा  हुआ है, और जब केवल ज्यादा वोट बटोरना ही ज्यादा सामर्थ्य की निशानी मानी जाये ,  तो समाज को विभाजित किया जाता है, बाँटो और राज करो की निति अपनायी जाती है, वोट खरीदे जाते हैं, या लूटे जाते हैं, और चुनाव में उतरे उम्मीदवारों द्वारा भ्र्ष्टाचार का नंगा नाच नाचा जाता है।

9.  इस बिगड़ी हुई व्यवस्था में चुनाव में उमीदवार बनने के मापदण्ड,  चुनाव में भृष्टाचार की सम्भावनाओं को और ज्यादा बढ़ा देता हैं। चलिये आब बात करते हैं किसी सेलेक्शन प्रोसेस द्वारा चुने हुए अधिकारी और नेता में फ़र्क। जहां डॉक्टर, IAS, IPS या सैन्य अधिकारी बनने के लिए, न केवल एक जबरदस्त प्रतिस्पर्धा के दौर से गुज़रना पड़ता है, बल्कि और भी कई किस्म के मापदण्डों पे खरा उतरना पड़ता है, वहीँ विधायक या सांसद, और फ़िर मंत्री बनने के माप दण्ड क्या हैं, कुछ भी नहीं, बस केवल इतना, कि आप कितने भृष्ट, झूठे, फ़रेबी, जुमलेबाज़, नौटंकी, ठग, गमनकर्ता, जराइम्पेशा, चालबाज़, कमीने, धोखेबाज़ या गद्दार  हैं।

10.   किसी  दफ्तर में  लिपिक की सरकारी नौकरी पाने के लिये आपको ग्रैजुएट होना जरूरी है, सेना में एक सैनिक की नौकरी पाने के लिये  प्लस 2 या ग्रेजुएट डिग्री के साथ आप को शारीरिक बल के भी कई मानक पार करने होते हैं, जैसे कि, 10 किलोमीटेर की दौड़, एक खास ऊंचाई तक रस्सा चढ़ना, लॉन्ग जम्प, हाई जम्प, इत्यादि इत्यादि।  सैन्य अधिकारी बनने के लिए पहले सम्पूर्ण भारत स्तरीय लिखित परीक्षा में मेरिट प्राप्त करनी होती है,  उपरांत उस के 7 दिन का लम्बा शारीरिक व मानसिक  परीक्षण पार करना होता है, लेकिन  नेता अंगूठा छाप भी हो तो चले गा, यानी चुनाव की भृष्ट प्रिक्रिया में से गुज़रने के बाद, दलबदल, ख़रीदो फरोख्त, चमचागिरी या  राजनितिक ब्लैकमेंलिंग का इस्तेमाल कर के, कोई भी भारत का डिफेन्स मिनिस्टर, फायनेन्स मिनिस्टर,  शिक्षा मंत्री, इत्यादि  बन सकता है ।

11.  आप को यह जान कर हैरानी हो गी की आज एक सरकारी कर्मचारी  '35' वर्ष की संतोष जनक सेवा करने के उपरांत भी पेशन का हकदार नहीं  होता,  जब कि राजनेताओं ने, जन्ता के पैसे पर जन्ता की सेवा के नाम पर जन्ता का ही दोहन करने के उपरांत, अपने लिए  मात्र '5' वर्ष  विधायक  या सांसद   की कुर्सी पर काबिज़ होने  के बाद, अपने लिए आजीवन पेंशन का बन्दोबस्त कर लिया है।  राजस्थान की भाजपाई मुख्यमंत्री रानी वसुंधरा  राजे ने तो राज्य के कानून में संशोधन कर के, अपने लिए और सभी मुख्य तथा उप-मुख्यमंत्रियों के लिए,  आजीवन, पेंशन, 5 लिपिक, 2 सहायक, एक RAS अफ़सर, गाड़ी, ड्राइवर, बंगला, मुफ़्त बिजली, पानी, टेलीफोन, कंप्यूटर, इंटेटनेट, और हवाई यात्रा का भी मुफ़्त प्रबन्ध कर लिया है। यह  कहाँ का न्याय है⁉

12.    क्या आप इस व्यवस्था से खुश हैं, या आप को लगता है की व्यवस्था में परिवर्तन आवश्यक है, यानी नेता और जनता, दोनो के लिये एक ही कानून होना चाहिये ⁉ यदि आप देशभक्त नागरिक हैं, किसी व्यक्ति या पार्टी के अंधभक्त नहीं हैं,  तो इस संदेश को फार्वड करें, और  मातृभूमि में जागृति लाने के इस अभियान को आगे बढ़ायें।
🚩तत्त सत्त श्री अकाल🚩
©✒गुरु बलवन्त गुरुने⚔🇮🇳🙏