📿 क्या किसी भी वर्ण से सिक्खी का कोई खास रिश्ता है⁉🚩 @©.✒प्रेरक गुरु बलवन्त गुरुने⚔

📿 क्या किसी भी वर्ण से सिक्खी का कोई खास रिश्ता है⁉🚩 @©.✒GBG⚔

1.    इस प्रश्न का स्पष्ट, सच्चा और निष्पक्ष जबाब है, जी नहीँ, बिलकुल नहीं। इस में कोई शक नहीं कि, जब कश्मीरी ब्राह्मणों के अनुरोध पर, नौंवे नानक, श्री गुरु तेग बहादुर जी दिल्ली के सुल्तान को मिलने गए, और उन्हों ने धर्म परिवर्तन करने से इनकार करते हुए, अपने शीश का बलिदान दिया, तब से ब्राह्मण समाज के मन में नानक साहिब के सिखों के लिए  सन्मान बहुत बढ़ गया और  वह सिक्ख गुरु साहिबान के पक्के प्रशंसक बन गए।  लेकिन यह याद रहे, गुरु साहिब का बलिदान केवल ब्रह्मीणों के लिए नहीँ, बल्कि उन सभी के लिये था, जो दिल्ली की सल्तनत के ज़ुल्मो-जब्र से मज़हब के नाम पर कुचले जा रहे थे।

2.  यह उल्लेखनीय है कि, सिक्ख गुरुओं ने कभी वर्ण व्यवस्था को, जात पात को या क्लास डिस्टिंक्शन को बढ़ावा नहीं दिया। जिस के चलते खुद को उच्च वर्गीय कहलवाने वाले कुछ लोग गुरु साहिब से ख़फ़ा भी हुए, लेकिन गुरुओं ने इस बात की कोई परवाह नहीं की।  इन ख़फ़ा होने वालों में खुद को  उच्च वर्गीय सिक्ख कहने वाले कुछ महानुभाव भी थे।

3.  यह भी उल्लेखनीय है कि, सिक्ख 'तरीकत' सभी का मान सम्मान करने वाली राह है, जिस के गवाह हरिमंदिर के चार दरवाज़े  हैं, और यह भी, कि हरिमंदिर की नींव, गुरु अर्जुन देव जी द्वारा,  एक मुस्लिम सूफी पीर, साईं मियां मीर साहिब द्वारा रखवाई गयी।  यह भी नहीं झुठलाया जा सकता, कि गुरु गोबिंद साहिब ने वैरागी जोगी लछमण दास को न सिर्फ अपना सिक्ख बनाया, बल्कि  बाबा जी को खालसा फ़ौज का  चीफ़ कप्तान भी नयुक्त किया।

4.   दशम गुरु द्वारा बाबा बन्दा सिंह बहादुर को फ़ौजी लीडरशिप का सौंपना,  धर्म युद्ध का चीफ़ संचालक बनाना, और उस से भी कहीं पहले, गुरु नानक साहिब का गुरु-गद्दी को अपने पुत्रों को न सौंप कर, भाई लहना जी, यानि गुरु अंगद देव जी को सौंपना, इस चीज़ का भी प्रूफ़ है की, सिक्ख विचारधारा मैरिट को वैल्यू करती है तथा इस में भाई भतीजावाद के लिए कोई स्थान नहीं है। 

5.  याद रहे कि,  सिक्ख फ़ौज में भी, सभी मज़हब और इलाकों के फ़ौजी थे। यानी गुरु गोबिंद साहिब, और बाद में बन्दा बहादुर जी, और यहां तक की महाराज रंजीत सिंह की फ़ौज में भी, हिन्दू, मुसलमान और बाकी मज़हबों की सोच के फ़ौजी कार्यरत थे। पठानो की तो एक पूरी पलटन गुरु साहिब की फ़ौज में थी।  वैरागी सोच से जुड़े हुए भी अनेक लोगों ने गुरु साहिब का मरते दम तक साथ दिया।

6.  यानी कुल मिला कर, सिक्ख धर्म एक ऐसी विचार धारा से प्रेरित है, जो सभी को साथ ले कर चलने में विशवास रखता है।  यहाँ मसला सिक्ख हिन्दू या मुसलमान होने का नहीं, मसला है की कौन है जो सच्च के साथ खड़ा है।

7.  जो दुनिया के किसी भी कोने में, ज़ुल्म के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने का दम रखता हो, वह सिक्ख विचार धारा के क़रीब या साथ कहा जा सकता है, और वो जो सिर्फ मौका परस्ती, चाल बाज़ी, मक्कारी, सेल्फिशनेस, भृष्टाचार इत्यादि से प्रेरित हो, वह सिक्ख नहीँ हो सकता, चाहे वह 5 किलो का कड़ा, 50 मीटर लम्बी पगड़ी,  15 किरपानेँ,  खूब लंबे केस, और दर्जनों कंघे साथ ले कर चले, बिलकुल वैसे ही जैसे कोई व्यक्ति 10  किलो चन्दन के तिलक लगा कर और 100 जनेऊ डाल कर भी ख़ुद को शुद्ध ब्राह्मण नहीं कह सकता, जब तक की उस की प्रविर्ती शुद्ध,  ज्ञान पिपासु, दयालु, सभी में ब्रह्मस्वरूप ईश्वर को देखने वाली  न हो।

8.  सिक्खी, मन मन्दिर को हरिमंदिर बनाने का नाम है।  और हरिमंदिर, केवल एक मन्दिर नहीं, बल्कि एक फ़लसफ़ा है।  यानि  चारो दिशाओं में खुला दिल, जो सभी दिशाओं से आईडियाज़ को वेलकम करे, जिस में ताज़ी हवा का प्रवाह हो, एक ऐसा मन मन्दिर जो हरीमन्दिर की तरहं स्वच्छ जल, यानी स्वच्छ विचारों से घिरा हो,  और जहां संगत और पंगत और लंगर का कॉन्सेप्ट हो, यानी सब की बराबरी, सब का साथ, और सब का विकास की बात, सिर्फ एक जुमला नहीं, बल्कि एक जीवित और ज्वलन्त जीवनशैली हो।

9.  बहुत ही संक्षिप्त में कहूँ तो सिक्खी के मूल सिद्धान्त में दो बातें हैं। पहली तो यह की सिक्खी में न कोई रिज़र्वेशन है,  और न कोई डिस्क्रिमिनेशन।  दूसरा यह की सिक्खी दादागिरी करने में, या दादागिरी सहनेे,  दोनों ही में विशवास नहीं करती।  सिक्खी, यानी, सर्वत का भला,  चढ़धि कला, और  लॉग-लपेट से मुक्त, स्वतन्त्र ज़िन्दगी । इतना ही हो जाये तो बहुत।

10.  बाकी गुरुओं की और उन के सिक्ख योद्धाओं की कर्म-साधना पे नज़र डॉलें, तो यही कह सकता हूँ, ' बहुत कठिन है राह, इस पनघट की'। मित्रो, यह वह सौदा है, जो सिर दे कर भी अगर मिल जाए, तो समझो सामान सस्ते में मिल गया।
🚩तत्त सत्त श्री अकाल🚩
©✒प्रेरक गुरु बलवन्त गुरुने ⚔

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