🍁कैनेडा के प्रधानमंत्री के भारतीय दौरे का राजनीतिकरण🍁ठीक या गलत❓✒GBG⚔


©🍁कैनेडा के प्रधानमंत्री के भारतीय दौरे का राजनीतिकरण🍁ठीक या गलत❓✒GBG⚔

कैनेडा के प्रधानसेवक पंजाब क्या पहुंचे, खलिस्तान के चर्चे  फ़िर से गर्म किये जा रहे हैं,  कभी  इस बहाने, तो कभी उस बहाने।

यहां तक की कैनेडा के प्रधानमन्त्री के भारत आने, और उन के पंजाब विज़िट पर भोंडी राजनीती की जा रही है। कैनेडा के रक्षामंत्री, सरदार हरजीत सज्जन का नाम भी उछाला जा रहा है। यह सब दुख़द है।

इस सब के उपलक्ष में कुछ कहना अनिवार्य हुआ जाता है, सो यह लेख।

1.  हम नहीं भूल सकते कि, आज विश्व, एक बड़ी मण्डी या बाजार ही नहीं, बल्कि एक विशाल , विस्तृत, तथा आपस में बन्धा हुआ कर्मक्षेत्र और जीवनक्षेत्र (लाइफ फील्ड) बन गया है।

2.   कोई भी व्यक्ति वैश्विक सत्ता का हिस्सा या हिस्सेदार बन कर, अपनी मूल कोंस्टीटुएंसी से अलग थलग नहीँ रह सकता। ट्रुडो के लिए भी यह सत्य है।

3.  कौमों का अंतर्राष्ट्रीय करण हो रहा है, किसी भी कौम को किसी एक ही खित्ते से जोड़ कर देखना एक बड़ी भूल है।  मुसलमानों को केवल पाकिस्तान या अरेबिया से जोड़ना और सिखों को केवल पंजाब से जोड़ कर देखना, और इस ही तरहं हिंदुओं को केवल इंडियन समझना, एक नादानी ही नहीँ, बल्कि बड़ी भूल है।

4.  आने वाले दिनों में कैनेडा ही नहीँ, और देशों के सेना प्रमुख, राजनितिक प्रमुख, मंत्री या सन्तरी,  सिक्ख, हिन्दू, या मुसलमान, कोई भी हो सकते हैं। यदी लंदन का मेयर एक मुसलमान हो सकता है तो समझ लो, आप के चाहे या बिना चाहे, धर्म की राजनीती पिछड़ती जा रही है।

5.  आप पूछें गे वह कैसे ? वह ऐसे, कि आप जानते हैं, मलेशिया का जेल प्रमुख एक सिक्ख है। सिंगापुर का मुख्य सेनापति, एक सिक्ख है। लन्दन का मेयर एक मुसलमान है। यानी लन्दन का मेयर सिर्फ लन्दन के मुस्लमानों के दम पे तो मेयर नहीं बना, उस के पीछे वहां के बहुत से गोरों का भी सपोर्ट रहा है। इस ही तरहं हरजीत सज्जन को सिर्फ कैनेडा के सिखों ने ही रक्षा मंत्री नहीं बनाया, इस फैसले के पीछे कैनेडा के गोरे ईसाईयों, बिरतानिया की महारानी, और विश्व के और गुटों का भी हाथ है। यही बात बाकी लोगों पर भी लागू होती है।

6.  तो भारत में कैनेडा के प्रधानमन्त्री श्रीमान जस्टिन ट्रुडो और वहां के रक्षा मंत्री श्री सज्जन के भारतीय दौरे का खालिस्तान की मांग के साथ समीकरण बिठाना गलत भी है, और दुख़द भी।

7. ट्रुडो यदी हरिमंदिर साहिब में सेवा करते हैं, तो वह, खालिस्तान के समर्थन में यह सब नहीं कर रहे, बल्कि यह उन के एक बड़े वोट बैंक, यानी कनेडियन सिक्ख भाईचारे के प्रति अपना आदर और सन्मान दिखाने का एक जेस्चर है, क्यों की श्री हरिमंदिर साहिब विश्व्यापी सिक्ख संगत का महानतम श्रद्धा-बिंदु है।

8.  जस्टिन ट्रुडो के पंजाब दौरे को सिर्फ खालिस्तान के साथ जोड़ कर देखना, भारत के लिए  अवश्य ही यह एक बहुत बड़ा  डिप्लोमैटिक फेलियर साबित हो गा, और भारतीय सिक्खों के लिये भी एक यह एक गलत सन्देश साबित हो गा।

9. हमें नहीं भूलना चाहिए कि, आज भारत जैसा विशाल मुल्क, जो विश्व शक्ति बनने की सम्भावना की देहलीज़ पे खड़ा है, तभी विश्व शक्ति बन के उभर सकता है, जब वह अपनी अकलियतों में भारतीय होने के एहसास को पुख्ता करे।  अकलियतों को दबा कर रखने की, या कमतर सिद्ध करने की कोशिश न करे, बल्कि सच्चे मानों में उन्हें साथ ले कर चले।

10.  यह भी सत्य है, लेकिन ट्रुडो के विज़िट से असम्बन्धित बात है कि,  यदी हिन्दू राष्ट्र  इत्यादि का नारा बुलन्द किया जाये गा,  यदी गाय, ग्रन्थ, मस्जिद और मन्दिर की राजनीती को बढ़ावा दिया जाये गा, तो निश्चित ही खालिस्तान, द्रविड़ एलम, दलितस्थान, बंगलालैंड भीललैंड, जैसी मांगे भी उठें गी, क्यों की मुद्दा केवल धर्म का नही, मुद्दा सोशियो-पोलिटिकल स्पेस का है।

11.   मेजोरिटी, तमाम सोशियो-पोलिटिकल स्पेस पर अपना बर्चस्व जमाये गी तो, मिनियोरिटीज़ अवश्य अपना हिस्सा अलग करने के प्रयास करें गी, और यह प्रयास राजनितिक, डिप्लोमैटिक और सैनिक, कोई भी या फिर सभी हो सकते हैं। इस के लिये कैनेडा या अमरीका से किसी पहल की आवश्यकता नहीं है। यह सभी सोशियो-पोलिटिकल स्पेस के लिए हो रही मांगें हर तरहं भारत का अंदरूनी विषय है।

12.  यदी किसी के मन में यह शक हो की हथियार उठाना किसी भी अकलियत के हक़्क़ में नहीं, तो इस वहम को दिल से निकाल दे। अक्सर पीड़ित और दलित पक्ष ही हथियार उठाता है, जब सन्धी और सहचरी  के समीकरण बिठाने के बाकी सभी रास्ते बन्द दिखें। और यह जायज़ भी है । ख़ास तौर पे जब गद्दी नशीन ताकतें डण्डे की राजनीती करें, तो भील, आदिवासी, दलित या प्रताड़ित कौमें, अवश्य हथियार उठायें गी, चाहे कीमत कितनी भी भारी क्यों न चुकानी पड़े।

13. अब यह भारत के उच्च स्तरीय नेताओं को तय करना है, कि वह किस किस्म की राजनीती करते हैं, एकीकरण की  राजनीती या ध्रुवीकरण की राजनीती।

14.  यह फैसला उन्हें करना है की भारत निर्माण करना है या हिन्दू राष्ट्र बनाना है।  दोनों ही सम्भव हैं। लेकिन दोनों के परिणाम अलग हों गे।

15.  प्रेम और एकता के पथ को बढ़ावा दिया गया तो अखण्ड भारत का बनना भी बहुत बड़ी सम्भावना है, लेकिन अगर डण्डे और दादागिरी का इस्तेमाल कर के ऐसा प्रयास किया गया, तो नतीजे हर हाल में विध्वंसक हों गे। इस अप्रोच से अखण्ड भारत की तो बात ही क्या, खण्ड खण्ड  भारत होने का ख़तरा ज्यादा रहे गा।

16.  इतिहास गवाह है, कोई भी युद्ध, कभी भी कौमों का पहला और आखिरी मुकाम नहीं बनता,  युद्ध जारी रहता है, योद्धा भी कभी मरते नहीं, और यह भी एक अटल सत्य है कि, प्रेम से किसी भी सवाल  का हल निकाला जा सकता है, बशर्ते, नीयत और दिल साफ़ हों।

17.  यानी बात संक्षिप्त की जाये तो ट्रुडो, ट्रम्प, महारानी विक्टोरिया, जापानी या इज़राइली देश प्रमुख, या कोई और विश्व स्तरीय नेता, भारत आते जाते रहें गे, और यह सिलसिला जारी रहना चाहिये।

18.  यह भी याद रहे की, इन में से खास तौर पे अमेरिका, कैनेडा, ऑस्ट्रेलिया और ब्रिटेन जैसे मुल्कों के नेता श्री हरिमंदिर साहिब भी अवश्य पहुंचें गे, क्यों की इन मुल्कों में सिक्ख एक शक्तिशाली आर्थिक और राजनितिक इकाई बन कर उभरे हैं,  लेकिन इस सब का राजनीतीकरण अनावश्यक भी है, और दुख़द भी।

📿तत्त सत्त श्री अकाल⚔
🚩फ़तेह अकाल की, अकाल सहाय🚩
✒ गुरु बलवन्त गुरूने⚔

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