2. इस का सीधा कारण है रेंगती व्यवस्था के सुधार की तरफ़ सत्ताधारियों तथा व्यवस्था के शीर्ष आसनों पे बैठे लोगों का सुस्त रवैया।
3. इस सवाल में से ही एक और सवाल निकलता है, कि आखिर यह रविय्या सुस्त क्यों ?
4. तो ज़बाब साफ़ है, भ्रष्टाचारियों को सत्ता में हिस्सा देने में या तो व्यवस्था के संचालकों को निजी लाभ है, या फ़िर व्यवस्था ही अपने संचालकों द्वारा राजनीति के अपराधीकरण को रोकने में असमर्थ है।
5. इसे मोटे तौर पर यों समझिए, कि 7 दशक बाद भी, देश की शीर्ष अदालत केवल इतना निर्देश दे रही है, कि कारण बता दो, कि भ्रष्टाचारी या जुर्म में लिप्त व्यक्ति को टिकट क्यों दिया ? बस हमें बता दो और फ़िर टिकट दे दो, अगर देना चाहो तो। हैं न मज़े की बात।
6. भाई आप तो देश की शीर्ष न्यायपालिका हैं, हम गरीबों के हक्कों के आखिरी रक्षक। आप क्यों हमें इस व्यवस्था से रगड़वाने पर तुले हैं। आप तो अवश्य ही ऐसा दिशानिर्देश भी दे सकते थे, कि दागी को टिकट ही नहीं दे सकेगी अब कोई पार्टी। फ़िर तो होती एक दम सही बात, लेकिन मुझे दुख से कहना पड़ता है, आप चूक गए।
7. चलो इतना भी अच्छा हुआ कि कोर्ट ने कुछ तो सराहनीय निर्देश भी दिए, जो निम्नलिखित हैं।
i. सिर्फ संभावित जीत ही अब, किसी दागी को टिकेट देने का कारण नहीं बन सकती। अब पार्टी को बताना होगा कि एक दागी केंडिडेट को टिकेट देने की जगह किसी बेदागी केंडिडेट को चुनाव में क्यों नहीं उतारा।
ii. केंडिडेट का अपराधिक ब्योरा, नामांकन के 48 घंटे के भीतर सार्वजनिक करना अब जरूरी।
iii. केंडिडेट का अपराधिक रिकार्ड पार्टी की वेबसाईट, समाचार पत्र, तथा सोशल मीडिया पर प्रकाशित करना अनिवार्य।
iv. अवमानना के केस से बचने के लिए, पार्टी को नामांकन के 72 घंटे के अंदर अंदर, हुक्म की अनुपालन रिपोर्ट चुनाव आयोग को देनी होगी।
8. हकीकत में आज हालात यह है कि, 2019 की इलेक्शन में, 39% सांसद दागी हैं। 29% पर, यानी 159 सांसदों पर ती संगीन अपराध, जैसे की, दुष्कर्म, अपहरण, हत्या और हत्या के प्रयास जैसे सीरियस ऑफेंसिज़ के केस चल रहे हैं।
9. एसे में सवाल यह उठता है कि, यदी सरकार संविधान में दर्ज मौलिक अधिकारों को निलंबित कर सकती है, तो राष्ट्रहित में दागी नेताओं के चुनाव लड़नेे के अधिकार को निलंबित क्यों नहीं कर सकती ?
यही आज जा यक्ष प्रश्न है⁉
🔱 सत्यम शिवम🔱
© @ ✒गुरु बलवंत गुरूने⚔