🚩🕯बिम्ब बड़े या सत्य⁉@✒GBG⚔
1. मूर्ति पूजा ठीक है या गलत, कौन सा धर्म बेहतर है, कौन सी पूजा पद्द्यति बेहतर है, भगवान है या नहीं, अगर है तो कैसा है, उस का कोई आकार है या वह निरंकार है, इत्यादि इत्यादि, सब बेवजह बेकार की बाते हैं।।इस तरहं की ज्यादातर बहस में कुछ नहीं रखा, और न ही इस अनावश्यक मन्थन से कुछ निकलता है।
2. सच्च को जानना ज्यादा आवश्यक और सार्थक है, क्यों की सत्य के आभाव में आप के पूर्व-ग्रह (Pre set values and beliefs), और प्रेज्यूडिसिज़ (Prejudices) आप पर हावी हो जाती हैं, और आप से कोई न कोई अनुचित कार्य करवा देती हैं, जो आप के अपने लिए या औरों के लिए नुकसान दायक होता है।
3. कुछ लोग किसी फ़िल्म, कहानी या नाटक इत्यादि को ले कर ही एक दूसरे के साथ ऐसी बहस में जुट जाते हैं, की कभी कभी एक साधारण सी बहस दंगे फ़साद तक जा पहुंचती है।
4. कहानी या फ़िल्म किसी सत्य या किसी समाजिक विषय-वस्तु को उजागर करने मात्र के लिए बनती है। इन कहानियों का मतलब केवल मूर्ती पूजा का समर्थन, विरोध, किसी धर्म का समर्थन या विरोध नहीं होता, बल्कि केवल समाजिक सच्चाइयों का प्रसारण मात्र होता है।
5. हाल ही में मैंने उपनिषद पर आधारित एक कहानी मित्रों को सुनाई। कहानी एक राजा में परमात्मा के विषय मैं पैदा हुई जिज्ञासा से उतपन्न होती है। वह जानना चाहता है की ईश्वर कहाँ है, प्रमाण दो, वह किसे और कहाँ देख रहा है, इस वक्त क्या कर रहा है। यह प्रश्न वह भरे दरबार में उठाता है, और साथ ही यह भी कहता है कि यदी अगले दिन तक उसे उत्तर न मिला तो वह राज्य के सभी मन्दिरों स मूर्तियां हटवा दे गा। ख़ैर प्रश्न मंत्री की बेटी तक पहुंचते हैं, और वह अपनी सूझ बूझ भरे उत्तरों से, अन्ततः राजा की जिज्ञासा शांत कर देती है। अब एक मित्र कहने लगे की यह तो मूर्ती पूजन का समर्थन करती हुई कहानी है। तो मेरा जो उत्तर था आप से भी शेयर करता हूँ।
6. कहानी तो केवल परम सत्य की ओर इशारा मात्र है। कहानी इध्वर तत्व को परिभाषित करने का जरिया मात्र है, बाकी और कुछ नहीं। ईश्वर सर्व व्यापी है, सर्व दिशा दृष्टि गोचर है, सर्वत्र और सर्वदा है, बस इतना ही कहानी का असली तत्व सार है ।
7. कहानी में राजा, मंत्री, मंत्री की बेटी, मन्दिर, मूर्तियां इत्यादि तो केवल बिम्ब मात्र हैं, जिन की सहायता से सार तत्व को प्रकाशित या प्रमाणित किया गया। कुछ लोगों ने तत्त सत्त देख लिया, कुछ बिम्बों में ही उलझ गये। बिम्बों में उलझने से सदैव बचना चाहिए और सार तत्व को ही ग्रहण करना चाहिए।
8. चलिये, बिम्बों और सार तत्व के भेद को समझाने के लिए एक कहानी आप को मैं और सुनाता हूँ, जिस कहानी में राम और रावण, तथा मिट्टी और सोने की मूर्तियों को मात्र बिम्ब रूप में किसी परम सत्य को उजागर करने के लिए इस्तेमाल किया गया है।
9. सोचिये, कि आप रास्ते पे चल रहे है और आपको वहां पड़ी मिट्टी की दो मूर्तियाँ मिलें, एक राम की और दूसरी रावण की, और आपको केवल किसी एक मूर्ति को उठाने को कहा जाए , तो ज्यादा चान्सीज़ हैं कि आप राम की मूर्ति उठाओ गे । ऐसा इस लिए की आप को बचपन से बताया गया है, कि राम सत्य,निष्ठा, सकारात्मकता, मर्यादा आदी के प्रतीक हैं , और रावण नकारात्मकता का प्रतीक है ।
10. ऐसी आप की कन्डीशनिंग आप की पैरेंटल upbringing, और समाज द्वारा किया गया है। कोई आदमी सर पे जटा, बोदी, पगड़ी, टोपी इत्यादि जन्म से नहीं पहन कर पैदा होता, सब यहीं पहनाया जाता है। यहां तक की अल्लाह के नाम पे ख़तना तो गाँव का नाइ करता है।
11. अब सिचुएशन को थोड़ा बदलते हैं।
एक बार फ़िर सोचिये कि दुबारा आप को रास्ते पे दो मूर्तियाँ मिलती हैं, राम और रावण की, लेकिन इस बार राम की मूर्ति मिट्टी की है और रावण की सोने की और आप को सिर्फ एक चुन कर अपने घर लेजाने की चॉईस दी जाये, तो आप राम की मिट्टी की मूर्ति छोड़ कर रावण की सोने की मूर्ति उठा लो गे। यह इस लिए की यहां आप का मन किसी भगवान वगवान से ज्यादा सोने के मूल्य को महत्व दे गा।
12. हो सकता है श्रीलंका में, जहां रावण पूजनीय माना जाता है, इस से उल्ट हो।
14. इस का स्पष्ट मतलब यह है कि हम अपने अपने सत्य और असत्य, सकारात्मक और नकारात्मक मूल्य, अपनी सुविधा या असुविधा, और लाभ या हानी के अनुसार तय करते हे।
15. 99% प्रतिशत लोग भगवान को सिर्फ लाभ और डर की वजह से पूजते है. चाहे मन्दिर हो या गुरुद्वारा, मस्जिद हो या चर्च, जयादा तर लोग भिखारीयों की तरहं या तो इन में याचक होते हैं, या भगवान को रिश्वत दे कर अपने काम बनवाने वाले होते हैं, और या फ़िर इंसान के साथ दगा और धोखा कमा कर भगवान को प्रशाद या पैसे के चढ़ावे का प्रलोभन दे कर उस से अपने गुनाह बक्कशवाने वाले लोग होते हैं, जैसे की भगवान कोई कढ़ा प्रसाद या खीर का भूखा मूर्ख पेटू है, या कोई रिश्वत खोर पटवारी।
16. जहां तक धर्म का विषय है, वह चाहे कोई भी हो, धर्म केवल अंधभक्त मूर्खों की भीड़ की अफ़ीम या चरस है, अन्यथा कुछ नहीं। जो लोग अपने धर्म को दूसरों से श्रेष्ठ बताने में जुटे रहते हैं, वह तो अनन्त महामूर्ख ही हुआ करते हैं।
17. धर्म कोई भी हो, परमात्मा को पाने के लिए नहीं, बल्कि समाज और इन्सान को दिशा देने के लिए और जीवन युक्ति देने के लिए ही बनता है। पुरोहित वर्ग उसे भगवान से जोड़ कर, अपनी अपनी अपनी दुकान चलाने का धन्दा शुरू कर देते हैं।
18. सोचिये, विचारिये और एक अच्छा जीवन जीने के लिए अछे इन्सान बनिये। एक ऐसे अच्छे हिन्दू, ऐसेअच्छे मुसलमान, ऐसे अच्छे सिक्ख या ऐसे अच्छे ईसाई होने से, जो दूसरे की कमियां गिनने को ही धार्मिक होना मान ले, कहीं ज्यादा बेहतर है अच्छा इन्सान होना।
19. याद रहे, सत्य एक है, लेकिन उस के बिम्ब/परछाइयाँ (Metaphor/images) अनेकों हैं। सत्य पे पकड़ बनाइये, बिम्ब तो आती जाती छाया है, जो देश काल और भाषा के साथ बदलते रहते हैं।।
🚩तत्त सत्त अकाल🚩
©✒गुरु बलवन्त गुरुने⚔
1. मूर्ति पूजा ठीक है या गलत, कौन सा धर्म बेहतर है, कौन सी पूजा पद्द्यति बेहतर है, भगवान है या नहीं, अगर है तो कैसा है, उस का कोई आकार है या वह निरंकार है, इत्यादि इत्यादि, सब बेवजह बेकार की बाते हैं।।इस तरहं की ज्यादातर बहस में कुछ नहीं रखा, और न ही इस अनावश्यक मन्थन से कुछ निकलता है।
2. सच्च को जानना ज्यादा आवश्यक और सार्थक है, क्यों की सत्य के आभाव में आप के पूर्व-ग्रह (Pre set values and beliefs), और प्रेज्यूडिसिज़ (Prejudices) आप पर हावी हो जाती हैं, और आप से कोई न कोई अनुचित कार्य करवा देती हैं, जो आप के अपने लिए या औरों के लिए नुकसान दायक होता है।
3. कुछ लोग किसी फ़िल्म, कहानी या नाटक इत्यादि को ले कर ही एक दूसरे के साथ ऐसी बहस में जुट जाते हैं, की कभी कभी एक साधारण सी बहस दंगे फ़साद तक जा पहुंचती है।
4. कहानी या फ़िल्म किसी सत्य या किसी समाजिक विषय-वस्तु को उजागर करने मात्र के लिए बनती है। इन कहानियों का मतलब केवल मूर्ती पूजा का समर्थन, विरोध, किसी धर्म का समर्थन या विरोध नहीं होता, बल्कि केवल समाजिक सच्चाइयों का प्रसारण मात्र होता है।
5. हाल ही में मैंने उपनिषद पर आधारित एक कहानी मित्रों को सुनाई। कहानी एक राजा में परमात्मा के विषय मैं पैदा हुई जिज्ञासा से उतपन्न होती है। वह जानना चाहता है की ईश्वर कहाँ है, प्रमाण दो, वह किसे और कहाँ देख रहा है, इस वक्त क्या कर रहा है। यह प्रश्न वह भरे दरबार में उठाता है, और साथ ही यह भी कहता है कि यदी अगले दिन तक उसे उत्तर न मिला तो वह राज्य के सभी मन्दिरों स मूर्तियां हटवा दे गा। ख़ैर प्रश्न मंत्री की बेटी तक पहुंचते हैं, और वह अपनी सूझ बूझ भरे उत्तरों से, अन्ततः राजा की जिज्ञासा शांत कर देती है। अब एक मित्र कहने लगे की यह तो मूर्ती पूजन का समर्थन करती हुई कहानी है। तो मेरा जो उत्तर था आप से भी शेयर करता हूँ।
6. कहानी तो केवल परम सत्य की ओर इशारा मात्र है। कहानी इध्वर तत्व को परिभाषित करने का जरिया मात्र है, बाकी और कुछ नहीं। ईश्वर सर्व व्यापी है, सर्व दिशा दृष्टि गोचर है, सर्वत्र और सर्वदा है, बस इतना ही कहानी का असली तत्व सार है ।
7. कहानी में राजा, मंत्री, मंत्री की बेटी, मन्दिर, मूर्तियां इत्यादि तो केवल बिम्ब मात्र हैं, जिन की सहायता से सार तत्व को प्रकाशित या प्रमाणित किया गया। कुछ लोगों ने तत्त सत्त देख लिया, कुछ बिम्बों में ही उलझ गये। बिम्बों में उलझने से सदैव बचना चाहिए और सार तत्व को ही ग्रहण करना चाहिए।
8. चलिये, बिम्बों और सार तत्व के भेद को समझाने के लिए एक कहानी आप को मैं और सुनाता हूँ, जिस कहानी में राम और रावण, तथा मिट्टी और सोने की मूर्तियों को मात्र बिम्ब रूप में किसी परम सत्य को उजागर करने के लिए इस्तेमाल किया गया है।
9. सोचिये, कि आप रास्ते पे चल रहे है और आपको वहां पड़ी मिट्टी की दो मूर्तियाँ मिलें, एक राम की और दूसरी रावण की, और आपको केवल किसी एक मूर्ति को उठाने को कहा जाए , तो ज्यादा चान्सीज़ हैं कि आप राम की मूर्ति उठाओ गे । ऐसा इस लिए की आप को बचपन से बताया गया है, कि राम सत्य,निष्ठा, सकारात्मकता, मर्यादा आदी के प्रतीक हैं , और रावण नकारात्मकता का प्रतीक है ।
10. ऐसी आप की कन्डीशनिंग आप की पैरेंटल upbringing, और समाज द्वारा किया गया है। कोई आदमी सर पे जटा, बोदी, पगड़ी, टोपी इत्यादि जन्म से नहीं पहन कर पैदा होता, सब यहीं पहनाया जाता है। यहां तक की अल्लाह के नाम पे ख़तना तो गाँव का नाइ करता है।
11. अब सिचुएशन को थोड़ा बदलते हैं।
एक बार फ़िर सोचिये कि दुबारा आप को रास्ते पे दो मूर्तियाँ मिलती हैं, राम और रावण की, लेकिन इस बार राम की मूर्ति मिट्टी की है और रावण की सोने की और आप को सिर्फ एक चुन कर अपने घर लेजाने की चॉईस दी जाये, तो आप राम की मिट्टी की मूर्ति छोड़ कर रावण की सोने की मूर्ति उठा लो गे। यह इस लिए की यहां आप का मन किसी भगवान वगवान से ज्यादा सोने के मूल्य को महत्व दे गा।
12. हो सकता है श्रीलंका में, जहां रावण पूजनीय माना जाता है, इस से उल्ट हो।
14. इस का स्पष्ट मतलब यह है कि हम अपने अपने सत्य और असत्य, सकारात्मक और नकारात्मक मूल्य, अपनी सुविधा या असुविधा, और लाभ या हानी के अनुसार तय करते हे।
15. 99% प्रतिशत लोग भगवान को सिर्फ लाभ और डर की वजह से पूजते है. चाहे मन्दिर हो या गुरुद्वारा, मस्जिद हो या चर्च, जयादा तर लोग भिखारीयों की तरहं या तो इन में याचक होते हैं, या भगवान को रिश्वत दे कर अपने काम बनवाने वाले होते हैं, और या फ़िर इंसान के साथ दगा और धोखा कमा कर भगवान को प्रशाद या पैसे के चढ़ावे का प्रलोभन दे कर उस से अपने गुनाह बक्कशवाने वाले लोग होते हैं, जैसे की भगवान कोई कढ़ा प्रसाद या खीर का भूखा मूर्ख पेटू है, या कोई रिश्वत खोर पटवारी।
16. जहां तक धर्म का विषय है, वह चाहे कोई भी हो, धर्म केवल अंधभक्त मूर्खों की भीड़ की अफ़ीम या चरस है, अन्यथा कुछ नहीं। जो लोग अपने धर्म को दूसरों से श्रेष्ठ बताने में जुटे रहते हैं, वह तो अनन्त महामूर्ख ही हुआ करते हैं।
17. धर्म कोई भी हो, परमात्मा को पाने के लिए नहीं, बल्कि समाज और इन्सान को दिशा देने के लिए और जीवन युक्ति देने के लिए ही बनता है। पुरोहित वर्ग उसे भगवान से जोड़ कर, अपनी अपनी अपनी दुकान चलाने का धन्दा शुरू कर देते हैं।
18. सोचिये, विचारिये और एक अच्छा जीवन जीने के लिए अछे इन्सान बनिये। एक ऐसे अच्छे हिन्दू, ऐसेअच्छे मुसलमान, ऐसे अच्छे सिक्ख या ऐसे अच्छे ईसाई होने से, जो दूसरे की कमियां गिनने को ही धार्मिक होना मान ले, कहीं ज्यादा बेहतर है अच्छा इन्सान होना।
19. याद रहे, सत्य एक है, लेकिन उस के बिम्ब/परछाइयाँ (Metaphor/images) अनेकों हैं। सत्य पे पकड़ बनाइये, बिम्ब तो आती जाती छाया है, जो देश काल और भाषा के साथ बदलते रहते हैं।।
🚩तत्त सत्त अकाल🚩
©✒गुरु बलवन्त गुरुने⚔