1. आज कल लोग भड़कते बहुत जल्दी हैं। भगतों की भीड़ हर तरफ है। सब कोई अपने अपने नेता या दल के छोले भटूरे खाने खिलाने में व्यस्त है। मूर्खों की कोई कमी नहीं जो बिना कुछ जाने समझे, किसी भी मुद्दे में, भक्ति की कड़छी, किसी भी दाल में डाल कर, न जाने किस दानव या देवता को खुश करने में लगे हैं।
2. कुछ लोग तो डरपोक इतने हैं, की सच्च जानते हुए भी झूठ की आरती उतारते हैं, कुछ मूढ़ इतने हैं, की उन से बात करना मेंढे से सर टकराने जैसा है। चलो जो है सो है, लेकिन इस का यह अर्थ तो कतई नहीं की हम जैसे लोग कुछ लिखना या कहना छोड़ दें।
3. जिस दिन आम आदमी की क़लम रुक गयी, समझ लो उस दिन भारत फ़िर ग़ुलाम हो गया, तो इस लिए आप सभी से निवेदन है कि सज्जनों की रक्षा के लिए और दुर्जनों के विसर्जन के लिए चर्चा चिंतन जारी रहे।
4. अभी कुछ दिन पहले इलेक्टोरल बॉन्ड या निर्वाचन बांड पे बात हो रही थी, तो एक श्रीमान भड़क उठे, की क्या आप जानते हैं की यह सब इलेक्टोरल बॉन्ड भारतीय स्टेट बैंक द्वारा सारी KYC जानकारी लेने के बाद ही जारी किये जाते हैं। अब उन्हें कौन समझाए कि भैया पहले जान लो, की जानकारी है क्या, बे-वजह काहे आधे पके तथ्यों का रायता फैला रहे हो।
5. तो सब से पहले तो यह कहने में मुझे कोई संकोच नहीं की इलेक्टोरल बॉन्ड असीमित धन राजनितिक दलों को बिना किसी भय के चन्दा देने का साधन है, यानी धन किस ने दिया, कहाँ से आया और किस दल को दिया, इस के बारे कोई बड़ी जानकारी दिए बगैर, राजनितिक लाभ के लिए धनविसर्जन का माध्यम ।
6. अब आप और हम जैसे के, सौ पचास को कौन पूछता है, दिए न दिए, एक बराबर। असली राज़ की बात यह है कि बड़ी बड़ी देसी विदेशी कम्पनियाँ, या उन के मुखौटों के पीछे छुपे विदेशी सेंध-मार, अब हज़ारों करोड़ों का राजनितिक दान, एक छुपे हुए निवेश के रूप में कर सकते हैं। वह कैसे, तो साहिब वह भी बताता हूँ, लेकिन पहले थोड़ा सा इस गोलमाल का इतिहास भी जान लें।
7. भारत में, चुनाव में राजनैतिक दल, बेतिहाशा खर्चा करते हैं, बहुत पैसा लगाते हैं। याद रहे, यह सब पैसा किसी कुबेर या इंद्र के खजाने से नहीं आता, बल्कि देश में करदाताओं का या करचोरों का, यानी देशी विदेशी बड़े व्यपार घरानों का काला धन ही होता है।
8. मौजूदा व्यवस्था की चुनावी प्रक्रिया देश के अरबों रूपये को, जो विकास के लिए काम में लाये जा सकते थे, चन्द झूठे जुमलेबाज़ों को चुनने, और फिर 5 साल तक उन्हें मसनद पर बिठा कर उन के नखरे नाज़ उठाने में, कुव्यय करवा रही है। इस लिए व्यवस्था परिवर्तन, जिस की देश को ज्वलन्त आवश्यकता है, उस का एक बड़ा हिस्सा चुनावी प्रक्रिया का सादा, सरल व व्यय विहीन बनाये जाना भी है।
9. राजनितिक दलों के पास पैसे कहाँ से आते हैं, तो जान लीजिये कि हर दल चंदा, यानी डोनेशन लेता है, और यह डोनेशन आप या मुँझ जैसे साधारण लोग कहाँ देते हैं, और दें गे भी तो कितना ? यह चन्दा तो बड़े व्यपारी देते हैं, जिन के पास असीमित माया और धन कमाने के मायावी साधन हैं।
10. अब चन्दा लेने और देने वाले दोनों ही मौजूद हों तो इस लेन देन की कोई राह भी इन द्वारा निकाली गई हो गी, सो उस ही राह का नवीनीकरण करने के उपरांत, उस का नया नाम इलेक्टोरल बॉन्ड रखा गया है।
11. चन्दा वंदा तो चन्दा मामा ही जाने कब से शुरू हुआ, लेकिन राजनैतिक चन्दा लेने देने का व्यवस्थित पथ एक बड़े 'गुरु घंटाल', यानी राजनीती के धनुन्धर नेता, अब स्वर्ग निवासी, श्री वाजपयी जी के समय शुरू हुआ।
12. वाजपेयी साहिब की सरकार ने राजनितिक चन्दा देने वालों को शरेआम पुरस्कृत किये जाने का राह खोला, राजनैतिक चन्दा देने वालों को VIP, यानी खासमखास स्टेटस दे कर।
13. एक तो चन्दा देने वाली कम्पनी अब अपने द्वारा दिए गये चंदे को अपने खर्चों में दिखा कर टैक्स रिबेट ले सकती थी, जब की चन्दा लेने वाला दल उस चंदे पे कोई टैक्स नहीं देता था। यह भी प्रवधान कर दिया गया कि बदले में चन्दा- दाता कर विभाग के लेखे जोखे में VIP भी हो जाता था। यानी, दे ले के सभी का फायदा।
14. फ़िर UPA का समय आया, तो माल समेटने में भला इन्हें कब गुरेज़ था, सो इन्होंने कॉरपोरेट्स को राजनितिक चन्दा देने के प्रोसेस को सरल बनाने के लिए एलेक्टोरल ट्रस्ट बनाने का प्रवधान बना दिया। अब बहुत सी कम्पनियों ने इन ट्रस्टों द्वारा चन्दा दे कर सरकार को अपने हक़ में पॉलिसी बनाने के लिए प्रेरित करने का रस्ता खोज लिया।
15. यानी की कम्पनियों द्वारा चन्दा देने के नाम पे सरकार बनाने वाली संभावित राजनीतीक पार्टी को रिश्वत देने का रास्ता, या यूँ कहिये कि पैसे के ज़ोर पर किसी भी दल की सरकार बनाने का हाईवेह अब तैयार था।
16. धनवान कारपोरेट अब पैसा फेंक तमाशा देख की स्थिति में आ गये। बड़े बड़े नेता, व्यपारियों के जहाज़ों में बेधड़क राजनैतिक कम्पेनों पर उड़ते हुए नज़र आने लगे, यानी अब सरकार ये राजनितिक दल बनाये या वो राजनितिक दल, नेता बड़े व्यापारिक घरानों के, या अती अमीर राजनितिक परिवारों के दल्ले बनने तक ही सीमित रह गये, और जन्ता, बस चुनाव से पहले नेताओं के जुमलोँ के रसगुल्ले, और चुनाव के बाद भृष्ट और झूठे नेताओं के जूते खाने के क़ाबिल ही रह गयी।
17. यह सत्य किसी एक व्यक्ति या दल नहीं, सभी राजनितिक दलों पे लागू है। मैं तो यहां तक कहूँ गा कि राजनितिक दल का गठन, अब कुछ लोग केवल जन सेवा या सत्ता प्राप्ती के लिये नहीं बल्कि, चन्दा प्राप्ती द्वारा धन प्राप्ती हेतु भी करने लगे हैं।
18. फिर नमो साहिब की मौजूदा सरकार भला इस काम को आगे क्यों न बढ़ाती। यानी सरकार कोई भी हो, किसी भी दल की हो, उस का नारा कोई भी हो, चाहे विकास, चाहे भृष्टाचार मुक्त भारत, चाहे गरीबी हटाओ, चाहे किसी भी धर्म से प्रेरित राष्ट्र निर्माण, कारपोरेट धन से चुनाव जीती सरकार, कारपोरेट दैत्यों की सेवा करने में कैसे पिछड़ सकती है ? जिन पंखों पे बुलबुल उड़ रही हो, उन्हें ही कैसे काट सकती है ? सो साहिब बाग़ की मैजूदा बुलबुल ले आई कारपोरेट बांडस का सिलसिला।
19. सन् 2017 में एक कानूनी प्रावधान लाया गया , जिस के चलते अब कोई भी, धना सेठ, गन्ना सेठ, सोना सेठ, जादू टोना सेठ, बाबा लोग, कोयला सेठ, पेट्रोल डीज़ल सेठ, मदिरालय से ले कर शौचालय सेठ, यानी कोई भी अडानी, अम्बानी, या फिर राजा जानी, जितना चाहे उतना धन, इन बांडस के जरिये किसी भी दल को दे सकता है, और फ़िर उस राजनीतिक दल में अपने दल्लालों को फिट भी कर सकता है।
20. इस तरहं भारत में देश की आज़ादी के बाद, एक बार फ़िर कंपनी राज की स्थापना हो चुकी है। कोई भी कम्पनी अब एक हज़ार ₹ से ले कर 1 करोड़ ₹ तक के असीमित निर्वाचन बांड, 'असीमित' शब्द पे ध्यान दें, खरीद कर, उसे चन्दा स्वरूप राजनैतिक दल को दे सकती है।
21. 2017 के वित्तीय बिल संशोधन से पहले, कोई भी कम्पनी, अपनी बीते तीन सालों की शुद्ध कमाई, या शुद्ध मुनाफ़े की धनराशि का 7.5% हिस्सा, किसी राजनितिक दल को दे सकती थी, लेकिन कम्पनी को अपनी लाभ-हानी की वित्तीय रिपोर्ट में इस राशी को दिखाना अनिवार्य था और यह भी बताना आवश्यक था कि किस पार्टी को पैसा दिया गया है।
22. 2017 के वित्तीय बिल संशोधन के बाद यह प्रावधान हटा दिए गये।
23. अब न तो धन देने की कोई सीमा है, न ही जिसे धन दिया गया, उस पार्टी का कोई विवरण देने की आवश्यकता। अब खुल के खाओ, खुल के खिलाओ का फण्डा जारी हैं, जब तक आप फण्ड राजनैतिक दल को दे रहे हैं।
24. जिन लोगों को यह गलत फ़हमी है कि चन्दा दाता को KYC के तहत अपनी या चन्दा लेने वाले की जानकारी देनी हो गी, वह जरा संशोधित कानून और उस की उचित व्याख्या, एक बार पुन्ह पढ़ लें।
🚩तत्त सत्त अकाल🚩
✒गुरु बलवन्त गुरुने⚔
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