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🚩सारागढ़ी का असली इतिहास🚩@ 📚GBG⚔

1. केसरी फ़िल्म, जो बॉक्स आफिस पर जबरदस्त कमाई कर रही है, इतिहास और यथार्थ की सच्चाई से काफ़ी हट कर है। चलो एक नजर उस ज़माने में पख्तूनवा  इलाके के हालात पर डालें। पहली बात समझने की यह है, कि महाराजा रणजीत सिंह की मृत्यु उपरांत सिक्ख सम्राज्य को फिरंगी अपने सम्राज्य में शामिल कर चुका था, और पख्तूनवा  रणजीत सिंह की रियासत का पश्चिमी फ्रंटियर था। गोरे के इस इलाके पे काबिज होने के बाद, अब उस का टकराव सीधा पश्तून अफगानों से था।

2.  दूसरी बात यह कि इधर  बृतानवी सम्राज्य अपनी जड़े मजबूत करने में लगा था तो उधर रूस भी अफ़ग़ानिस्तान पे नज़रें टिकाए बैठा था।  यानी रूस और ब्रितानिया में बड़ी कश्मकश का माहौल था, जिस के चलते  ब्रितानिया ने अफ़ग़ानिस्तान से लगते पखतूनवा इलाके की नए सिरे से क़िलाबन्दी करनी शुरू की। दो किले मशहूर थे, किला गुलिस्तान और किला लॉकहर्ट। इन दोनों के बीच कोम्युनिकेशन के लिए टेलीग्राम की लाईन डाली गई, लेकिन आज़ादी पसंद पश्तून  कबायिली, जो ब्रिटिश मौजूदगी को नापसंद करते थे,  इन सभी संचार तारों को काट-फाट देते थे। किला गुलिस्तान और किला लॉकहर्ट में  लगातार संचार अतिआवश्यक था, जिस के चलते इन दोनों किलों के बीचों बीच ऐसा स्थान ढूंढा गया, जहां से दोनों किलों से दृष्टि द्वारा सम्बन्ध कायम हो सके।

3.  सब से सूटेबल जगह मिली, सारा नामक गांव के नजदीक, जहां एक गढ़ी, यानी small fort, यानी एक छोटा सा किला बनाया गया।  यहां से दोनों बड़े किलों में, यानी किला गुलिस्तान और किला लॉकहर्ट के दरमियान,  शीशे कि चमक, झंडे या मशाल के माध्यम से दृष्टि कोड का इस्तेमाल करके  लगातार संचार को संभव बनाया गया।  सिक्ख रेजीमेंट के  हवलदार ईशर सिंह के नेतृत्व में यहां 21 जवानों का दस्ता तैनात किया गया, जिस का कर्तव्य, सारागढ़ी की रक्षा करना था।

4.  इतिहास गवाह है कि 1897 में अफगानों ने अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह कर दिया,  और 27 अगस्त से 11 सितंबर के बीच पश्तूनों द्वारा इलाके के किलों पर कब्ज़ा करने के कई जोरदार प्रयासों को, अंग्रेज़ सेना  द्वारा विफल कर दिया गया।  3, 9 और 12 सितंबर 1897 को  अंग्रेज हकूमत से बागी हुए अफगानों ने, अंग्रेज सेना के फोर्ट गुलिस्तान और फोर्ट सारागढ़ी  पर हमला किया।  इन किलों की रक्षा  में तैनात 36वीं सिख रेजिमेंट के  जांबाज जवानों द्वारा उन हमलों को नाकाम किया गया, तथा काउंटर अटैक की कार्रवाई के चलते पुनः हासिल किया गया।   पश्तून अफगानों का नेतृत्व ख़ान गुल बादशाह कर रहा था।

5. इस में कोई शक्क नहीं की सिक्ख रेजिमेंट के 21 जवान  हजारों पठानों से आखिरी दम तक लड़े, और बहुत जम कर युद्ध  हुआ । फौजी जंगी इतिहास में एक नया अध्याय लिखा गया, लेकिन इस लड़ाई में  जो शूरवीरता सिंघों ने दिखाई, वह दो चीजों से  प्रेरित थी । एक तो सिक्ख गुरुओं द्वारा स्थापित कुर्बानी का जज्बा और युद्ध में पीठ न दिखाने  की परम्परा,  और दूसरा अंग्रेजों के प्रति सिखों कि फौजी नौकरी के चलते, अपने इंपलायर, अपनी रेजिमेंट, और अपने रेजिमेंटल निशान के प्रति वफादारी निभाने का जज़्बा, और अपने निर्भय सिक्ख होने की छवि को दाग ना लगने देने का  जज़्बा।

6.   बहुत से व्टसअप युनिवर्सटी इत्यादि के पढ़े लोग, असली जानकारी  नहीं रखते हैं, और कह रहे हैं, वाह जी वाह, सिखों ने देश के लिए सारागढ़ी  की लड़ाई  लड़ी। यह एक भ्रम है। इस में कोई शक नहीं कि सिक्खों ने देश के लिए भी अद्वितीय कारनामे किये हैं, लेकिन सारागढ़ी का युद्ध अंग्रेज के लिए लड़ा गया था।  सच कड़वा होता है, शायद कुछ लोगों को बुरा लगे, लेकिन सच्च मूल्यवान है, सो उस का दर्पण दर्शन अनिवार्य है।  सब से पहले तो 36 सिक्ख रेजिमेंट की पैदाइश पे नज़र डालें।  1887 में इस रेजिमेंट की स्थापना कैप्टन होमज़ तथा कर्नल कुक ने 36 सिक्ख बंगाल इनफैंट्री रेजिमेंट के रूप में की। इस रेजिमेंट की एथनिक बनावट यह थी की इस में सिर्फ जट्ट सिक्ख जवान ही भरती किए गए थे। 1901, में इस रेजिमेंट का नाम 36 बंगाल इनफैंट्री से 36 सिक्ख इनफैंट्री कर दिया गया। 1903 के बाद यह रेजिमेंट सिर्फ  36 सिक्ख के नाम से जानी जाने लगी।

7.  याद रहे कि जब  सितम्बर 1897 में यह  लड़ाई लड़ी गई, तो भारत नामक मुल्क का कोई नामो निशान भी नहीं था। हिन्दुस्तान नामक एक  बड़ा इलाका ब्रिटिश सम्राज्य की बहुत बड़ी टैरीट्री थी, जिस में सैकड़ों कौमें थी, सैंकड़ों रजवाड़े थे, जिन में से कुछ ब्रिटिशरों के चाटुकार हो गए, कुछ नौकर हो गए, तो कुछ बागी। बहुत से सिक्खों ने भी महारानी विक्टोरिया कि फौज में नौकरी कर ली, और उस ज़माने के हालात के मुताबिक  इस में कुछ बुरा भी नहीं था। इन में से ज्यादा तर लोग महाराजा रणजीत सिंह की दुखद मृत्यु के उपरांत, फिरंगी फौज में शामिल हो गए थे। कैप्टन अमरिंदर सिंह के पूर्वजों कि पटियाला रियासत और पंजाब की कुछ अन्य छोटी रियासतों में भी  कुछ फौजियों ने नौकरी कर ली। यानी  सैनिक होना ही  इन लोगों का पेशा था।  रणजीत सिंह की फौज के कुछ लोग बागी भी बने, कुछ ने  उदास हो कर जोग विजोग भी ले लिए, और गुमनाम साधू बन कर जीने लगे।

8.  खैर जो भी हुआ लेकिन फिरंगी ने इस मौके का सब से शातिराना इस्तेमाल किया। उस ने न केवल महाराजा रंजीत सिंह के तमाम राज्य को अपने राज्य में शामिल किया, बल्कि रानी जिंदा को निष्कासित कर पहले बनारस और फ़िर नेपाल भाग जाने पे मजबूर किया, और  युवराज दिलीप सिंह को इंग्लैंड ले जा कर उस का 'काला अंग्रेज सरदार' बना डाला। उपरांत रंजीत सिंह की प्रशिक्षित फौज  को मैनेज करने के लिए  सिक्ख रेजिमेंट और अन्य सैन्य दस्तों  का गठन किया गया, जिन के फाउंडिंग अफसरों में  कैप्टन होमज़ और कर्नल कुक  मुख्य थे।

9.  सारागढ़ी का युद्ध   ब्रिटिश सेना और  अफ़्ग़ान बागियों के मध्य,  उत्तर-पश्चिम फ्रण्टियर प्रान्त, यानी  मौजूदा पाकिस्तान के खैबर-पख्तूनवा इलाके में लड़ा गया। याद रहे  इस जंग में  अंग्रेज़ हकूमत से बागी हुए पठान अपने इलाके की आज़ादी के लिए लड़ रहे थे, जब कि सिक्ख फौजी अंग्रेज की नौकरी में थे, और अंग्रेज के लिए लड़ रहे थे।   ऐसा नहीं कि इस  कारण से  सिखों कि बहादुरी को कम  आंका जाए,  लेकिन इस लड़ाई को 'खालसा और पठानों 'के बीच हुआ युद्ध कहना गलत होगा । यह तो अपने मुल्क की आज़ादी के लिए लड़ रहे पठानों और अंग्रेजों की फौज में भरती पेशेवर सिक्ख फौजियों के बीच युद्ध था।

10.  यानी सिक्ख बेहतरीन योद्धा साबित हुए, लेकिन वह जज्बाए मुल्क नहीं, बल्कि जज़बाये  ड्यूटी और अपनी कौम और रेजिमेंट की साख बचाने के चलते वीरगति को प्राप्त हुए। 1897 में आज का हिन्दपाक  557 छोटे बड़े रजवाड़ों द्वारा शाशित राज्यों का समूह मात्र था, और इन छोटे छोटे राज्यों के, तकरीबन सभी राजा वाजा, गोरे की चमचा  चाकरी करते थे। उन  दिनों  कोई  आज के भारत का तस्सवुर भी नहीं कर सकता था। याद रहे कि 1897 के अफ़ग़ान विद्रोह से 40 साल पहले हुआ 1857 का गदर संग्राम भी कुछ अंग्रेज़ी फौज के नाराज़ सिपाहियों की नाराज़गी के कारण, और कुछ अंग्रेज़ से नाखुश राजे रजवाड़ों का, जिन के बेऔलाद होने पर या किन्हीं भी और कारणों के चलते,  गोरे ने उन का राज्य छीन लेने का कानून बनाया था,  अपने राजसी हक्कों को पुनः पाने का संग्राम था, नां की  भारत में लोकतंत्र स्थापित करने का संग्राम, और यह गदर राजे रजवाड़ों और दिल्ली  के  मुगल  बादशाह के निशान/झंडे तले लड़ा गया।

11.  इस लिए यह कहना बनता है कि केसरी फिल्म में अक्षय को ज्यादा ही नाटकीय तरीके से दर्शाया गया है। तेरी मिट्टी गीत में जो देशभक्ति की भावना की बात की गई है, वह आज़ादी के लिए अंग्रेज़ के ख़िलाफ़ लड़ते पठानों के ख़िलाफ़ लड़ रहे, एक अंग्रेज़ फ़ौज के सिपाही  के  मन कि भावना हो, यह कैसे संभव है। यदि अक्षय को मालीक भक्ती  या अपने धर्म संबंधी  कोई गीत गाते हुए दिखाया जाता तो शायद ज्यादा इतिहास के नजदीक होता। अक्षय कुमार तो वैसे भी देशभक्ति का ब्रांड एम्बेसडर बनने के काबिल ही नहीं, क्यों कि वह तो कब का भारत की नागरिकता छोड़ कर कैनेडा का नागरिक बन चुका है। फिल्म में अक्षय को केसरी  रंग की पगड़ी पहने  दिखाया गया है, जब कि उस ज़माने में अंग्रेज फौज के सिक्ख खाकी पगड़ी ही पहनते थे। वैसे भी युद्ध की घड़ी में ड्रामेबाजी नहीं होती, बल्कि इंसान बहुत गंभीर अवस्था में पहुंच जाता है, एक ऐसी अवस्था, जहां से युद्ध करने,  प्राण  लेने और प्राण बलिदान करने की स्थिति का आगमन होता है।

12.   बाकि जो है सो है, लेकिन मुझे नहीं लगता कि विश्व में अपनी साख बनाने के लिए सिक्खों को किसी फिल्म या नौटंकी की आवश्यकता है।  सिक्खों का इतिहास, गुरुओं और बंदा बहादुर जैसे जरनैलों, तथा असंख्य सिक्खों की कुर्बानी और  इज्ज़त के लिए मर मिटने की सिक्ख परम्परा, सिक्खों की साख को आगे बढ़ाने के  लिए काफ़ी है।

13. महारानी के लिए सिक्ख अच्छा लड़े, खूब लड़े, जिस के लिए सारागढ़ी के सभी शहीदों  को मरणोपरांत विक्टोरिया क्रॉस औेर, 500 रुपए नकद, जो आज के 5 करोड़ के बराबर हैं,  और  प्रत्येक शहीद के परिवार को 50 एकड़ ज़मीन भी दी गई, लेकिन यह लड़ाई 36 सिक्ख के जांबाजों ने हिन्दुस्तान के लिए नहीं, बल्कि सिक्ख सिपाही की मर्यादा, और गोरे की नौकरी  वफादारी से बजाने के लिए लड़ी थी।

14. सारांश में याद रखिए कि सारागढ़ी किले की सुरक्षा में तैनात ब्रितानवी अग्रेज सेना  के सिक्ख  सैन्यदल में 36 सिख रेजिमेंट की चौथी बटालियन के यानी 36/4 सिक्ख के, सिर्फ 21 सिक्ख सैनिक तैनात थे, जिन पर 1000 से 1200 अफ़्ग़ानों ने हमला किया । इस युद्ध की सब से बड़ी बात यह थी, कि सिक्ख जवानों ने ना किला छोड़ा, ना आत्म समर्पण किया बल्कि  किले की सुरक्षा में तैनात छोटी सी सैन्य टुकड़ी का नेतृत्व कर रहे हवलदार ईशर सिंह  ने, एक बड़ी संख्या में हुए हमले के बावजूद, मृत्यु-पर्यन्त युद्ध करने का निर्णय लिया। यह अदम्य साहस और  बहुत बड़ी शूरवीरता का परिचायक था।  इसे सैन्य इतिहास (मिलिट्री हिस्टरी) के सब से गौरवमई अध्यायों में से एक में गिना जाता है।  आज भी सिक्ख रेजिमेंट में इस युद्ध की याद में 12 सितम्बर का दिन, सारागढ़ी दिवस के रूप में मनाया जाता हैं। सारागढ़ी के योद्धाओं को मेरा विनम्र नमन।
🚩 सत्य ही अकाल है🚩
©📚प्रेरक गुरु बलवंत गुरूने⚔